सरिता का साथ देना कितना जायज?

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भारतीय महिला मुक्केबाज़ सरिता देवी शायद सोने का पदक जीतकर इतनी सुर्ख़ियां नहीं बटोरती जितनी उन्होंने कांस्य पदक न लेकर बटोरी हैं.

पहले इंचियोन में और उसके बाद भारत लौटने पर सरिता ने इंचियोन एशियाई खेलों के आयोजकों पर तरह-तरह के इल्ज़ाम लगाए.

उनकी हताशा को समझा जा सकता है क्योंकि इसमें कोई दो राय नहीं कि सेमीफाइनल में सरिता कोरियाई बॉक्सर पर भारी पडी थीं और उन्हें विजयी घोषित किया जाना चाहिए था.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग महासंघ द्वारा सरिता और अन्य भारतीय अधिकारियों पर प्रतिबंध लगने के बाद तो यह घटना एक तमाशा बन गयी है.

लेकिन उसके बाद जो हुआ क्या वह सही था? क्या इस मामले में अधिकतर भारतीयों की आक्रामक प्रतिक्रिया वाजिब है?

नॉरिस प्रीतम का आकलन

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भारत में जिसे देखो वही सरिता के हक़ में ज़ोरदार आवाज़ उठा रहा है और नेताओं को भी अपने प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने का अच्छा मौका मिल गया है.

पूर्व खेल मंत्री अजय माकन ने सरकार से मांग की है कि वह सरिता के मामले को अंतरराष्ट्रीय बॉक्सिंग महासंघ के सामने उठाया जाए.

इंचियोन में और भारत में भी यह कहा जा रहा था कि सरिता के साथ इसलिए अन्याय हुआ क्योंकि वह पूर्वोत्तर राज्य की हैं. यह बिल्कुल बेतुकी बात है.

सरिता पर प्रतिबध इसलिए नहीं लगा कि उन्होंने निर्णायकों के फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई बल्कि इसलिए लगा क्योंकि पदक वितरण समारोह में अपना पदक कोरियाई बॉक्सर के गले में डाल दिया था.

यह सरासर अनुशासनहीनता है जिसका ख़ामियाज़ा सरिता भुगत रही हैं.

अनुशासनहीनता

शायद आम जनता को मालूम नहीं कि खेलों का एंट्री फॉर्म भरते समय खिलाडी दस्तख़त करके यह भी आश्वासन देते हैं कि वे खेलों की मर्यादा और अनुशासन का पालन करेंगे.

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जहां तक सिर्फ़ निर्णायकों के ख़िलाफ़ बोलने की बात है तो कई देशों के खिलाड़ियों और अधिकारियों ने कोरिया के आयोजन के ख़िलाफ़ बोला था.

फ़ुटबॉल में थाईलैंड ने कोरिया से हारने के बाद बेईमानी की बात की तो ईरान ने कुश्ती में कोरिया के ऊपर इल्ज़ाम लगाए.

बैडमिंटन में कोरिया से हारने के बाद चीन के कोच ली योंगबो ने खुलेआम कोरिया के अधिकारियों पर इल्ज़ाम लगाया कि उन्होंने हॉल की एयर कंडीशन की इस तरह ऑपरेट किया कि हवा से कोरिया के विरुद्ध खेलने वालों को नुक़सान हो.

लेकिन उन पर प्रतिबंध नहीं लगा? क्योंकि उन्होंने अनुशासन नहीं तोड़ा.

हंगामा

सोचिए कि अगर सरिता की जगह कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी होता और भारतीय राष्ट्रगान की धुन के समय अपना पदक किसी और खिलाड़ी को देता तो क्या होता? पूरे देश में हंगामा हो जाता.

टीवी स्टूडियो में बैठ कर मूछों पर ताव देने वाले ब्रिगेडियर और जनरल पाकिस्तान पर अटैक करने की बातें करते.

क्या माकन और बाक़ी सब लोग चाहते हैं कि सरिता की अनुशासनहीनता को दरकिनार करके उनके हक़ में आवाज़ उठाई जाए?

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ऐसा भी नहीं है कि सरिता ने यह सब उत्तेजित होकर अचानक किया हो. इंचियोन में उनके पति मौजूद थे. उन्होंने पहले ही कह दिया था कि सरिता मेडल नहीं लेंगी और यह बात सब को मालूम थी.

बड़ी संख्या में फ़ोटोग्राफर सारे इवेंट छोड़ कर बॉक्सिंग हॉल में आ गए थे.

वाजिब तरीक़ा

एक पत्रकार ने सरिता से कहा भी था कि अगर वह चाहें तो गेम्स के मेन प्रेस सेंटर में एशियाई मीडिया के सामने उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस की जा सकती है ताकि वह अपनी बात सबके सामने रख सकें.

यह एक वाजिब तरीक़ा था और सरिता या किसी भी खिलाड़ी को इसका हक़ है.

लेकिन सरिता ने दूसरा तरीक़ा अपनाया. ऐसे में अजय माकन और बाक़ी नेता क्या कहना चाहते हैं? पहले भारतीय खिलाडी अनुशासन तोड़ें और फिर कहें कि देश उनका साथ दे?

पूरी घटना में किसी हद तक इंचियोन में मौजूद कुछ भारतीय पत्रकार भी दोषी हैं.

खेल का मैदान

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पहले तो मज़ेदार बाइट के चक्कर में उन्होंने सरिता और उसके पति को उकसाया और जब सरिता ने मेडल लेने से इन्कार कर दिया तो उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया.

सरिता का मेडल थोड़ी देर विक्टरी स्टैंड पर पड़ा रहा और जब एक वॉलंटियर उसे उठा कर ले जा रहा था तो कुछ भारतीय पत्रकारों ने आयोजकों को गालियां देनी शुरू कर दी और उन्हें चोर बोला.

अगर सरिता ने मेडल नहीं लिया था तो आयोजको को उसे विक्टरी स्टैंड से तो उठाना ही था.

शायद पत्रकारों को पता नहीं था की खिलाड़ियों की तरह वे भी अनुशासन मानने के लिए बाध्य होते हैं.

आयोजकों के या किसी और के ख़िलाफ़ लिखने या बोलने के लिए उनके पास अपना अख़बार या चैनल होता है, खेल का मैदान नहीं.

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