महिलाओं का मर्दानापन या कुदरत की नाइंसाफ़ी

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भारत की युवा एथलीट दुती चाँद का शारीरिक बदलाव के कारण अंतरराष्ट्रीय खेलों से बाहर किया जाना इस प्रकार का पहला मामला नहीं है.

1978 के बैंकॉक एशियन गेम्स में भारत की एक स्प्रिंटर को जेंडर टेस्ट में फेल हो जाने के कारण खेलों से बाहर किया गया था.

नौबत यहाँ तक आ गई थी की वो खिलाड़ी होटल की खिड़की से कूदकर आत्महत्या करना चाहती थीं.

लेकिन वहाँ मौजूद कोच की सूझबूझ और कुछ अन्य खिलाड़ियों की मदद से उस एथलीट को बीमारी के बहाने वापस भारत भेज दिया गया और किसी की भनक तक नहीं लगी.

नॉरिस प्रीतम का विश्लेषण

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Image caption भारत की शांति सुंदरराजन ने 2006 के एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था लेकिन जेंडर टेस्ट में फेल कर जाने की वजह उनसे पदक छीन लिया गया. एक साल बाद उन्होंने ख़ुदकुशी करने की कोशिश की.

1980 के दशक में एक और स्प्रिंटर नैनी राधा नामक खिलाड़ी का मामला सामने आया. बतौर महिला उन्होंने देश में कई खिताब जीते.

नैनी राधा को तेज़ी से बदलती उनकी शारीरिक बनावट के कारण महिला वर्ग में भाग लेने से रोक दिया गया.

बाद में ऑपेरशन करवाकर वो राधा से राधाकृष्णन बन गईं और एक पुरुष की तरह ज़िंदगी गुज़ारने लगीं.

तीसरा मामला तब सामने आया जब 1990 के बीजिंग एशियन गेम्स में एक महिला हॉकी खिलाड़ी को लिंग टेस्ट फेल करने के कारण प्रतियोगिता छोड़ कर वापस भारत आना पड़ा.

लेकिन ये तीनों मामले उस समय के हैं जब खेलों में महिलाओं के लिए जेंडर टेस्ट या लिंग परीक्षण अनिवार्य था. यह टेस्ट एक तरह से नर और नारी का चयन करता था.

इस टेस्ट के दौरान महिला खिलाड़ी को विशेषज्ञों और डॉक्टरों के बोर्ड के सामने जाना पड़ता था और ये विशेषज्ञ खिलाड़ी के बाकायदा निजी अंगो का परीक्षण करके तय करते थे कि आने वाली वो खिलाड़ी महिला वर्ग में भाग ले सकती है या नही.

हार्मोन टेस्ट

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Image caption कास्टर सेमेन्या के मामले में भी जेंडर टेस्ट की बात उठी थी.

1973 के मॉन्ट्रियल ओलम्पिक खेलों में ब्रिटेन की राजकमारी ऍन ने घुड़सवारी में हिस्सा लिया था लेकिन सिर्फ उन्हें इस टेस्ट से माफ़ किया गया था जबकि बाक़ी सभी महिला खिलाडियों को टेस्ट देना पड़ा था.

लेकिन यह टेस्ट महिलाओं को बड़ा क्रूर लगता था और लगातार इसका विरोध होता रहा. पर यह तय करना भी ज़रूरी था कि महिला वर्ग में सिर्फ पूर्ण रूप से महिला ही भाग लें.

फिर भी विरोध के कारण अटलांटा ओलम्पिक के बाद इस टेस्ट को बंद कर दिया गया. लेकिन जब दक्षिण अफ़्रीकी एथलीट कास्टर सेमेन्या का मामला सामने आया तो एक बार फिर लिंग टेस्ट की बात उठी.

लेकिन शारीरिक परीक्षण के बदले महिलाओं के हायराइन्द्रोजैनिस्म को जांचा गया जिससे महिलाओं के शरीर में टेस्टोस्टेरॉन स्तर को मापा जा सके.

समानता को तरजीह

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Image caption स्टेला वॉल्श 1930 के दशक में दुनिया की सबसे तेज़ दौड़ने वाली महिला थीं लेकिन 1980 में जब उनका पोस्टमॉर्टम हुआ तो दुनिया को पता चला कि आनुवांशिक कारणों से उनके पुरुषों जैसे जननांग थे.

टेस्टोस्टेरॉन पुरुष प्रधान हार्मोन होते हैं और पुरुषों में प्राकृतिक रूप से इन हार्मोन की मात्रा ज़्यादा होने की वजह से ही पुरुषों में ज़्यादा बल और शक्ति होती है.

अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक संघ का मानना है कि अगर किसी महिला में इस हार्मोन की मात्रा अधिक होती है तो उसे महिला वर्ग में भाग लेते हुए अन्य महिलाओं की अपेक्षा ज़्यादा फ़ायदा मिलता है.

संघ का मानना है कि ऐसे हार्मोन से मिलने वाला लाभ एथलेटिक के नियमों के विपरीत है जिसमें समानता को तरजीह दी जाती है.

दुती चाँद के शरीर में भी इस हार्मोन की मात्रा आम महिलाओं के मुकाबले में कुछ ज़्यादा है और इसी वजह से वो तेज़ भाग सकती हैं.

लेकिन सवाल यह है कि क्या दुती चाँद ने इस हार्मोन को किसी बाहरी तरीके से लिया है? जवाब है, नहीं.

एथलेटिक करियर

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यह उन्हें प्रकृति की देन है, ठीक उसी तरह जैसे किसी का रंग गोरा है तो किसी का काला. या कोई लम्बा है या फिर कोई छोटा. तो अगर रंग या लंबाई के आधार पर कोई भेद नहीं है तो फिर हार्मोंस पर ही क्यों रोक है?

दुती चाँद के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका हक़ दिलाने वालों में कनाडा के पूर्व ओलम्पिक एथलीट ब्रूस किड भी हैं.

किड ने अपने एथलेटिक करियर के दिनों में काफी समय जयपुर में सोशल वर्क में बिताया है और अब वो टोरंटो यूनिवर्सिटी में डीन के पद पर हैं.

किड ने बीबीसी को बताया कि इस टेस्ट का मतलब किसी महिला को पुरुष क़रार देना नहीं है.

डोपिंग

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Image caption खेल की दुनिया में डोपिंग को एक चुनौती के तौर पर देखा जाता है.

उनका कहना था कि यह तय करना ज़्यादा ज़रूरी है कि किन हालत में किसी महिला में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर बढ़ा है.

उनका इशारा उन महिलाओं की ओर था जो जानबूझ कर दवा के जरिए अपना टेस्टोस्टीरॉन स्तर ज़्यादा कर लेती हैं जिससे उन्हें बाक़ी महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा शक्ति मिलती है. यह बेईमानी है और इसी को डोपिंग करार दिया जाता है. और इसी लिए इस नियम की ज़रूरत भी पड़ी.

किड को भरोसा है कि वो दुती चाँद का केस जीतेंगे. भले ही उसमें लंबा समय लग जाए.

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