एक खेल जो युद्ध की खाइयों में फला फूला

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इस खेल का आविष्कार एक शताब्दी पहले एक जर्मन नागरिक ने किया गया था, लेकिन इसे लोकप्रियता हासिल हुई प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के सिपाहियों के बीच.

सिपाहियों के तकिया क़लाम पर ही इसका नाम पड़ गया- मुझसे गुस्सा मत होना.

हालांकि इसी तरह का एक खेल 16वीं शताब्दी में भारत में चौपड़ या चौसर के नाम से जाना जाता था और ऐसा ही एक खेल ईसापूर्व तीसरी शताब्दी में मध्य मैक्सिको की जनजातियों में भी प्रचलित था.

इस खेल का एक नया रूप है लूडो जो तमाम देशों में आज भी खासा लोकप्रिय है. इस खेल के आविष्कार और लोकप्रिय होने की बहुत ही दिलचस्प कहानी है.

स्टीफन इवांस की रिपोर्ट

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लोकप्रिय हुआ एक खेल, आज कम्प्युटर युग में भी लोगों का पसंदीदा बना हुआ है.

इसका आविष्कार क़रीब एक शताब्दी पहले जर्मनी में हुआ था और जर्मन सिपाहियों में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था.

सिपाहियों के घरवाले निर्माताओं से इस खेल को बनाने का आदेश देते और वे सीधे मोर्चे पर इन्हें पार्सल कर देते.

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इसका नाम था- मेंश एअरगेरे डिच निच (मुझसे गुस्सा मत होना).

असल में खेल का यह तकिया-क़लाम था क्योंकि एक बोर्ड पर गोटियों को खिसकाया जाता था और दूसरे खिलाड़ी की गोटियों की जगह पर आते ही उसे हटा दिया जाता था.

'गुस्सा मत होना'

आप सोच रहे हों कि आप का खेल अच्छा जा रहा है और तभी आपके विपक्षी की गोटी, जो आपका कोई परिजन है, आपकी गोटी के ऊपर आ जाती है और फ़िर से अपने खेमें में लौट जाते हैं. और तब विपक्षी का भाव यही होता है- ''मुझसे गुस्सा मत होना.''

मैं चेकोस्लोवाकिया सीमा के नज़दीक ज़ूल कस्बे में एक टूर्नामेंट में गया था. वहां सात से लेकर सत्तर साल तक के लोग एक साथ बैठककर पासे फ़ेंकते थे और एक दूसरे को 'मेंश एअरगेरे डिच निच' कहते हुए ज़ोर से चिल्लाते थे.

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इस खेल को म्युनिख शहर के एक कर्मचारी जोसेफ़ फ्रेड्रिक श्मिट ने बनाया था. उनके तीन बच्चे थे जिन्हें व्यस्त रखने के लिए उन्होंने पासा और गोटियों वाले इस खेल का आविष्कार किया. यह एक ऐसा खेल था जिसमें उनके पड़ोसियों के बच्चे भी शामिल हो सकते थे.

लोकप्रियता

इस शुरुआती मनोरंजन के कुछ सालों बाद उन्होंने इसे बाज़ार में उतारने का फ़ैसला किया, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध में ही लोकप्रिय हो पाया.

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Image caption मध्य मैक्सिको में ऐसा ही एक खेल स्थानीय जनजातियों में प्रचलित था.

श्मिट ने इसकी सैकड़ों प्रतियां उन अस्पतालों में भिजवाईं जहां युद्ध में घायल हुए सिपाहियों का इलाज़ होता था.

तबसे एक सदी बीत गई लेकिन इसकी बिक्री में कोई कमी नहीं आई.

इस खेल का एक अन्य प्रकार लूडो के रूप में ब्रिटेन समेत अन्य देशों में भी खेला जाता है.

इस खेल का पुराना रूप ईसापूर्व तीसरी शताब्दी का माना जाता है, जिसे पैटोली या पैटोले कहा जाता है जो मध्य मैक्सिको का प्राचीन खेल हुआ करता था.

इसी तरह का खेल प्राचीन भारत में हुआ करता था जिसे चौपड़ या चौसर कहते हैं. इसके बारे में 16वीं शताब्दी में पहली बार पता चला लेकिन इसे और पुराना माना जाता है.

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