कॉमनवेल्थ खेल: किसी को करोड़ों, कोई हाथ खाली

  • 2 अगस्त 2014
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आप कैसा महसूस करेंगे जब आपने और आपके साथी ने किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक साथ झंडा गाड़ा हो. आपके दोस्त को बड़ी रकम इनाम के तौर पर मिले, आपको कुछ न मिले.

ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ खेलों में मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों का कुछ ऐसा ही हाल है.

(योगेश्वर और बबीता को सोना)

हरियाणा के पदक विजेताओं को राज्य सरकार ने गोल्ड मेडल के लिए एक करोड़ रुपए और सिल्वर मेडल के लिए 50 लाख रुपए देने की घोषणा की है.

जब मैंने कुछ महिला खिलाड़ियों से इस बारे में बात करने की कोशिश की तो पाया कि वे किसी विवाद में खींचे जाने से हिचक रही थीं.

लेकिन रजत पदक जीतने वाली आंध्र प्रदेश की एक महिला खिलाड़ी ने बताया कि उनकी राज्य सरकार ने सिल्वर मेडल के लिए सात लाख रुपए देने की बात कही है.

(पुरुषों से लड़ने वाली महिला बॉक्सर)

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उत्तर प्रदेश सरकार ने क्या घोषणा की है, जवाब मिला, "कुछ नहीं." लेकिन मणिपुर की महिला खिलाड़ियों ने इस बहस में शामिल होने से इनकार कर दिया.

यह 31 जुलाई की बात है जब मैं इन लड़कियों से मिला था और उन्होंने बहुत गर्व के साथ अपनी ट्रॉफ़ियां दिखाई थीं.

डरावने बलात्कार भारत में ही क्यों?

कोलिन रीड फ़ोटोग्राफ़र हैं और जमैका से हैं. उन्हें हिंदुस्तानी करी बेहद पसंद है और भारतीय मूल के कई पड़ोसी परिवारों को जानते हैं.

(कॉमनवेल्थ खेलः 13 सुनहरे भारतीय)

कोलिन का ख्याल है कि हिंदुस्तानी दूसरी संस्कृतियों और कानूनों की इज़्ज़त करते हैं. बेशक वे जमैका में रहने वाले भारतीयों के बारे में बात कर रहे थे.

वे अचानक ही ऐसा सवाल पूछ लेते हैं कि मैं चौंक जाता हूँ. वे पूछते हैं, "इतने भयानक बलात्कार भारत में ही क्यों हो रहे हैं."

इसका कोई सीधा जवाब नहीं है. शर्मिंदगी महसूस करते हुए मैंने जवाब देने से बचने की कोशिश की.

('किसी को भी पटक सकता हूँ')

हालांकि कोलिन के पास इसका अपना जवाब था, "आपके पास शादी के लिए पर्याप्त संख्या में औरतें नहीं हैं. मैंने सुना है कि बेटों को तरजीह देने की वजह से कई लड़कियों को उनके जन्म से पहले ही गिरा दिया जाता है."

ज़रूरी नहीं कि भारत में बलात्कार के बढ़ते मामलों के पीछे केवल यही एक वजह रही हो. लेकिन बाहरी दुनिया में भारतीयों को इसी तरह देखा जा रहा है.

खेल गाँव ग़रीबों और बुज़ुर्गों को

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आपको 2010 के दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के लिए बनाए गए फ़्लैट्स याद हैं. वे आरामदेह फ़्लैट्स खास लोगों ने ढाई करोड़ या इससे ज़्यादा देकर झपट लिए थे.

(हमें नौकरी दिलवा दो सर)

और यहाँ देखिए, स्कॉटलैंड सरकार ने क्या किया. दिल्ली की तुलना में उन्होंने इन खेलों पर थोड़ी रकम ही खर्च की.

खिलाड़ियों के रहने के लिए बनाए गए 700 नए फ़्लैट बाज़ार दर पर बेचे जाने हैं जबकि 400 फ़्लैट्स रियायती किराये पर ग़रीबों, बेरोज़गारों और कम आमदनी वाले पेशों से जुड़े लोगों को देने की बात कही गई है.

ग्लासगो के खेल गाँव के कुछ फ़्लैट्स को 120 बिस्तरों वाले वृद्धाश्रम में भी बदला जाएगा.

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