टीम इंडिया का कोच देसी हो या विदेशी?

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"अब समय आ गया है कि राहुल द्रविड़ को भारतीय क्रिकेट टीम का कोच बनाया जाए और टीम के वर्तमान कोच डंकन फ़्लेचर को तुरंत हटाया जाए."

पूर्व सलामी बल्लेबाज़ सुनील गावस्कर ने कुछ इन लफ़्ज़ों में नए कप्तान की ज़रूरत का सवाल उछाल दिया है.

पूर्व कप्तान गावस्कर ने एक चैनल से बातचीत में कहा कि अगर वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर और हरभजन सिंह जैसे खिलाड़ी ख़राब प्रदर्शन के आधार पर भारतीय टीम से बाहर किए जा सकते हैं तो ख़राब प्रदर्शन के आधार पर सहयोगी स्टाफ़ को क्यों नहीं हटाया जा सकता?

(क्या ज़हीर को टेस्ट क्रिकेट छोड़ देनी चाहिए?)

गावस्कर की बात को सही मानते हुए भारत के पूर्व कप्तान और कोच रहे अजित वाडेकर कहते हैं, "यह तो सभी को मालूम था कि हमें विदेशी कोच की कोई ज़रूरत नहीं है. भारतीय क्रिकेट टीम एक शानदार टीम है और सभी खिलाड़ी जानते हैं कि उन्हें किस तरह से खेलना है."

द्रविड़ और कुम्बले

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"भारतीय खिलाड़ियों को बस दिशा निर्देशों की ज़रूरत है जो उन्हें भारतीय खिलाड़ी भी दे सकते हैं, जिन्होंने अपने खेल के माध्यम से देश की सेवा की है. भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और इंग्लैंड जैसी नहीं है जिसकी बोलचाल और खान-पान एक जैसा है. भारत के खिलाड़ी देश के हर हिस्से से टीम में आते हैं, इनके लिए भारत का ही कोच होना चाहिए."

('बल्लेबाज़ों की तकनीक कमजोर')

एक कोच के रूप में राहुल द्रविड़ की बात को लेकर वाडेकर का मानना है, "द्रविड़ के साथ-साथ अनिल कुम्बले भी भारत के कोच बन सकते हैं. दोनों ही खिलाड़ी अपने अनुशासन के लिए जाने जाते हैं. हुनर तो उनके पास है ही, दोनों बेहद मेहनती भी हैं. इसके अलावा दोनों ही खिलाड़ी देश के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना रखते हैं."

उन्होंने कहा, "अगर उन्हें कुछ प्रोत्साहन मिले और उसके बाद वे टीम को उत्साहित करें तो टीम शानदार प्रदर्शन कर सकती है. द्रविड़ और कुम्बले दोनों फ़्लेचर की तरह एक खिलाड़ी के रूप में अनुभवहीन नहीं हैं. इसके अलावा दोनों खिलाड़ियों ने बहुत से कोचों को देखा है."

भारत की प्रतिष्ठा

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अब एक कोच के रूप में फ्लेचर को देखा जाए तो उनकी कोचिंग में भारत ने 30 टेस्ट मैच खेले हैं. इनमें से भारत को 12 टेस्ट मैच में जीत और 12 में ही हार का सामना करना पड़ा, जबकि छह टेस्ट मैच ड्रॉ रहे. कोच फ्लेचर और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जुगलबंदी में भारत ने विदेशी ज़मीन पर एक भी टेस्ट नहीं जीता है.

(कप्तान कोहली की टीम)

इस दौरान भारत को इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और न्यूज़ीलैंड से उन्हीं की ज़मीन पर हार का सामना करना पड़ा. एकदिवसीय क्रिकेट में डंकन फ्लेचर की कोचिंग में भारत ने 45 मैच जीते, 29 में उसे हार का सामना करना पड़ा, तीन मैच टाई रहे, तो तीन में कोई नतीजा नहीं निकला.

वैसे फ़्लेचर की कोचिंग में भारत को सबसे बडी कामयाबी इंग्लैंड में मिली जब उसने चैंपियंस ट्रॉफ़ी को अपने नाम किया लेकिन पिछले दिनों में एशिया कप में फ़ाइनल से पहले ही टीम का बाहर होना और उससे पहले न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ़्रीक़ा में एकदिवसीय सिरीज़ में एक भी मैच ना जीत पाने से भारत की प्रतिष्ठा को गहरी ठेस लगी.

