क्या पटरी से उतर जाएगी भारतीय हॉकी?

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साल 1998 में एम के कौशिक की कोचिंग में बैंकॉक एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम जीत का जश्न भी नहीं मना पाई थी कि कप्तान धनराज पिल्लै और गोलकीपर आशीष बलाल सहित छह खिलाड़ियों को बाहर कर दिया गया.

कोच एम के कौशिक पर भी ऐसी ही गाज गिरी.

इस साल भी वही इतिहास दोहराया गया. भारत ने ऑस्ट्रेलिया के टैरी वॉल्श की कोचिंग में इंचियोन एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही 2016 के रियो ओलंपिक में भी जगह बना ली.

लेकिन वॉल्श वेतन विवाद पर इस्तीफ़ा देकर स्वदेश लौट चुके हैं. हालांकि उन्हें निकाला नहीं गया या इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर नहीं किया गया लेकिन हालात ऐसे बन गए कि उन्हें जाना पड़ा.

योग्य कोच

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तो क्या एक बार फिर भारतीय हॉकी की गाड़ी पटरी से उतर जाएगी. क्या भारत को कोई योग्य कोच मिल पाएगा?

इसी यक्ष प्रश्न के जवाब के लिए बीबीसी स्टूडियो में बीते शनिवार को 'इंडिया बोल' कार्यक्रम में आमंत्रित थे 1975 में विश्व कप हॉकी टूर्नामेंट जीतने वाली भारतीय टीम के अहम सदस्य असलम शेर ख़ान.

असलम शेर ख़ान ने कहा कि इस प्रकरण से रंग में भंग पड़ गया है. फ़ाइनल में पाकिस्तान को हराकर मिली एक अच्छी-ख़ासी जीत के बाद भारतीय हॉकी में जान सी आ गई थी.

खिलाड़ियों में भी आत्मविश्वास आया था. लेकिन टैरी वॉल्श ने जाते-जाते भारतीय सिस्टम की पोल खोलकर रख दी.

टैरी वॉल्श ने लंदन ओलंपिक में 12वें और आख़िरी पायदान पर खड़ी टीम को संभाला और उसने राष्ट्रमंडल खेलों के साथ-साथ एशियाई खेलों और ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ 3-1 से जीती गई टेस्ट सिरीज़ तक बहुत अच्छा प्रदर्शन किया.

तालमेल की कमी

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Image caption टैरी वॉल्श के इस्तीफ़े के बाद भारतीय हॉकी के भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

वॉल्श का इस समय टीम छोड़ना भारतीय हॉकी के लिए बहुत बड़ा धक्का है. अब एक बार फिर नया कोच चुनने की प्रक्रिया चलेगी, सरकार भी उसका हिस्सा लेगी.

हॉकी इंडिया का अपना पक्ष होगा. हॉकी में जो तालमेल की कमी है, उसका ख़ामियाज़ा भारत भुगत रहा हैं.

फैडरेशन में आने वाले लोग हॉकी को अपनी बपौती मानते हैं. उनका वोट बैंक, उनकी एसोसिएशन, फेडेरेशन बन जाती हैं, एक तरह से उनका क़ब्ज़ा हो जाता है.

एक खिलाड़ी जब प्रसिद्ध हो जाता है, तो फैडरेशन के पदाधिकारियों को लगता है कि उसका क़द उनसे बड़ा हो गया है.

आज भी भारतीय खिलाड़ियों में खुलकर बोलने में झिझक है जबकि यहां एक से बढ़कर एक खिलाड़ी पैदा हुए हैं.

भारी नौकरशाही

ख़ान कहते हैं कि नौकरशाह हॉकी को नहीं चला सकते. अब भारतीय खेलों का एक बड़ा हिस्सा तो भारतीय खेल प्राधिकरण के कर्मचारियों के वेतन में ही चला जाता है.

फैडरेशन पर नौकरशाहों का क़ब्ज़ा है. उनकी स्वीकृति पर ही टीम विदेश जाती है. विदेशी कोच इस मसले में उलझना नहीं चाहते. हम भारतीयों को तो फाइल लेकर बाबू से लेकर डायरेक्टर के पास जाने की आदत है. यही चीज़ें खेल में ज़हर का काम कर रही हैं.

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कोच सरकार का कर्मचारी तो नहीं हो सकता. सरकार जो पैसा ख़र्च करना चाहती है वह सीधे फेडेरेशन को दे, विदेशी दौरों का कार्यक्रम तय हो लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है.

एक-एक गेंद तक के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण के पास जाना पड़ता है. यहां तक कि खिलाड़ियों की ख़ुराक का पैसा कितना होगा इसके लिए भी प्राधिकरण के पास जाना पड़ेगा, फिर फाइल चलेगी.

अब समय आ गया हैं कि सरकार, फैडरेशन, भारतीय खेल प्राधिकरण और सीनियर खिलाड़ी आपस में बैठकर तय करें कि रियो ओलंपिक का रास्ता कैसे तय हो.

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