सट्टा क़ानूनी होने से असल फ़ायदा किसे?

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क्रिकेट में सट्टेबाज़ी वैध करने की जस्टिस लोढ़ा समिति की सिफ़ारिश पर विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं.

समर्थक मानते हैं कि इससे सरकारी ख़ज़ाना भरेगा, जबकि विरोधियों का तर्क है कि इससे मैच फ़िक्सिंग जैसी बुराइयों पर कोई असर नहीं होगा.

बीबीसी ने इस मुद्दे पर क्रिकेट विशेषज्ञों से बातचीत की. आइए जानें अयाज़ मेमन इसके पक्ष में क्यों हैं.

भारत में अभी तक सट्टेबाज़ी ग़ैरक़ानूनी है और इसे वैध करने से चोरी-छिपे सट्टा बंद होगा. कौन, कहां, किस पर कितनी शर्त लगा रहा है, इसमें पारदर्शिता आएगी.

फ़ीफ़ा ने भी सट्टेबाज़ी के लिए एक मॉडल इस्तेमाल किया है, वह स्विट्ज़रलैंड स्थित कार्यालय से इस पर नज़र रखते हैं कि कहां से कितनी सट्टेबाज़ी हो रही है.

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भारत में सट्टेबाज़ों का जाल बिछा हुआ है और उन्हें अपना काम जारी रखने के लिए लाइसेंस लेकर ख़ुद को पंजीकृत करना पड़े तो इससे वह क़ानूनी दायरे में आ जाएंगे, जिससे उन पर नज़र रखी जा सकेगी और उनको नियंत्रित करने में भी आसानी होगी.

ख़राब लोग तो शायद दो या तीन प्रतिशत होंगे लेकिन सौ प्रतिशत नुक़सान खेल की छवि का होता है और बहुत से क्रिकेटर बदनाम होते हैं.

इसे क़ानूनी करने का रास्ता 50 या 40 प्रतिशत भी मिल जाए तो इसमें फ़ायदा ही हैं.

सट्टेबाज़ी के वैध होने से अगर कोई पूर्व खिलाड़ी या समाज में बड़े नाम वाला व्यक्ति इस पर दांव लगाना चाहे तो उनके दिल में भी डर और झिझक नहीं होगी.

भारत में माना जाता है कि सट्टेबाज़ी करने वाला बुरा इंसान है. इसके बावजूद सट्टेबाज़ी में जो नाम सामने आए हैं वो हैरान करने वाले हैं.

भारत में क्रिकेट में जिस तरह से पैसा आया है उसे देखते हुए अगर अब सट्टेबाज़ी को क़ानूनी नहीं किया गया तो नतीजे और बुरे होेंगे.

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दूसरी तरफ़, क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन सट्टेबाज़ी को वैध किए जाने का विरोध करते हैं.

उनके मुताबिक़, सट्टे में हज़ारों-करोड़ों रुपए लगते हैं. यह पैसा कहां लगता है, कहां जाता है, किसका पैसा लगता है, कोई नहीं जानता.

इसके ख़तरनाक पहलू हैं. कोई कहता है कि अंडरवर्ल्ड इसे नियंत्रित करता है. कोई कहता है कि काले पैसे को सफ़ेद किया जा रहा है.

दूसरा पहलू सामाजिक है. भारत में लॉटरी हुआ करती थी. वह भी एक तरह का सट्टा ही है. हर राज्य उससे काफ़ी पैसा कमाता था.

इसके बाद सरकार ने पाया कि जो लॉटरी पर पैसा लगा रहे हैं वह हार रहे हैं, जीत तो बहुत कम रहे हैं.

ग़रीब देश होने के कारण कई परिवार बर्बाद हो गए.

सरकार को लगा कि सामाजिक तौर पर इसकी क़ीमत अधिक चुकाई जा रही है इसलिए उस पर रोक लगा दी गई.

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दूसरे देशों की बात करें तो फुटबॉल में जो वैध सट्टेबाज़ी संघ है, उनका संबंध भी अवैध सट्टेबाज़ों के साथ पाया गया है.

पता लगा कि सट्टेबाज़ी में शामिल ये लोग वही हैं जो यूरोप में भी खिलाड़ियों और टीमों को ख़रीदने की कोशिश करते हैं.

यूरोप मे जो सिंगापुर के सट्टेबाज़ी संघ थे उनकी जांच के बाद पाया गया कि वहां भी ग़ैरक़ानूनी पैसा ही लगा था.

सट्टेबाज़ी को वैध नही किया जाना चाहिए. यह केवल क्रिकेट और मैच फ़िक्सिंग से जुड़ा मामला नहीं है, इससे कहीं बड़ा मुद्दा है.

लोढ़ा समिति ने भी जो रिपोर्ट दी है, वह सिर्फ़ क्रिकेट में सट्टेबाज़ी और मैच फ़िक्सिंग को देखकर दी है, उसके दूसरे पहलू नहीं देखे हैं.

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