22 साल के कार्लसन विश्व शतरंज के नए बादशाह

मैग्नस कार्लसन

नार्वे के मैग्नस कार्लसन अब शतरंज के नए विश्व चैंपियन हैं. चेन्नई में उन्होंने पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद से यह ख़िताब छीन लिया है.

कार्लसन ने शुक्रवार को खेली गई दसवीं बाज़ी में विश्वनाथन आनंद को ड्रॉ खेलने के लिए मजबूर किया और इसी के साथ चैंपियन बनने के ज़रूरी आधा अंक भी हासिल कर लिया. इस चैंपियनशिप में कार्लसन के साढ़े छह और आनंद के कुल साढ़े तीन अंक रहे.

विश्व शतरंज चैंपियनशिप के शुरू होने से पहले ही शतरंज के जानकारों का मानना था कि पलड़ा कार्लसन का ही भारी है.

लेकिन 22 साल की उम्र में शतरंज के बादशाह बनने वाले कार्लसन के मुकाबले शतरंज के जानकारों ने आनंद को भी बहुत कम नहीं आंका था. उनके अनुसार लड़ाई 19-20 की ही थी.

लेकिन चेन्नई में विश्वनाथन आनंद के मज़बूत क़िले में कार्लसन ने ऐसी सेंध लगाई कि चैंपियन बनकर ही दम लिया.

इसके साथ ही उन्होंने दिखा दिया कि वह यूँ ही दुनिया के नम्बर एक शतरंज खिलाड़ी नहीं है.

आनंद की ग़लतियां

चैंपियनशिप में कार्लसन के दबदबे का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने चेन्नई में एक भी बाज़ी नहीं गँवाई है. उनका चैंपियन बनने की अटकलें तभी तेज़ हो गईं थीं जब उन्होंने आनंद को पांचवीं और छठी बाज़ी में मात देकर 4-2 की बढ़त हासिल कर ली.

आनंद की रही सही उम्मीदों को उन्होने नौवीं बाज़ी भी अपने नाम कर तोड़ दी और उसके बाद तो जैसे महज़ औपचारिकता बाकी रह गई थी.

महज़ 22 साल की छोटी उम्र में यह कारनामा करने वाले कार्लसन गैरी कास्पारोव के बाद दूसरे खिलाड़ी हैं.

इस तरह के बडे मुक़ाबलों में वापसी करने में माहिर माने जाने वाले और साल 2000, 2007, 2008, 2010 और 2012 के विश्व चैंपियन आनंद को कार्लसन ने बर्लिन डिफेंस के चक्रव्यूह में ऐसा फंसाया कि उसे तोड़ना तो बहुत दूर, वह उससे निकल ही नहीं सके.

जीत के पाँच कारण

जाने-माने खेल पत्रकार और शतरंज विश्लेषक वी कृष्णास्वामी कार्लसन की जीत के पांच कारण गिनाते हैं.

उनके अनुसार सबसे बड़ा कारण तो यह है कि आनंद की उम्र अब 44 साल हो चुकी है. कार्लसन 30 नवंबर को 23 साल के होंगे. युवा शक्ति कार्लसन का हथियार बनी.

दूसरा कारण आनंद का शुरूआती चालों में नाकाम होना जो उनका सबसे बड़ी ताक़त थी. कार्लसन ने उन्हें शुरआती बढ़त लेने का मौक़ा ही नहीं दिया.

तीसरा कारण कार्लसन का अंतिम चालों में बेहद मज़बूत होना रहा. अंतिम लम्हो में कार्लसन का बोर्ड पर नियत्रंण ज़बरदस्त होता है. उन्होंने कम से कम दो बार आनंद को अंतिम समय में ही मात दी.

चौथा कारण साफ दिखा कि अब शायद दबाव या उम्मीदों का भार सहना आनंद के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

पांचवां कारण विशाल अनुभव होने के बावजूद आनंद ने ऐसी-ऐसी ग़लतियां की जिसका लाभ कार्लसन को मिला.

उदाहरण के लिए नौवें गेम में जहां ड्रा होने की पूरी संभावनाएं थी वहां उन्होंने अपनी 28वीं चाल में भयंकर भूल की जिसके कारण वे हार गए और इसके साथ ही कार्लसन की जीत की पटकथा भी तैयार हो गई.

रिटायर नहीं

कार्लसन की ख़ासियतों का ज़िक्र करते हुए कृष्णास्वामी कहते हैं कि मिडिल गेम पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत है. पिछले चार-पांच वर्षों में इसी की बदौलत वह इतने बड़े खिलाड़ी होकर उभरे हैं.

मिडिल गेम के बाद जब धीरे-धीरे सारे मोहरे एक-दूसरे के साथ कटकर बाहर हो जाते हैं तब जब किंगपॉन एंडिग आता है, उसमें कार्लसन हमेशा अपने प्रतिद्वंद्वी को चकमा दे देते हैं. ऐसा ही हमें आनंद के ख़िलाफ पहले तो छठे और उसके बाद नौवें गेम में देखने को मिला.

इस हार के बावजूद भारत के शतरंज इतिहास में विश्वनाथन आनंद के योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता. इतने लम्बे समय तक शतरंज की बादशाहत बनाए रखने के बाद ताज खोने से भारत की शतरंज दुनिया में एक खालीपन तो ज़रूर पैदा होगा.

अब इसे इत्तेफाक़ कहें या कुछ और कि पिछले हफ्ते 24 साल अंतराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट को अलविदा कहा और इस हफ्ते कार्लसन ने आनंद के दबदबे का अंत किया.

इसके बावजूद आनंद अभी अपने शतरंज करियर को अलविदा नहीं कह रहे हैं. वह दिसंबर में लंदन में एक टूर्नामेंट खेलेंगे और उसके बाद अगले साल अप्रैल-मई में ज़्यूरिख़ में एक बडा टूर्नामेंट खेलने की तैयारी करेंगे.

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