कामयाबी की भविष्यवाणी

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न्यूज़ीलैंड दौरे से पहले भारतीय टीम की एकदिवसीय रैंकिंग दूसरी और न्यूज़ीलैंड की आठवीं थी.

गावस्कर के सुझाव से सहमति जताने वालो में भारत के पूर्व कोच और 1983 के विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट जीतने वाली भारतीय टीम के आलराउंडर रहे मदन लाल भी हैं. उनका कहना है कि डंकन फ्लेचर की कोचिंग में भारतीय टीम अपेक्षित परिणाम हासिल करने में नाकाम रही है.

(विवादों के चौके-छक्के)

वह कहते हैं, "भारत में तो बाक़ी कोचों के परिणाम भी अच्छे ही थे. विदेशों में भारत की नाकामी को लेकर फ्लेचर से सवाल किए जाने चाहिए. अगर यही परिणाम विदेशों में भारतीय कोच देता तो उसे तो कब का टीम से हटा दिया जाता. ऐसे में राहुल द्रविड़ या फिर सौरव गांगुली भारत के कोच बनने की क्षमता रखते हैं."

उन्होंने कहा, "वास्तव में जब कोई भारतीय खिलाड़ी टीम का कोच बनता है तो ख़ुद अधिकारी ही दूसरा खेल खेलने लगते है और उसे कैसे हटाया जाए, इस बारे में सोचने लगते हैं. इसके अलावा भारतीय कोच के अधिकार भी कम होते हैं."

मदन लाल ने कहा, "रही बात द्रविड़ की तो वह एक ईमानदार और मेहनती खिलाड़ी रहे हैं लेकिन कोच के रूप में उनकी कामयाबी की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती."

विदेशी कोच

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दूसरी तरफ़ जाने माने क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन का कहना है कि भारत जैसे देश में गुरू शिष्य परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है. ठीक है टीम में एक कोच होता है लेकिन उसका सबसे बड़ा रोल टीम को एकजुट रखना है. इतने बडे स्तर पर कोई किसी को क्या कोचिंग देगा.

(क्रिकेट का अगला सुपर पावर)

वह कहते हैं, "गैरी कर्स्टन के समय में टीम शानदार प्रदर्शन कर रही थी, अब टीम ख़राब खेल रही है तो कोच और कप्तान गाली सुन रहे हैं. डंकन की कोचिंग में भारत में तो रिकॉर्ड अच्छा ही रहा लेकिन विदेशों में दिक़्क़त आई. अगर धोनी से सवाल पूछे जा रहे हैं तो फ्लेचर से भी सवाल पूछे जाने चाहिए."

अब रहा मसला देसी और विदेशी कोच का, तो अधिकतर भारतीय खिलाड़ी एक कोच के रूप में विदेशी को ही पसंद करते हैं. उनका मानना है कि अगर कोच भारतीय होगा तो इतनी सारी ऐसोसिएशन हैं, कोई बोर्ड का आदमी होगा, वह भी अपना खेल खेलेगा, इसलिए वे चाहते हैं कि एक निष्पक्ष कोच हो, जिसको न तो राजनीति का पता हो और न ही राजनीति से कुछ लेना देना हो.

टीम में बिखराव

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रही बात राहुल द्रविड़ की तो वह ख़ुद ही शायद कोच बनना न चाहें. वह इन खिलाड़ियों के साथ खेल चुके हैं ऐसे में इनके साथ रहकर इन्हें ही कोचिंग करना आसान नही है. राहुल द्रविड़ तो अपनी कप्तानी भी छोड़ कर चले गए थे, उन्हें लगा कि वह खिलाड़ियों को नहीं संभाल सकते तो वह टीम को क्या संभालेंगे?

(भारतीय टीम को हारने की लत क्यों लगी?)

भारत को कोई ऐसा खिलाड़ी ढूंढना पडेगा जो भले ही बड़ा खिलाड़ी ना हो लेकिन पूर्वाग्रह ना रखता हो, बोर्ड के किसी ऐजेंडे के साथ ना आए.

दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि बाहर से कोई चाहे कुछ भी कहता रहे लेकिन टीम के खिलाड़ियों में यह बात नहीं आनी चाहिए कि कप्तान अपनी चला रहा है या अपने चहेते खिलाड़ियों को खेला रहा है, अगर ऐसा हो तो टीम में बिखराव आना लाज़िमी है. ऐसे में कप्तान का हटना भी ज़रूरी है.

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