अगर गावस्कर वॉक-आउट कर जाते तो....

गावस्कर, लिली

कल्पना कीजिए किसी टीम को भारत के ख़िलाफ़ जीतने के लिए मात्र 143 रन बनाने हों और इसके बावजूद भारत की क्रिकेट टीम 59 रनों से वह मैच जीत गई हो और वह भी विदेश में.

यह करिश्मा अंजाम दिया गया था 1981 के मेलबर्न टेस्ट में. इस मैच में ही अंपायर के फ़ैसले से नाराज़ सुनील गावस्कर ने क़रीब-क़रीब वॉक आउट ही कर दिया था.

अगर वह ऐसा कर देते तो न सिर्फ़ उन पर कम से कम पांच साल तक क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगता बल्कि भारत की पूरी टीम पर भी प्रतिबंध के बादल मंडराने लगते.

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दिलचस्प बात ये है कि इस बड़े विवाद के बावजूद भारत ये मैच जीतने में सफल रहा.

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Image caption सुनील गावस्कर बीबीसी बंगाली सर्विस के दीपांकर घोष से बात करते हुए

सुनील गावस्कर के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलिया गई भारतीय क्रिकेट टीम सिडनी में पहला टेस्ट हार गई. एडिलेड का दूसरा टेस्ट भी भारत हारते-हारते बचा.

तीसरा टेस्ट विश्व प्रसिद्ध मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड में था.

मेलबर्न की पिच उस ज़माने में स्पिनर्स को मदद देने के लिए मशहूर हुआ करती थी. लेकिन भारत के दोनों चोटी के स्पिनर दिलीप दोशी और शिवलाल यादव चोटिल थे.

भारत ने इसके बावजूद दोनों को खिलाने का फ़ैसला किया. ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीता और भारत को पहले बल्लेबाज़ी करने के लिए आमंत्रित किया.

उस समय तक सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ दोनों ही ख़राब फॉर्म में चल रहे थे.

सोबर्स की सलाह

उस ज़माने में सर गारफ़ील्ड सोबर्स मेलबर्न में ही रहा करते थे. वह भारतीय ड्रेसिंग रूम में आए और उन्होंने विश्वनाथ को सलाह दी कि वह तब तक कोई स्क्वायर कट न खेलें, जब तक उनके चालीस रन न हो जाएं.

Image caption गुंडप्पा विश्वनाथ

विश्वनाथ ने उनकी सलाह पर पूरा ध्यान दिया और परिणाम रहा विश्वनाथ की फ़ॉर्म में वापसी.

दूसरे छोर से विकेट गिरते रहे लेकिन विश्वनाथ ने क्लासिक सेंचुरी मार कर ही दम लिया.

विश्वनाथ की सेंचुरी के बावजूद भारत की टीम 237 के साधारण स्कोर पर आउट हो गई. ऑस्ट्रेलिया ने इसका तगड़ा जवाब देते हुए 419 रन ठोके.

भारत ने दूसरी पारी में इस श्रृंखला में पहली बार एक अच्छी शुरुआत की. चेतन चौहान और सुनील गावस्कर जम कर खेले.

आख़िरकार गावस्कर उस फ़ॉर्म में वापस आ रहे थे जब 1977 में उन्होंने जेफ़ टामसन के ख़िलाफ़ लगातार तीन टेस्टों में तीन शतक लगाए थे.

गावस्कर आउट दिए गए

लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी. डेनिस लिली की अंदर आती गेंद गावस्कर के पैड पर लगी और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की ज़बरदस्त अपील पर अंपायर वाइटहेड ने उन्हें एलबीडब्लू आउट दे दिया.

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गावस्कर को यह फ़ैसला इतना नागवार गुज़रा कि वह पवेलियन लौटते समय दूसरे छोर पर खड़े चेतन चौहान को भी अपने साथ ले जाने लगे.

