वर्चस्व की जंग है फ़ीफ़ा विवाद की जड़ !

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इन दिनों दुनिया के सब से लोकप्रिय खेल फुटबॉल की अंतरराष्ट्रीय स्तर की गवर्निंग बॉडी फ़ीफ़ा विवादों में घिरी है.

फुटबॉल में जिनकी रुचि है उन्हें पता होगा कि फ़ीफ़ा पिछले कुछ सालों से भ्रष्टाचार के इलज़ाम झेल रही है. उन्हें इस बात की भी जानकारी होगी कि 1998 से चले आ रहे इसके अध्यक्ष सेप्प ब्लैटर एक विवादास्पद व्यक्ति हैं.

और शायद ये भी मालूम हो कि फ़ीफ़ा में फूट है. एक खेमे में यूरोप और अमेरिका और दूसरे में अफ्रीका, लातिनी अमेरिका, रूस और एशिया हैं.

फ़ीफ़ा के अध्यक्ष के चुनाव से दो दिन पहले, पिछले हफ्ते अमरीकी जांच एजेंसी एफबीआई ने जब भ्रष्टाचार के इलज़ाम में फ़ीफ़ा के सात अधिकारीयों को गिरफ्तार किया, तो दरार साफ़ नज़र आने लगी.

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फ़ीफ़ा के यूरोप और अमरीकी खेमे ने काफी हंगामा किया और सेप्प ब्लैटर से इस्तीफे की मांग की. लेकिन अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमरीका की एकता के कारण सेप्प ब्लैटर एक बार फिर चुनाव जीत गए.

उनकी जीत के बाद यूरोप के फुटबॉल संगठन यूएफा ने इसे फुटबॉल का 'ब्लैक डे' क़रार दिया.

एफबीआई जांच क्यों कर रहा है?

एफबीआई के आरोपों में रिश्वत, धोखाधड़ी और साजिश करना शामिल हैं. एफबीआई के अनुसार जांच में आगे भ्रष्चार के और भी कांड सामने आ सकते हैं.

स्विट्ज़रलैंड सरकार ने इस बात की अलहदा जांच शुरू कर दी है कि 2018 और 2022 फुटबॉल विश्व कप के आवंटन में कहीं भ्रष्टाचार का दखल तो नहीं था. अगला विश्व कप रूस में होगा जबकि 2022 का विश्व कप क़तर में.

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फुटबॉल अमरीका में सॉकर कहलाता है और ये खेल अमरीकियों के बीच बहुत लोकप्रिय नहीं है. तो एफबीआई को फ़ीफ़ा में भ्रष्टाचार की जांच करने की क्या पड़ी है?

एफबीआई के एक अधिकारी के अनुसार फ़ीफ़ा के कुछ अधिकारीयों ने रिश्वत के लिए अमरीकी वित्तीय प्रणाली का इस्तेमाल किया था.

फ़ीफ़ा के दो अमरीकी अधिकारी भी जांच के दायरे में हैं. कहा जाता है कि पिछले 20 सालों के लेन-देन की जांच की जा रही है.

सियासी मुद्दा

लेकिन खुद सेप्प ब्लैटर के अनुसार दाल में कुछ काला है.

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उन्होंने कहा, "मैं यक़ीन के साथ नहीं कह सकता लेकिन कुछ तो गड़बड़ है. इस बात के अचूक संकेत हैं कि अमरीकी 2022 विश्व कप के आयोजन के उमीदवार थे, लेकिन वो विफल रहे. इंग्लैंड 2018 में विश्व कप कराने का उम्मीदवार था लेकिन कामयाब न रहा."

यूरोप और अमरीका के बाहर लोगों का विचार है कि फ़ीफ़ा में भ्रष्टाचार का सहारा लेकर यूरोप फुटबॉल पर अपना खोया हुआ असर वापस पाना चाहता है. सेप्प ब्लैटर अफ्रीका और एशिया में काफी लोकप्रिय हैं क्यूंकि उन्होंने फुटबॉल के विकास के लिए इन देशों में काफी पैसे लगाए हैं.

