प्रीमियर लीग से बदलेगी टेनिस की सूरत!

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इंडियन प्रीमियम टेनिस लीग (आईपीटीएल) क्या भारत में टेनिस की लोकप्रियता और इसके बाज़ार को बदल पाएगी?

हालांकि पिछले साल नवंबर-दिसंबर में हुए इस टूर्नामेंट में लेज़र लाइट शो, ढोल की थाप और डीजे के नियंत्रण में गूंजता संगीत और क्विक फ़ायर फॉर्मेट- इसे आम टेनिस टूर्नामेंट से अलग खड़ा कर रहा था.

आयोजकों को उम्मीद है कि इससे लाखों नए प्रशंसक टेनिस से जुड़ेंगे. हालांकि भारत में टेनिस के प्रशंसक कम नहीं हैं.

हाल ही में फ़ेसबुक के एक अध्ययन से पता चला है कि अमरीका के बाद भारत में ही टेनिस प्रशंसक सबसे ज़्यादा हैं.

पैसे वालों का खेल

आईपीटीएल के उद्घाटन मैच के टिकट ऑनलाइन कुछ मिनटों में ही बिक गए थे और दस हज़ार से ज़्यादा लोग मैच देखने के लिए स्टेडियम में मौजूद थे.

इसकी ख़ास बात यह है कि आईपीएल की तर्ज पर यह भी फ्रेंचाइज़-आधारित टूर्नामेंट है जिसके कई टीम मालिक सेलिब्रेटी हैं और इसमें कई मौजूदा और पूर्व अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी साथ खेलते नज़र आएंगे.

रोज़र फ़ेडरर कहते हैं कि इससे हमारा खेलने का तरीका नहीं बदलने वाला. लेकिन वह साथ ही कहते हैं, "यकीनन हमारे खेल में इसकी भी जगह है. ज़्यादा संवाद, ज़्यादा मज़े, ऐसे नियम- जिन्हें आपने इसलिए बदला है ताकि सभी इसमें शरीक हो सकें."

क्रिकेट के विपरीत, जहां भारतीय कट्टर राष्ट्रवादी हो जाते हैं, टेनिस जैसे खेल, खिलाड़ी की राष्ट्रीयता से इतर, लोकप्रिय हैं.

इसलिए फ़ेडरर का आईपीटीएल में एक रॉक स्टार की तरह स्वागत किया गया.

लेकिन सामान्यतः क्रिकेट के दीवाने देश में अन्य खेलों की तरह टेनिस खिलाड़ियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है- अच्छे कोर्ट से लेकर सही कोच ढूंढने तक.

टेनिस अकादमी में निजी कोचिंग के लिए 600 रुपये से लेकर 6,000 रुपये तक प्रतिघंटा लिए जाते हैं.

इसमें करियर बनाने के लिए बच्चों के अभिभावकों के लिए ख़र्च करने के लिए अच्छी-ख़ासी मात्रा में पैसा होना चाहिए- जिसे यात्राओं और होटलों पर भी ख़र्च करना होगा.

दिल्ली निवासी जाह्नवी मेहरा का बड़ा बेटा, 12 साल का रोहन, अब राष्ट्रीय स्तर पर टेनिस खेलता है. जाह्नवी उस पर बहुत समय लगाती हैं कि ताकि वह सही टेनिस शिविरों में जा सके और पूरे देश में होने वाली प्रतियोगिताओं में शामिल होने के लिए यात्रा कर सके.

उनका छोटा बेटा ध्रुव छह साल का है और वह भी टेनिस खेलता है.

जाह्नवी कहती हैं कि अब यह दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है कि दोनों लड़कों को खेलने के पर्याप्त मौके मिल सकें.

उन अभिभावकों के लिए मुश्किल और ज़्यादा है जिनके पास इतना पैसा नहीं है या ऐसे आयोजनों तक पहुंच नहीं है. इसलिए एक तरह से भारत में यह पैसे वालों का खेल है.

कमाने का मौक़ा

हालांकि खेल स्कॉलरशिप भी हैं लेकिन यह महज कुछ शहरों तक ही सीमित हैं और यह हर किसी को नहीं मिलतीं.

लेकिन जूनियर टेनिस चैंपियनशिप खेलने के इच्छुक पांच वर्षीय ईशान सिंह की मां गायत्री सिंह को लगता है कि बदलाव ठीक है.

वह कहती हैं, "भारत में चीजें नाटकीय ढंग से बदली हैं. अब यहां टेनिस खेलने के लिए पर्याप्त आधारभूत ढांचा, कोर्ट और कोच हैं."

"इतने सारे बच्चे खेल रहे हैं कि आपको यह नहीं लगता कि आप अकेले हैं. अगर आप बड़े स्तर पर खेलना चाहते हैं तो कोशिश कर सकते हैं. इसकी कोई सीमा नहीं."

लेकिन बड़े पैमाने पर तस्वीर इतनी उजली नहीं है. स्पोर्ट्स एसोसिएशन में गड़बड़झाला है और अक्सर उनपर भ्रष्टाचार और कुछ चुनींदा खिलाड़ियों को तरजीह देने के आरोप लगते रहते हैं.

इसलिए मोटे तौर पर अतंरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता कुछ डबल चैंपियनशिप में सफलता तक ही सीमित है.

लेकिन भारत के शीर्ष खिलाड़ियों के लिए लीग बहुत अच्छी ख़बर है क्योंकि इससे उन्हें ज़्यादा पैसा कमाने का मौका मिलता है.

रोहन बोपन्ना डबल चैंपियनशिपों में अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं. उन्हें लगता है कि ऐसी लीग उनके जैसे खिलाड़ियों के लिए अच्छा मौका है कि विदेशों के प्रतिभावान खिलाड़ियों से खेलकर अपनी क्षमता को विकसित करें.

तो खेल की परिस्थितियां तो सुधर रही हैं लेकिन क्या टेनिस युवा खिलाड़ियों के लिए करियर के रूप में वित्तीय रूप से फ़ायदेमंद हो सकता है.

टेनिस का वक़्त

बोपन्ना मानते हैं कि जबसे उन्होंने खेलना शुरू किया था तबसे अब तक तो यकीनन सुधार हुआ है.

हालांकि वह कहते हैं, "यूरोप और अमरीका की स्थिति तक पहुंचने में अभी देर है. लेकिन अब मुझे लगता है कि धीरे-धीरे लोग यह महसूस करने लगे हैं कि खेलना एक करियर हो सकता है चाहे वह टेनिस हो या कोई और खेल."

टेनिस को एक करियर के रूप में चुनने का नुक़सान यह है कि भारत में शुरुआती स्तर के ज़्यादा टूर्नामेंट नहीं हैं जो पर्याप्त नकद इनाम देते हों.

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आलोचकों का कहना है कि भारत में खिलाड़ी इसलिए इसे बड़ा मुद्दा बनाते हैं क्योंकि वे अपनी निजी कोशिशों से खेल पाते हैं और यहां चैंपियन पैदा करने की कोई व्यवस्था नहीं है.

सरकार टेनिस जैसे खेलों पर अब ध्यान दे रही है और खेलों को बढ़ावा देने के लिए बजट प्रावधान 50% तक बढ़ा दिया है.

सरकार और निजी लीग दोनों की ओर से निवेश बढ़ने के चलते भारत में टेनिस के लिए वक़्त अच्छा है.

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