चौहान बाउंड्री लाइन तक उनके साथ गए भी. लेकिन भारतीय टीम के मैनेजर ग्रुप कैप्टेन शाहिद अली ख़ाँ दुर्रानी ने बिल्कुल बाउंड्री लाइन पर आ कर चेतन चौहान को वापस खेलने भेजा.

दुर्रानी ने बीबीसी को बताया, "जब गावस्कर को आउट दिया तो उन्होंने इसका विरोध किया. पिच से नहीं हटे. फिर सुनील गावस्कर और डेनिस लिली में बहस हुई. उस समय मैं ड्रेसिंग रूम से ये नज़ारा देख रहा था. मुझे ये लग गया था कि बात बढ़ रही है. मैं दौड़ते हुए नीचे उतर कर गेट के पास आ गया. जब तक गावस्कर अपने ग़ुस्से में चेतन चौहान को भी पवेलियन की तरफ़ लाने लगे. जब उन्होंने ऐसा करने से इंकार किया तो वह उन्हें पुश करते हुए क़रीब-क़रीब बाउंड्री लाइन तक ले आए. तब तक मैं भी बाउंड्री लाइन पर पहुंच गया था. मुझे गावस्कर के ख़िलाफ़ कटु शब्द भी इस्तेमाल करने पड़े. मैंने उनको बाहर पुश किया. अपने साथ मैं वैंगसरकर को ले कर गया था. उनको मैंने अंदर की तरफ़ धकेला. चौहान मुझे देख कर ख़ुद ही वापस लौट गए."

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"अगर चौहान भी गावस्कर के साथ बाहर आ जाते तो भारत को यह मैच गंवाना पड़ता और इन दोनों खिलाड़ियों पर कम से कम पांच साल का प्रतिबंध लगता. तब न तो गावस्कर का विश्व रिकॉर्ड होता, न उनके ग्यारह हज़ार रन होते और न ही उनके 34 शतक होते. सारे टेस्ट खिलाड़ियों का करियर ख़त्म हो जाता क्योंकि पाँच साल का समय इतना लंबा होता है कि कोई भी खिलाड़ी इतने लंबे समय तक अपनी फ़ॉर्म बरकरार नहीं रख सकता."

गावस्कर का अफ़सोस

गावस्कर ने पिछले दिनों अपनी इस हरकत के लिए माफ़ी मांगी लेकिन यह भी कहा, "मैं उस समय आउट नहीं था. गेंद मेरे बल्ले का मोटा किनारा लेते हुए पैड पर लगी थी. लेकिन फिर भी ये मेरे जीवन का सबसे खेदपूर्ण क्षण था. जो भी कारण रहा हो, मेरी उस हरकत को सही नहीं ठहराया जा सकता…"

"मैं महसूस करता हूँ कि एक कप्तान और एक खिलाड़ी के रूप में मैंने सही व्यवहार नहीं किया था. मैं अपने उस फ़ैसले की सारी ज़िम्मेदारी स्वीकार करता हूँ. मुझे अपनी निराशा ड्रेसिंग रूम की चारदिवारी के अंदर दिखानी चाहिए थी न कि मैदान पर हज़ारों लोगों के सामने."

लिली ने भड़काया

चेतन चौहान भी आज तक उस घटना को नहीं भुला पाए हैं. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "ये बात स्पष्ट कर दूँ कि गावस्कर साफ़तौर से नॉटआउट थे. गेंद लो ज़रूर रही. पहले उनके बैट पर लगी और फिर पैड में. मैं ये मानता हूँ कि बैट पर गेंद ज़ोर से नहीं लगी थी, लेकिन बैट पैड हो गया था."

"आउट दिए जाने के बाद जब गावस्कर अपसेट हुए तो डेनिस लिली उनके पास जा कर पैड की तरफ़ इशारा करने लगे कि गेंद इस जगह पर लगी है. बाद में गावस्कर ने मुझे बताया कि जब वह पवेलियन की तरफ़ लौट रहे थे तो एक ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ने उन्हें कुछ अपशब्द कहे. ये सुनते ही उनका ग़ुस्सा बढ़ गया और उन्होंने मुझसे भी बाहर चलने के लिए कह दिया."

