राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार या तिरस्कार

कृष्णा पुनिया (फ़ाइल फ़ोटो)
Image caption दिल्ली में 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद कृष्णा पुनिया.

भारत में खेलों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को दिए जाने वाले राजीव गांधी खेल रत्न, द्रोणाचार्य और अर्जुन पुरस्कार इन दिनों विवादों के घेरे में है. ऐसा नहीं है कि ये पुरस्कार पहली बार चर्चा का केन्द्र बने हैं बल्कि इससे पहले भी कई बार इन्हें लेकर शोर मचता रहा है.

फ़िलहाल ताज़ा विवाद जाने-माने ट्रैप निशानेबाज़ रोंजन सोढ़ी और महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया के बीच राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार को लेकर है.

दिल्ली में हुए 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर रातों रात स्टार बनने वाली डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पुनिया ऐसा कारनामा करने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी बनीं. अब कामयाबी तो कामयाबी है भले ही उनके आलोचक यह कहें कि उस स्पर्धा में दुनिया की दूसरी शीर्ष महिला डिस्कस थ्रोअरों ने हिस्सा नहीं लिया था, तो दूसरी तरफ़ रोंजन सोढी ने भी दो रजत पदक जीते हैं.

अगर सफलता के पैमाने की बात करें तो इसके अलावा कृष्णा पुनिया के पास एशियाई खेलों के दो कांस्य पदक भी हैं तो रोंजन सोढ़ी पिछले एशियाई खेलों में निशानेबाज़ी की स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले इकलौते निशानेबाज़ हैं. इसके अलावा उन्होंने एक कांस्य पदक भी जीता था. डबल ट्रैप शूटिंग में वह दो बार विश्व कप विजेता तो बने ही साथ ही उनका बचाव करते हुए वह विश्व चैंपियन भी बने.

कृष्णा पुनिया बनाम रोंजन सोढ़ी

Image caption रोंजन सोढ़ी का नाम आने से विवाद पैदा हो गया है.

कृष्णा पुनिया के कोच पति द्रोणाचार्य सम्मान पा चुके वीरेंद्र पुनिया का कहना है कि कृष्णा पुनिया के नाम पर अवॉर्ड समिति की सहमति पहले ही बन चुकी थी. लेकिन जैसे ही महिला निशानेबाज़ और ख़ुद राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी महिला निशानेबाज़ अंजलि आर.भागवत पुरस्कार समिति की सदस्य बनीं तभी से कृष्णा पुनिया के नाम की जगह रोंजन सोढ़ी का नाम चलने लगा और कृष्णा का नाम पुरस्कार सूची से काट दिया गया.

कृष्णा पुनिया ने कहा कि अगर उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है तो उनके खेल में आने का क्या फ़ायदा और ऐसे ही हालात रहे तो वह एथलेटिक्स को अलविदा भी कह सकती हैं.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए वीरेंद्र पुनिया ने कहा कि वह खेल-मंत्री से मिलने की कोशिश कर रहे हैं और कृष्णा खेलना जारी रखेंगी.

वीरेंद्र पुनिया के अनुसार अगर कृष्णा का नाम पहले प्रस्तावित नहीं होता तो उन्हें इतना दुख नहीं होता.

राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार की शुरूआत साल 1991-92 से हुई और पहली बार इसे पाने का श्रेय शतंरज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद और बिलियर्डस खिलाड़ी गीत सेठी को मिला.

उसके बाद सिडनी ओंलपिक की कांस्य पदक विजेता महिला भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी और क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी के अलावा टेनिस में लिएंडर पेस और बैडमिंटन में सायना नेहवाल और पुलेला गोपीचंद को भी मिल चुका है.

उन सबके अलावा और भी बहुत से खिलाड़ी इसे हासिल कर चुके है.

इसी बीच कई बार ऐसे खिलाड़ियों के नाम भी सामने आए जो चौंकाने वाले रहे.

'चौंकाने वाले नाम'

साल 2001 में निशानेबाज़ी में अचानक से अभिनव बिंद्रा का नाम राजीव गांधी पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ और उन्हें मिला भी लेकिन तब तक उन्होंने कोई बहुत बड़ी उप्लब्धि हासिल की हो ऐसा भी नहीं था.

इसके बाद अगले ही साल 2002 में महिला एथलीट के.एम. बीनामोल का नाम राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए चुना गया लेकिन तब महिला निशानेबाज़ अजंलि भागवत का नाम भी साथ में विवाद के रूप में जुड़ गया.

इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि आख़िरकार बीनामोल और अंजलि को संयुक्त रूप से सम्मानित किया गया.

Image caption मैरीकॉम को जब चुना गया तो पहलवान सुशील कुमार और मुक्केबाज़ विजेंद्र सिंह ने विरोध किया था.

इसके बाद कुछ वर्ष शांति से बीते लेकिन साल 2009 में महिला मुक्केबाज़ और तब तक पांच बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल कर चुकी एमसी मैरीकॉम का नाम इस सर्वोच्च पुरस्कार के लिए चुना गया, लेकिन 2008 के बीजिंग ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार और मुक्केबाज़ विजेंद्र सिंह ने विरोध की आवाज़ उठाई और आख़िरकार तीनों खिलाड़ियो को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिया गया.

इसके बाद विरोध का बिगुल बजाया गगन नारंग ने कि उन्हें इस पुरस्कार के लिए नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, तब उन्होंने भी निशानेबाज़ी छोड़ने की बात कही थी.

उन्हें आश्वस्त किया गया कि अगली बारी आपकी है और गगन नारंग को साल 2011 में यह पुरस्कार मिला.

वैसे अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो निशानेबाज़ शमरेश जंग ने साल 2006 के मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में पांच स्वर्ण एक रजत और एक कांस्य पदक के अलावा 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में भी दो स्वर्ण और तीन रजत पदक जीते हैं.

उनके अलावा समरेश जंग मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के सर्वश्रेष्ठ एथलीट भी धोषित किए गए थे. उनके अलावा एक और निशानेबाज़ जसपाल राणा ने 2006 के दोहा एशियाई खेलों में तीन स्वर्ण पदक जीतकर तहलका मचा दिया था जिनमें दो स्वर्ण पदक तो व्यक्तिगत थे.

जसपाल राणा और शमरेश जंग ने शायद ही कभी इन पुरस्कारों को लेकर अपनी आवाज़ उठाई हो लेकिन अब तो ऐसा लगता है जैसे इन्हें पाने के लिए शोर मचाना भी ज़रूरी है, वर्ना जिसे यह मिले उसके लिए पुरस्कार और जिसे नहीं मिले उसका तिरस्कार जैसा क्यों लगता है खिलाड़ियो को आजकल?

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