'खेल संगठनों पर खिलाड़ियों का नियंत्रण क्यों नहीं?'

हॉकी
Image caption भारत में हॉकी की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है

विभिन्न खेल संगठनों में उच्च पदों पर बैठे नेताओं और व्यापारियों पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 'वे लोग खेल को नुक़सान ही पहुँचा रहे हैं'.

देश में हॉकी की स्थिति को 'बेहद ख़राब' बताते हुए न्यायालय कहा है कि उन लोगों को खेल संस्थाओं को चलाने की ज़िम्मेदारी खिलाड़ियों पर छोड़ देनी चाहिए.

न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और जे चेलामेश्वर की खंडपीठ ने कहा, "खेल को लोग निजी तौर पर चला रहे हैं. देश में खेल का नियंत्रण निजी तौर पर लोगों के पास है. क्या खेल को निजी हितों का बंधक बनाया जा सकता है?"

खंडपीठ का कहना था, "इसीलिए हॉकी का ये हाल हो गया है और जहाँ हम स्वर्ण पदक जीतते थे वहाँ अब ओलंपिक में क्वॉलिफ़ाई करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है."

खंडपीठ के मुताबिक़, "ये अधिकारी खेल की क़ीमत पर ये संगठन चला रहे हैं. उनका खेल से कोई लेना-देना नहीं है. देश में खेल की बुरी स्थिति है."

दरअसल भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ़) और हॉकी इंडिया के बीच इस बात को लेकर खींचतान चल रही है कि हॉकी के प्रबंधन पर किसका नियंत्रण हो.

याचिका

इसी संदर्भ में भारतीय हॉकी महासंघ ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है.

इस याचिका के ज़रिए वे अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की उस कार्यवाही पर रोक लगाना चाहते हैं जिसके ज़रिए इन दोनों संगठनों में से किसी एक का चुनाव देश में हॉकी का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन के रूप में होना है.

खंडपीठ ने कहा कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार खेल पर नियंत्रण नहीं रख पाई है.

आईएचएफ़ की याचिका कुछ ही देर सुनने के बाद खंडपीठ ने पूछा कि महासंघ की अगुआई कौन कर रहा है और क्या उसमें कोई ओलंपिक खिलाड़ी है?

महासंघ की ओर से पेश हो रहे वकील यू यू ललित से खंडपीठ ने पूछा, "खेल संगठनों का नेतृत्व कौन कर रहा है? वे व्यापारी हैं. समाज में कोई ओलंपिक खिलाड़ी भी है? आप लोग खेल को इतनी ख़राब स्थिति में ले आए हैं कि अब अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में टीम क्वॉलिफ़ाई भी नहीं हो पाती."

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