ग्रेग चैपल बोल्ड

भारत ने अपनी दूसरी पारी में 324 रन बनाए लेकिन फिर भी यह कोई ऐसा स्कोर नहीं था जिससे जीत की कोई उम्मीद बंधती हो.

ऑस्ट्रेलिया को डेढ़ दिनों में जीत के लिए 143 रन बनाने थे. तब तक कपिल देव भी ज़ख़्मी हो चुके थे.

करसन घावरी और संदीप पाटिल ने भारतीय गेंदबाज़ी की शुरुआत की. 11 के स्कोर पर घावरी ने डाइसन को पवेलियन की राह दिखाई और फिर उसी स्कोर पर उन्हेंने ग्रेग चैपल को क्लीन बोल्ड कर दिया.

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Image caption ग्रेग चैपल इंग्लैंड के कप्तान माइक ब्रियरली के साथ

बीबीसी से बात करते हुए करसन घावरी ने कहा, "एक दिन पहले ही गावस्कर और हमने मिल कर ग्रेग चैपल को आउट करने का प्लान बनाया था. प्लान ये था कि जैसे ही वह आएंगे उनका बाउंसर से स्वागत किया जाएगा. मैंने पहली गेंद उन्हें बाउंसर ही करने की कोशिश की. लेकिन मेलबर्न की पिच इतनी ख़राब थी कि मेरी पूरी कोशिश के बावजूद गेंद उठी ही नहीं. उसने एक क्रैक पर टिप्पा खाया और ग्रेग चैपल जब तक अपना बल्ला नीचे लाते, उनका स्टंप दूर जा गिरा."

शानदार गेंदबाज़ी

दिन समाप्त होते-होते दिलीप दोशी ने ग्रेम वुड्स को भी पवेलियन की राह दिखा दी. चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक स्कोर था तीन विकेट पर 24 रन.

उस रात भारतीय खिलाड़ी सो नहीं सके. घायल कपिल देव दो घंटे बाद का अलार्म लगा कर सोने गए. दो घंटे बाद जब अलार्म बजा तो उन्होंने पेन किलिंग इंजेक्शन लिया.

उसके बाद उन्होंने हर दो घंटे का अलार्म लगाया और हर बार इंजेक्शन लिया.

यह प्रक्रिया पूरी रात चलती रही. अगले दिन सबसे पहले आउट हुए किम ह्यूग्स.

दोशी ने उन्हें लांग हॉप फेंकी. वह उसे स्क्वायर कट करने गए. गेंद तेज़ी से निकली और उनके स्टंप्स बिखेर गई.

ऐतिहासिक जीत

दूसरे छोर पर कपिल देव शॉर्ट रन अप के साथ गेंदबाज़ी कर रहे थे. पहले उन्होंने ब्रूस यार्डली को बोल्ड किया और फिर बॉर्डर को किरमानी के हाथों कैच कराया.

ऑस्ट्रेलिया की टीम मात्र 83 रनों पर सिमट गई और भारत ने 59 रनों से टेस्ट जीत कर सीरीज़ 1-1 से बराबर कर ली. इस जीत में टीम के क़रीब-क़रीब हर खिलाड़ी का हाथ था.

मैच के 33 साल बाद मैनेजर दुर्रानी ने याद किया, "आप विश्वास करिए कुछ समय के लिए हम स्तब्ध थे. लेकिन जिस तरह से हमें विकेट मिलते जा रहे थे हमारी उम्मीदें बढ़ती जा रही थीं. हमारे साथ हमारे उच्चायुक्त के डी शर्मा बैठे हुए थे. जैसे ही मैच ख़त्म हुआ ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की हालत देखते ही बनती थी. कुछ देर के बाद हमें अंदाज़ा हुआ कि हम वास्तव में मैच जीत गए हैं."

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