क्या कार्लसन हरा सकते हैं कंप्यूटर को ?

नार्वे के मैग्नस कार्लसन चेन्नई में पांच बार के विश्व चैम्पियन भारत के विश्वनाथन आनंद को हराकर शतरंज के नए विश्व चैम्पियन बन गए हैं.

कार्लसन की प्रतिभा के आगे आनंद का अनुभव काम नहीं आ सका.

लेकिन क्या कार्लसन अपनी इसी प्रतिभा के दम पर वह कारनामा भी कर सकते हैं जिस वर्ष 1997 में शतरंज के बादशाह गैरी कास्परोव करने से चूक गए थे?

कास्पारोव के बाद सबसे कम उम्र में वर्ल्ड चैम्पियनका खिताब जीतने वाले कार्लसन के लिए यह चुनौती संभवतः आसान नहीं है.

दरअसल, हम बात कर रहे हैं शह-मात के इस खेल में ''कृत्रिम बुद्धि'' (आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस) के प्रयोग की, जिसके सामने तमाम दिग्गज खिलाड़ी धाराशायी होते रहे हैं.

डेविड लेवी की शर्त

Image caption विश्वनाथन आनंद को हराकर चैम्पियन बने कार्लसन.

कृत्रिम बुद्धि और इंसानी दिमाग के बीच मुकाबला वर्ष 1968 में शुरू हुआ जब डेविड लेवी ने शर्त लगाई कि वर्ष 1978 तक कोई भी कंप्यूटर उनको इस खेल में मात नहीं दे सकेगा और उन्होंने यह शर्त जीत भी ली.

पहली शर्त जीतने के बाद उन्होंने दूसरी बार पांच सालों के लिए शर्त लगाई, लेकिन इसके बाद उन्होंने शर्त लगाना छोड़ दिया क्योंकि उस वक्त उनको आभास हो गया कि आगे क्या होने वाला है.

साल 1997 में दुनिया के सबसे बेहतर शतरंज खिलाड़ी गैरी कास्परोव को एक विवादित सीरीज़ में आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने हरा दिया था.

आज की तारीख़ में विश्व चैम्पियन कार्लसन अगर ऐसी कोई शर्त लगाते हैं तो ''कृत्रिम बुद्धि'' के आगे उनको भी नतमस्तक होना पड़ सकता है.

जो भी हो, लेकिन इस दिशा में कंप्यूटर ने जिस तरह से प्रगति की है उससे ''कृत्रिम बुद्धि'' के भविष्य के बारे में सोचने पर मजबूर होना लाज़िमी है.

कृत्रिम बुद्धि

कंप्यूटर के मनुष्य के मस्तिष्क की तरह काम करने के इस कौशल को कृत्रिम बुद्धि नाम देने वाले अमरीकी वैज्ञानिक जॉन मैकार्थी का मानना है कि मशीनों की बुद्धि का परीक्षण करने का यह एक बेहतर तरीका है.

मैकार्थी के मुताबिक वर्ष 1962 में बना पहला चेस प्रोग्राम औसत दर्जे का था, लेकिन इसके बाद कंप्यूटर वाया कंप्यूटर के बीच के खेल ने वर्ल्ड कंप्यूटर चेस चैंपियनशिपको जन्म दिया.

पिछले 40 सालों से प्रोग्रामर्स एक-दूसरे को मात देने की रणनीति बनाने में मशगूल हैं.

दरअसल, कृत्रिम बुद्धि का मुद्दा केवल चेस तक ही सीमित नहीं है.

साल 2007 में यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में जोनाथन शेएफर की टीम ने अपने प्रोग्राम के ज़रिए मुकाबले को ड्रा करवाने में सफलता हासिल की.

करीब 18 सालों की मेहनत के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि अगर दोनों पक्ष बिल्कुल सटीक चालें चलें तो मुकाबला ड्रा हो सकता है.

हाल में कार्लसन-आनंद के बीच हुए मुकाबलों के दौरान एक कमेंटेटर ने कहा ''यह एक बहुत ही मानवीय चाल है.''

इसका मतलब यह है कि इंसान गलतियां करता है और ऐसी ही गलत चालों के कारण वह शिकस्त खाता है.

चेकमेट भूल गए

Image caption वर्ष 1997 में गैरी कास्परोव एक विवादित सीरीज़ में आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू से हार गए थे.

इतना ही नहीं ऐसी गलतियां हर क्षेत्र के दिग्गजों से होती है. साल 2006 में पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन व्लादिमीर क्रेमनिक ने एक चर्चित गलती की थी. वह अपने प्रतिद्वंद्वी को चेकमेट करना ही भूल गए.

लेकिन, कंप्यूटर ऐसा नहीं करता. प्रोग्रामर उमर सईद कहते हैं, ''जब डीप ब्लू की जीत हुई तो मुझे कास्पारोव के लिए दुख हुआ. मुझे पता है कि उनके पास कितना असाधारण दिमाग है, लेकिन वह एक कंप्यूटर को हराने में सफल नहीं हो पाए.''

सईद मानते हैं, "जब आप कंप्यूटर के लिए इस खेल को जटिल बनाते हैं तो इंसान के लिए भी यह कठिन हो जाता है."

सईद यह भी कहते हैं कि यदि आप आसान मूवमेंट अपनाते हैं तो इंसान के लिए यह गेम आसान बना रहेगा. वह शर्त लगाते हैं कि कंप्यूटर बेहतरीन खिलाड़ियों को नहीं हरा सकता.

मशीनों का पलड़ा भारी

खेल के प्रति कंप्यूटर का नज़रिया इंसान से अलग होता है.

इंसान सोच सकते हैं कि कोई ख़ास चाल ठीक है या नहीं और इसके बाद वे आगे की चालों के बारे में सोचते हुए दिमाग में इसका परीक्षण करते हैं लेकिन एक कंप्यूटर के खिलाफ वे कुछ नहीं कर सकते.

कंप्यूटर एक गलत चाल और उसके बाद की दर्जनों चालों का परीक्षण कर सकता है.

सईद का कहना है कि कंप्यूटर इंसान की तरह शतरंज खेलकर नहीं जीत सकता. वह इसलिए जीतता है क्योंकि उसके गणना करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार