पूर्वोत्तर भारतः उम्मीदों वाली फ़ुटबॉल!

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फ़ुटबॉल टीम 'नॉर्थ यूनाइटेड एफ़सी' के समर्थन में 12 अक्तूबर को आठ अलग-अलग राज्यों से हज़ारों लोग गुवाहाटी के इंदिरा गांधी स्टेडियम पहुंचे थे.

नॉर्थ यूनाइटेड एफ़सी इंडियन सुपर लीग (आईएसएल) में भाग लेने वाली आठ टीमों में से एक है.

आईएसएल, क्रिकेट के दीवाने इस देश में फ़ुटबॉल की लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए दस हफ़्ते तक चलने वाला टूर्नामेंट है.

मुकेश अधिकारी का विश्लेषण

इस मौक़े पर लोगों को निराश भी नहीं होना पड़ा क्योंकि घरेलू टीम ने केरल की टीम को 1-0 से मात दी.

जानकारों का मानना है कि इस जनसैलाब का उमड़ना उन लोगों की एकजुटता की भावना को दर्शाता है जो अक्सर देश के दूसरे हिस्से में अपने आप को उपेक्षित पाते हैं.

जोड़ने की कोशिश

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भारत के उत्तर-पूर्व में आठ राज्य आते हैं.

'नॉर्थ यूनाइटेड एफ़सी' टीम के मालिक और बॉलीवुड अभिनेता जॉन अब्राहम का कहना है, "देश का यह भाग भारत के दूसरे हिस्सों से हमेशा अलग-थलग रहा है. नॉर्थ यूनाइटेड एफ़सी के माध्यम से कोशिश यह है कि उत्तर पूर्व को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ा जाए."

जानकारों का कहना है कि यह दूरी असम और मेघालय में हाल में आई बाढ़ के वक्त देखने को मिली जिसमें कई लोगों की जान गई थी.

इसके विपरीत कश्मीर में आई बाढ़ को मीडिया में खूब जगह मिली जबकि उत्तर पूर्व में आई प्राकृतिक आपदा को मीडिया में उतनी तवज्जो नहीं दी गई.

पूर्वोत्तर में बाढ़

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Image caption पूर्वोत्तर के मुद्दों को मीडिया में कम जगह मिलने की शिकायत लंबे समय से की जाती रही है.

स्तम्भकार संजीब बरुआ ने 'द एशियन एज' में लिखा है, "राष्ट्रीय मीडिया ने जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ को पूरी तत्परता के साथ हर नज़रिए से चौबीसो घंटे दिखाया. वहीं दूसरी तरफ असम और मेघालय की बाढ़ को कम मीडिया कवरेज मिली."

उत्तर पूर्व के लोग और भी कई तरह की समस्याओं का सामना कर रहे हैं.

देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले उत्तर पूर्व के लोगों के साथ नस्लीय भेदभाव की घटनाएं सुर्खियां बटोरती रहती हैं.

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक़ 14 अक्तूबर को बंगलुरु में उत्तर पूर्व के तीन छात्रों को कन्नड़ नहीं बोलने के कारण पिटाई की गई है.

सकारात्मक कदम

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रिपोर्ट के मुताबिक़ ऐसा देश के दूसरे शहरों में साल भर होता रहता है.

स्थानीय स्तर पर वे अलगाववाद की समस्या से जूझ रहे हैं, जिसे हथियारबंद समूहों ने और ख़राब कर दिया है.

यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम जैसे अलगाववादी समूह और अन्य संगठन कई सालों से हिंसक आंदोलन चला रहे हैं.

भारतीय सेना पर, जिन्हें इस उग्रवाद से लड़ने के लिए विशेष अधिकार दिए गए हैं, अक्सर मानवाधिकारों के हनन का आरोप लगता रहता है.

कई मौकों पर लोग सेना की निरंकुशता के ख़िलाफ़ सड़कों पर निकले हैं.

इस सब के बीच उत्तर पूर्व की अपनी एक टीम का होना एक सकारात्मक कदम है.

उम्मीदों वाली फ़ुटबॉल

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लेकिन इस बारे में उत्तर पूर्व के लोग क्या महसूस करते हैं?

गुवाहटी के रहने वाले मुकुंद उपाध्याय का कहना है, "मैं बहुत खुश हूं कि हमारे पास अपनी एक फ़ुटबॉल टीम है. आगे ये सारी बाधाओं को तोड़कर लोगों का दिल जीतने में कामयाब होगी."

हालांकि उपाध्याय महसूस करते हैं कि आने वाले सालों में 'शोषण और भेदभाव' के साथ-साथ फ़ुटबॉल उम्मीद को बरकरार रखेगी.

इम्फाल के अब्दुल गफ़्फ़ार इसे लेकर बहुत आशान्वित नहीं है.

उनका कहना है, "आईएसएल से पहले उत्तर पूर्व के कई खिलाड़ी चोटी के क्लबों में खेल रहे थे लेकिन क्या इससे हमारे लोगों का कुछ भला हुआ? नहीं."

खचाखच भीड़

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शिलॉन्ग के रैमसॉग महसूस कहते हैं कि उत्तर पूर्व के प्रति लोगों का नजरिया बदलने में समय लगेगा.

उनका कहना है, "मुझे भारत की आने वाली पीढ़ी से सिर्फ उम्मीद है. शायद उन्हें हमारे बारे में भ्रांतियां नहीं होंगी."

कई तरह के विचारों के बावजूद स्टेडियम में मौजूद खचाखच भीड़ इस बात का प्रमाण है कि उत्तर पूर्व के अधिकांश लोग फ़ुटबॉल क्लब को लेकर बहुत खुश है.

हालांकि क्लब की सफलता आईएसएल की सफलता पर निर्भर करेगा जो कि खेल के साथ-साथ फायदा कमाने का ज़रिया भी है.

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