'टीम इंडिया को शायद माफ़ नहीं कर पाऊंगा'

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मैंने अमरीका में रहने वाले अपने बेटों के साथ संसद के बजट सत्र के बाद लंदन में छुट्टियां बिताने के लिए भारत और इंग्लैंड के बीच ओवल टेस्ट का समय चुना.

यह सिरीज़ का आख़िरी मैच था जिसमें युवा और प्रतिभाशाली भारतीय टीम का मुक़ाबला श्रीलंका के हाथों हाल में हारी हुई अंग्रेज़ टीम से था.

हमें लगा कि समय गुजारने का इससे अच्छा मौक़ा नहीं हो सकता. लेकिन जैसा हम सोच रहे थे वैसा कुछ नहीं हुआ.

हमें आशंका थी कि इंग्लैंड का मौसम हमारी योजनाओं पर पानी फेर सकता है. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. भारतीय टीम ने किया.

क्रिकेट का खेल अपनी अनिश्चतताओं के लिए जाना जाता है लेकिन इस मैच में भारतीय टीम ने इतना घटिया प्रदर्शन किया जितना आप सोच सकते हैं.

युवा खिलाड़ियों से सजी भारतीय टीम ने ढाई दिन में ही शर्मनाक ढंग से आत्मसमर्पण कर दिया.

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जब हमने अपने हवाई टिकटें बुक कराई थीं तो भारत लॉर्ड्स टेस्ट में शानदार जीत के साथ सिरीज़ में 1-0 से आगे था.

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जब हम ओवल पहुंचे तो टीम इंडिया सिरीज़ में 1-2 से पिछड़ चुकी थी. टीम दो मैच शर्मनाक ढंग से हार चुकी थी और मेरे जेहन में 2011 की यादें ताज़ा हो गईं जब टीम इंडिया को इंग्लैंड दौरे में 0-4 की हार झेलनी पड़ी थी.

सिरीज़ की शुरुआत में कोई ऐसे परिणाम की उम्मीद नहीं कर रहा था.

ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के हाथों हार के बाद इंग्लिश टीम झंझावातों से गुजर रही थी.

लॉर्ड्स टेस्ट में हार के बाद कप्तान एलेस्टेयर कुक को हटाने और इंग्लिश क्रिकेट में आमूलचूल परिवर्तन की मांग बलवती हो गई.

ऐसा कहा जा रहा था कि कुक की कुर्सी अगले टेस्ट के लिए सिर्फ़ इसलिए बच गई क्योंकि टीम के पास उनका कोई विकल्प नहीं था.

संजीवनी

दूसरी तरफ़ भारत ने तीन सालों से उपमहाद्वीप के बाहर कोई मैच नहीं जीता था. लॉर्ड्स पर जीत कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उनके युवा तुर्कों के लिए संजीवनी मानी जा रही थी.

साउथैम्पटन में टॉस जीतने के बाद बल्लेबाज़ी करने उतरे कुक ने अपना पहला टेस्ट खेल रहे तेज़ गेंदबाज़ पंकज सिंह की गेंद को रवींद्र जडेजा के सुरक्षित हाथों में खेल दिया.

अगर जडेजा यह कैच पकड़ लेते तो कुक एक बार फिर सस्ते में आउट हो जाते और इंग्लिश टीम का गिरा हुआ मनोबल गोता खाकर और नीचे गिर जाता और लॉर्ड्स की कहानी दोहराई जाती.

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लेकिन गेंद जडेजा के हाथों से उछल गई और कुक ने इस जीवनदान का फ़ायदा उठाते हुए 95 रन की आत्मविश्वास लौटाने वाली पारी खेली.

इसके बाद बैलेंस और बेल से शतक जमाए. भारत के शीर्ष आठ बल्लेबाज़ों में से सात ने 20 से ज़्यादा रन बनाए लेकिन कोई भी 54 से आगे नहीं गया.

दूसरी पारी में भारतीय टीम ताश के पत्तों की तरह बिखर गई और 266 रन की हार झेलकर उसने इंग्लैंड को सिरीज़ में 1-1 से बराबरी करने का मौका दे दिया.

हीरो से ज़ीरो

ओल्ड ट्रैफर्ड में अगले टेस्ट में टीम इंडिया की और भी दुर्गति हुई जब इंग्लैंड ने पारी और 54 रन से जीत हासिल की. भारत के युवा तुर्क कुछ ही दिनों में हीरो से ज़ीरो बन गए.

टीम के छह बल्लेबाज़ शून्य पर आउट हुए और इस तरह उन्होंने एक अनचाहे रिकॉर्ड की बराबरी कर ली. टीम में नए जोश की उम्मीद में मैं और मेरे बेटे ओवल पहुंचे थे.

कुक ने इस मैच से कप्तान और बल्लेबाज़ के रूप में अपनी प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित कर दी जबकि भारतीय टीम ने हमें निराश किया.