फ़ीफ़ा दुनिया का सबसे अमीर खेल संगठन है और हर चार साल पर होने वाला विश्व कप दुनिया की सभी खेल प्रतियोगिताओं से अधिक पैसे कमाता है.

पिछले साल ब्राज़ील में हुए विश्व कप में फ़ीफ़ा को खर्चों के बाद 2 अरब डॉलर की कमाई हुई थी.

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फ़ीफ़ा जितना अमीर है उसके खिलाफ भ्रष्टाचार के इलज़ाम भी उतने ही गंभीर हैं. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये भ्रष्टाचार का मामला कम और सियासी मुद्दा ज़्यादा है.

खुली जंग

वह लोग, जो केवल पश्चिमी देशों के मीडिया पर नज़र रखते हैं या फिर यूरोपियन फ़ुटबाल के फैन हैं, उन्हें ब्लैटर की अक्षमता और फ़ीफ़ा में बेईमानी पर पूरा यक़ीन होगा.

लेकिन वो लोग जो अफ़्रीकी, ब्राज़ीलियाई, चीनी और रूसी मीडिया पर निगाह डालते हैं उन्हें कुछ और कहानी नज़र आती है.

फ़ीफ़ा के अध्यक्ष के लिए चुनाव में दोबारा जीतने के बाद सेप्प ब्लैटर की यूरोप में काफी आलोचना हुई. ऐसा लगा कि इससे बुरी खबर और कोई नहीं.

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इंग्लैंड की फ़ुटबाल एसोसिएशन के अध्यक्ष ग्रेग डाइक ने तो यहाँ तक कह दिया कि यूरोपीय देशों को 2018 विश्व कप का बहिष्कार करना चाहिए.

वह कहते हैं कि वह उस वक़्त तक दम नहीं लेंगे जब तक कि ब्लैटर इस्तीफा न दे दें.

दूसरी तरफ ब्राज़ील के लोगों की राय यह है कि यूरोप और अमरीका ब्लैटर के पीछे इसलिए पड़े हैं क्योंकि विश्व कप और फीफा पर उनका असर कम होता जा रहा है.

अफ्रीका में भी ऐसा ही तर्क दिया जा रहा है. इसका विवरण बीबीसी की इस रिपोर्ट में है.

परेशान है यूरोप

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फुटबॉल में यूरोप का वही दर्जा है जो क्रिकेट में भारत को हासिल है. जैसे क्रिकेट में भारत के पास सब से अधिक पैसे है उसी तरह फुटबॉल में यूरोप सबसे अमीर है.

जैसे भारत में विश्व भर के खिलाड़ी क्रिकेट खेलने आते हैं उसी तरह से स्पेन, जर्मनी और इंग्लैंड फुटबॉल प्रतियोगिताओं में ब्राज़ील, लातिनी अमरीका और अफ्रीका के प्रसिद्ध खिलाडी भाग लेते हैं.

लेकिन पैसे और अहम प्रतियोगिताओं के बावजूद फ़ीफ़ा और विश्व फुटबॉल पर यूरोप का प्रभाव कम होता जा रहा है.

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पिछले साल विश्व कप ब्राज़ील में खेला गया. इससे पहले 2010 का विश्व कप दक्षिण अफ्रीका में आयोजित किया गया था. अगले विश्व कप का वेन्यू रूस है और इसके बाद बारी है क़तर की. ज़ाहिर है यूरोप इससे परेशान है.

जर्मनी में यूएफा की पांच और छह जून को अहम बैठक होने वाली है जिसमें इस बात का फैसला लिया जाएगा कि यूरोप का फ़ीफ़ा के प्रति रुख क्या होगा.

विश्व फुटबॉल इस समय एक दोराहे पर खड़ा है.

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