जब भैंस-बकरी चराते थे जीतू राय

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भारत को एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक दिलाने वाले जीतू राय का बचपन नेपाल में ग़रीबी में बीता.

वरिष्ठ खेल पत्रकार नौरिस प्रीतम से बातचीत में उन्होंने कई बातें साझा कीं.

पढ़िए ये बातचीत जीतू राय की ज़ुबानी

मुझे बचपन में पढ़ने का समय नहीं मिलता था. मैं भाग भाग कर नौ बजे स्कूल पहुंचता था.

वहां पहुंच कर टाइम पास करता था क्योंकि ये पता नहीं था कि कैसे पढ़ना है.

जब घर वापस आता था तो मां बोलती थी कि घर में पड़ा बासी भात खा कर भैंस या बकरी चराने चले जाओ.

गोरखा रेजिमेंट में भर्ती

मेरा जन्म नेपाल में हुआ और मेरी इच्छा थी कि मैं गोरखा रेजिमेंट ज्वॉइन करूं. इसलिए मैं भर्ती होने भारत आ गया.

मैंने सोचा था कि ब्रिटिश आर्मी ज्वॉइन करूँगा लेकिन उसकी भर्ती एक दिन बाद होने वाली थी इसलिए सोचा पहले भारतीय आर्मी में ही कोशिश कर लूँ.

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मैं पहले ट्रायल में ही भारतीय आर्मी में चयनित हो गया तो इसी में सेवा जारी रखी.

मैंने कभी इस मुक़ाम के बारे में नहीं सोचा था, मेरे लिए तो गोरखा रेजिमेंट में भर्ती होना ही काफ़ी था.

एशियाई खेलों में तो गोल्ड मेडल जीत लिया. अब आने वाले वर्ल्ड कप और ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करना चाहता हूँ.

जैसा था वैसा ही हूँ

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की ओर से 50 लाख के ईनाम की घोषणा से मैं बहुत ख़ुश हूँ. इससे मैं प्रेरित हुआ कि आगे भी अच्छा प्रदर्शन करूँ .

मैं सोच रहा हूँ कि इस पैसे से लखनऊ में ज़मीन खरीद लूँ क्योंकि लखनऊ में मुझे रहना अच्छा लगता है.

मैं लखनऊ में ट्रेनिंग करके ही यहां तक पहुँचा हूँ. शादी के बारे में मैंने अभी नहीं सोचा है.

इस पदक के बाद ओलंपिक में पदक जीतना भी मेरा कर्तव्य है. इसे मुझे निभाना पड़ेगा.

और मुझे ऐसा नहीं लगता है कि पदक जितने के बाद मेरा भाव बढ़ गया है. मैं जैसा था वैसा ही हूँ.

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