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विराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा को भारतीय क्रिकेट का भविष्य माना जा रहा था.

कोहली को तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी के लिए राहुल द्रविड़ के और पुजारा को चौथे नंबर के लिए सचिन तेंदुलकर के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा था.

पुजारा ने ट्रेंट ब्रिज में सिरीज़ के पहले मैच में 38 और 55 रन की पारियां खेली. उसके बाद उनका स्कोर क्रमशः 28, 43, 24, 2, 0, 17, 4 और 11 रहा.

परिस्थितियां

कोहली का प्रदर्शन तो और भी खराब रहा. उनके खाते में एक भी अर्द्धशतक नहीं है और वह 1, 8, 25, 0, 39, 28, 0, 7, 6 और 20 रन की पारियां ही खेल सके.

नौवें नंबर पर बल्लेबाज़ी करने वाले भुवनेश्वर कुमार का औसत इन दोनों बल्लेबाज़ों से बेहतर रहा.

हां कुछ बहाने ज़रूर मौजूद हैं. भारत को टॉस और मौसम, दोनों का साथ नहीं मिला.

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तीन बार टीम इंडिया को ऐसी परिस्थितियों में बल्लेबाज़ी करनी पड़ी जो इंग्लैंड के स्विंग गेंदबाज़ों के अनुकूल थीं.

ओवल में पहले दिन लगभग सर्दियों जैसी स्थिति थी और फिर इंग्लैंड के बल्लेबाज़ी करते समय सूरज निकल आया था. भारतीय टीम फिर जैसे ही दूसरी पारी खेलने उतरी सूरज इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ों की मदद के लिए बादलों में छिप गया.

नाकामी का बहाना

लेकिन केवल इसे भारतीय बल्लेबाज़ों की लगातार नाकामी का बहाना नहीं बनाया जा सकता है.

एकाध बार 200 से कम के स्कोर पर आउट हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण माना जा सकता है लेकिन लगातार पांच बार ऐसा होना अकुशलता नहीं तो लापरवाही लगती है.

साउथैम्पटन में दूसरी पारी के बाद भारतीय टीम का स्कोर 178, 152, 161, 148 और 94 रहा. पिछले चार दशकों में भारतीय टीम ने कभी ऐसे स्कोर नहीं किए हैं.

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इसके बरक्स इंग्लैंड का प्रदर्शन देखें तो शर्म और बढ़ जाती है. हर बार टीम इंडिया की हार का अंतर बढ़ता गया. साउथैम्पटन में 266 रन से, मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड में पारी और 54 रन से और लंदन के दि ओवल में पारी और 244 रन से.

तो क्या टीम पर मेरा और मेरे बेटों का ग़ुस्सा जायज़ है? जब मैंने दो महीने पहले इस सिरीज़ का पूर्वावलोकन लिखा था तो कहा था, "दिग्गजों के जाने के बाद आज की टेस्ट टीम पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रही है और संभव है कि इसका प्रदर्शन 2011 की टीम की तरह हो. तब इंग्लिश गेंदबाज़ों की तेज़ी और स्विंग से भारतीय टीम को चारों टेस्ट में हार झेलनी पड़ी थी."

धोनी की टीम को मेरी उम्मीदों पर खरा उतरना था.

बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद

फिर भी भारतीय प्रशंसकों को धोनी की टीम से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी.

उन्हें उम्मीद थी कि युवा खिलाड़ी पिछली बार के बुढ़ाते खिलाड़ियों की तरह आसानी से आत्मसमर्पण नहीं करेंगे और अधिक साहस, आत्मविश्वास का परिचय देंगे और अपनी प्रतिभा से आगे जाकर प्रदर्शन करेंगे.

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लॉर्डस में जीत ने उनकी इन उम्मीदों के पंख लगा दिए थे कि पुराना डर नाहक है और टीम का पुनरुत्थान होने लगा है. लेकिन सिरीज़ के दूसरे हाफ में टीम के शर्मनाक आत्मसमर्पण ने उन उम्मीदों को ज़मींदोज़ कर दिया.

धोनी को अब इंग्लैंड में वनडे और ट्वेंटी-20 खेलना है जिसमें उन्हें महारत हासिल है.

टीम में कुछ नए खिलाड़ी जुड़ेंगे और इन दोनों प्रारूपों में टेस्ट की तुलना में कम दमखम की ज़रूरत होती है. अगर टीम अच्छा करती है तो भारतीय प्रशंसक टेस्ट सिरीज़ की निराशा को भूल जाएंगे.

लेकिन ओवल टेस्ट के अंतिम दो दिनों के टिकटों पर खीझ निकाल रहे मेरे बेटे और मैं टीम इंडिया को शायद माफ़ नहीं कर पाऊंगा.

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