कितनी मजबूत है सोची में भारत की चुनौती

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Image caption शिवा केशवन का ये पांचवें शीत ओलंपिक हैं

शिवा केशवन, नदीम इक़बाल और हिमांशु ठाकुर रूस के सोची शहर में हो रहे विंटर ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

इन तीनों एथलीटों में शिवा केशवन सबसे अनुभवी हैं. शिवा केशवन ल्यूज (सिंगल्स) स्पर्धा में भाग लेंगे. उनके लिए विंटर ओलंपिक में अपना हुनर दिखाने का यह पांचवां अवसर है.

नदीम इक़बाल क्रॉस कंट्री स्कीइंग में भाग लेंगे. नदीम इससे पहले इटली में विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं.

हिमांशु ठाकुर एल्पाइन स्कीइंग में हिस्सा लेंगे. हिमांशु ठाकुर भी ऑस्ट्रेलिया में पिछले साल हुई विश्व चैंपियनशिप में भाग ले चुके हैं.

एशियाई प्रदर्शन से बढ़ी उम्मीद

शिवा केशवन शनिवार और रविवार को ल्यूज स्पर्धा में भाग लेंगे. 32 साल के शिवा केशवन साल 2011-12 में एशिया कप में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं.

इसके अलावा उन्हें पिछले महीने जापान के नागानो शहर में रजत पदक भी मिला. उनके नाम ल्यूज स्पर्धा में सबसे तेज़ रफ़्तार का एशियाई रिकॉर्ड भी है.

उन्होंने यह रिकार्ड साल 2011-12 में जापान में एशिया कप के दौरान बनाया और 134.3 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार निकाली. इससे पहले वह केवल 16 साल की उम्र में साल 1998 में जापान के नागानो शहर में हुए विंटर ओलंपिक में भाग लेकर सबसे कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करने का भारतीय रिकॉर्ड भी बना चुके हैं.

तब शिवा केशवन 28वें स्थान पर रहे थे. जापान में भारतीय उपस्थिति के नाम पर केवल शिवा ही थे.

इसके बाद साल 2002 में अमरीका के साल्ट लेक सिटी शहर में हुए विंटर ओलंपिक में भी शिवा केशवन इकलौते भारतीय थे. वहां वह 33वें स्थान पर रहे थे.

तीसरी बार विंटर ओलंपिक में शिवा केशवन ने साल 2006 में इटली में भाग लिया और 25वें स्थान पर रहे. विंटर ओलंपिक में चौथी बार उन्होंने साल 2010 में कनाडा के वेंकूवर शहर में 28वां स्थान हासिल किया.

विंटर ओलंपिक के अभी तक के आंकड़े शिवा को लेकर कोई बड़ा भरोसा नहीं जगाते लेकिन एशियाई स्तर पर उनका हालिया प्रदर्शन थोड़ी उम्मीद ज़रूर जगाता है.

तिरंगे का साया नहीं

हिमांशु ठाकुर के पास व्यक्तिगत रूप से अनुभव की कोई कमी नहीं है लेकिन उपलब्धियां हासिल करने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.

कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति क्रॉस कंट्री स्कीइंग में भाग लेने वाले नदीम इक़बाल की भी है.

वैसे भी भारत में पिछले दिनों सुविधाओं के नाम पर इनके पास कुछ ख़ास नहीं था.

यहां तक कि विंटर ओलंपिक में इस्तेमाल होने वाले बुनियादी उपकरण तक की कमी ये एथलीट महसूस कर रहे थे. ऐसे में कोई चमत्कार ही इन्हें सोची में पदक के क़रीब पहुंचा सकता है, लेकिन पहली बार विंटर ओलंपिक के इतिहास में तीन भारतीय खिलाड़ियों की मौजूदगी ने इन खेलों में भारतीय खेल प्रेमियों की दिलचस्पी तो जगा ही दी है.

इतना ज़रूर है कि भारतीय ओलंपिक संघ के निलंबन के कारण यह तीनों भारतीय एथलीट बिना तिरंगे के ही मैदान में उतरने को मजबूर हैं.

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