विंबलडन में भारतीयों की सफलता का राज़?

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Image caption पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ी (बाएँ से दाएँ) लिएंडर पेस, सानिया मिर्ज़ा और सुमित नागल.

बीता सप्ताह भारतीय टेनिस के लिए बेहद चमकदार रहा. लंदन में हुए विंबलडन टेनिस टूर्नामेंट के डबल्स मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ी छाए रहे.

महिला डबल्स में भारत की सानिया मिर्ज़ा और स्विट्ज़रलैंड की मार्टिना हिंगिस, मिक्स डबल्स में भारत के लिएंडर पेस तथा मार्टिना हिंगिस, और ब्वॉयज़ डबल्स में भारत के सुमित नागल और वियतनाम नाम हॉन्ग ली ने ख़िताबी जीत हासिल की.

अब चर्चा इस बात की है कि इस बार ऐसा क्या हुआ कि भारत ने ख़िताबों की हैट्रिक लगाई.

42 साल की उम्र में भी लिएंडर पेस और 28 साल की हो चली सानिया मिर्ज़ा की कामयाबी को लेकर भारत के बेहद अनुभवी और पूर्व डेविस कप कप्तान नरेश कुमार कहते है कि दोनों पुराने योद्धा हैं.

नरेश कुमार मानते है कि सानिया मिर्ज़ा ने तो विंबलडन में ऐसा खेल दिखाया जो उन्होंने कभी एकल खिलाड़ी के रूप में भी नहीं दिखाया था.

पेस की ख़ासियत

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नरेश कुमार ख़ुद भी साल 1962 में ऑस्ट्रेलिया के महान टेनिस खिलाड़ी रॉड लेवर के साथ साल विंबलडन का उदघाट्न मैच खेल चुके हैं.

नरेश कुमार याद करते हुए कहते हैं कि साल 1999 में लिएंडर ने विंबलडन में दो ख़िताब जीते थे.

तब उन्होंने महेश भूपति के साथ पुरूष युगल तथा मिश्रित युगल में अमरीका की लीसा रेमण्ड के साथ मिश्रित युगल का ख़िताब अपने नाम किया था.

नरेश कुमार लिएंडर पेस के खेल की ख़ासियत बताते हुए कहते हैं कि उनका खेल नेट पर बेहद ज़बरदस्त है.

उनकी चुस्ती-फुर्ती से विरोधी जोड़ी आतंकित रहती है.

पेस का यह 16वां ग्रैंड स्लैम ख़िताब है तो सानिया का पहला विंबलडन ख़िताब.

सानिया का विजयी शॉट

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नरेश कुमार कहते है कि कमाल की बात है कि सानिया मिर्ज़ा ने ही महिला युगल में विजयी शॉट लगाया. कोर्ट पर उनके बैक हैंड रिर्टन शानदार रहे जो कभी उनकी कमज़ोरी माने जाते थे.

लिएंडर और सानिया ने दोनों ने मार्टिना हिंगिस जैसी खिलाड़ी के साथ अपनी जोड़ी बनाई जो सिंगल्स में दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी रह चुकी हैं.

34 साल की हिंगिस की फिटनेस और अनुभव ने ये ख़िताब जीतने में अहम भूमिका निभाई है.

लिएंडर पेस के पिता और 1980 में मॉस्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली हॉकी टीम के सदस्य रहे वेस पेस कहते हैं कि लिएंडर भारतीय टेनिस का भविष्य नहीं हैं लेकिन उनकी कामयाबी से युवाओं को प्रेरणा मिलेगी.

सुमित की कामयाबी

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Image caption भारत के सुमित नागल (बाएँ) और और वियतनाम के नाम हॉन्ग ली.

ब्वॉयज़ डबल्स में सुमित नागल की कामयाबी को लेकर नरेश कुमार कहते हैं कि अभी उन्हें परिपक्व होने में चार-पांच साल लगेंगे.

कुमार कहते हैं कि एक युवा खिलाड़ी को पूरी तरह निखारने में एक-डेढ़ लाख डॉलर प्रति साल का खर्च आता है जिसे बिना किसी प्रायोजक के जुटाना आसान नहीं है. यही कारण है कि प्रतिभा होते हुए भी भारतीय खिलाड़ी पिछड़ जाते हैं.

अब जब महेश भूपति का खेल ढल चुका है तो लिएंडर और सानिया के बाद दूर-दूर तक कोई ऐसा जुझारू भारतीय खिलाड़ी नज़र नहीं आता. ऐसे में भविष्य को छोड़कर फिलहाल वर्तमान पर ही गर्व किया जा सकता है.

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