अंपायरिंग फ़ैसलों पर कब तक कहते रहेंगे काश!

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सिडनी, जनवरी 2008...बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का दूसरा टेस्ट...ऑस्ट्रेलिया पहली पारी 463 रन, भारत पहली पारी 532 रन...ऑस्ट्रेलिया दूसरी पारी 7 विकेट पर 401 रन घोषित...वीवीएस लक्ष्मण को विवादास्पद एलबीडब्ल्यू फ़ैसले पर आउट दिए जाने के बाद भारत चार विकेट पर 115 रन बना चुका था. अब सामने थे सौरभ गांगुली.

गांगुली ने क्लार्क की एक गेंद पर प्रहार किया और गेंद हवा में होते हुए दूसरी स्लिप में खड़े माइकल क्लार्क तक पहुँची.

गांगुली को लग रहा था कि क्लार्क ने गेंद के ज़मीन से टकराने के बाद इसे पकड़ा है. लेकिन अंपायर मार्क बेनसन ने पोंटिंग से पूछने के बाद गांगुली को आउट करार दिया. गांगुली तब 51 रन बनाकर मज़बूती से क्रीज पर डटे हुए थे.

इसके बाद भारत की पूरी टीम 210 रन पर सिमट गई और भारत मैच गंवा बैठा. इस चर्चित टेस्ट में कम से कम सात फ़ैसले भारत के ख़िलाफ़ गए थे.

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कुछ जानकारों का मानना था कि अगर इस मैच में डिसीजन रिव्यू सिस्टम (डीआरएस) होता तो मैच का नतीजा कुछ अलग हो सकता था.

ऐसे कई मौके आए जब डीआरएस न होने के कारण भारत के संदर्भ में फ़ैसले विवादित रहे. भारत अब तक डीआरएस के ख़िलाफ़ रहा है.

ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मौजूदा वनडे सिरीज़ में पर्थ मुक़ाबले में भी ऐसी ही विवादित फ़ैसलों के बाद कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को डीआरएस याद आया. और अब बीसीसीआई सचिव अनुराग ठाकुर ने संकेत दिए हैं कि भारत डीआरएस पर हामी भर सकता है.

आख़िर क्या है ये डीआरएस?

तकनीक आधारित इस सिस्टम का प्रयोग मैदानी अंपायरों के विवादित फ़ैसलों की समीक्षा के लिए किया जाता है. इससे पता चलता है कि बल्लेबाज़ आउट है या नहीं.

शुरू में आईसीसी ने सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों के लिए इसे अनिवार्य किया था, लेकिन आगे चलकर इसे वैकल्पिक कर दिया गया. दोनों टीमों की सहमति से ही डीआरएस तकनीक का इस्तेमाल मैच में किया जाता है.

अभी द्विपक्षीय सिरीज़ में डीआरएस का उपयोग अनिवार्य नहीं है, लेकिन आईसीसी की सभी प्रतियोगिताओं में इसका इस्तेमाल होता है.

तो फिर सवाल उठता है कि बीसीसीआई डीआरएस के ख़िलाफ़ क्यों है?

इसका जवाब तलाशने के लिए डीआरएस के इतिहास तक पहुँचना होगा. डीआरएस के तहत खेलने वाला भारत पहला देश था. 2008 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ तीन टेस्ट की सिरीज़ में भारत ने 20 रिव्यू लिए थे और इनमें से सिर्फ़ एक ही भारत के पक्ष में गया, जबकि दूसरी तरफ़ श्रीलंका के 80 प्रतिशत रिव्यू उनके हक़ में गए.

ये वो शुरुआत थी जब भारतीय खिलाड़ियों ने बीसीसीआई के सामने इस सिस्टम पर असंतोष जताया. उनका तर्क था कि कई बार उन्होंने गेंद के बल्ले से टकराने की आवाज़ साफ़-साफ़ सुनी है, लेकिन विपक्षी खिलाड़ी ने रिव्यू लेकर नतीजा अपने पक्ष में कर लिया.

दरअसल, डीआरएस के साथ कई मुद्दे जुड़े हुए हैं.

डीआरएस हॉक-आई, हॉट-स्पॉट और स्निकोमीटर तकनीकी पर निर्भर है.

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हॉक आई से गेंद की दिशा का अनुमान लगाया जाता है कि एलबीडब्ल्यू की स्थिति में गेंद विकेट पर जा रही थी कि नहीं.

हॉक-आई कभी कभार बेतुका अनुमान दिखाती है, इसलिए नतीजा हास्यास्पद लगता है.

हॉट स्पॉट तकनीकी से पता लगाया जा सकता है कि गेंद से बल्ले का संपर्क हुआ है कि नहीं. लेकिन इस तकनीकी को गच्चा देना भी मुश्किल काम नहीं है. वेसलीन लगाकर इस तकनीकी की पकड़ में आने से बचा जा सकता है.

वैसे भी सूरज की रोशनी से बचने के लिए क्रिकेटर वेसलीन का इस्तेमाल करते ही हैं और इसे लगाने से उन्हें रोका नहीं जा सकता. अगर वो इसी वेसलीन का इस्तेमाल अपने बल्ले पर भी कर लें तो हॉट स्पॉट धोखा खा सकती है.

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यहाँ तक कि कई बार अगर वेसलीन का इस्तेमाल भी न हो तो बल्ले का किनारे से मामूली रूप से टकराई गेंद को हॉट स्पॉट नहीं पकड़ सका है.

2011 में जब भारतीय टीम इंग्लैंड में खेल रही थी, तब अंग्रेज़ खिलाड़ियों ने वीवीएस लक्ष्मण का बल्ला चेक करने को कहा था कि कहीं उन्होंने बल्ले में वेसलीन तो नहीं लगाई है.

डीआरएस के साथ कई बेहूदे नियम भी जुड़े हैं. ऑफ़ स्टंप पर 50 फ़ीसदी से अधिक असर होने पर ही मैदानी अंपायर का फ़ैसला पलटा जाएगा.

इसके अलावा अगर बल्लेबाज़ का पैर स्टंप्स से ढाई मीटर से अधिक दूर हो तो हॉक-आई उसे नॉट आउट करार देगा भले ही गेंद सीधे विकेट की ओर बढ़ रही हो.

स्निकोमीटर से विकेट के पास की हल्की सी आवाज़ को भी सुना जा सकता है.

कब कब हुआ डीआरएस पर विवाद

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Image caption सुंदरम रवि

भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा (2014): ब्रिस्बेन में चेतेश्वर पुजारा, महेंद्र सिंह धोनी और रविचंद्रन अश्विन को आउट देने के फ़ैसलों पर उंगलियां उठी- ऑस्ट्रेलिया चार विकेट से जीता.

भारत में दक्षिण अफ़्रीका (2015): टी-20 मुक़ाबले में जेपी डुमिनी के ख़िलाफ़ एलबीडब्ल्यू की ज़ोरदार अपील- अंपायर विनीत कुलकर्णी ने अपील ख़ारिज की- भारत मैच हारा.

श्रीलंका में भारत (2015): गाले में पहले टेस्ट में कम से कम पाँच फ़ैसले भारत के ख़िलाफ़ गए. भारत के हाथ से जीत फिसली. कप्तान कोहली ने कहा उन्हें दुख है कि मैच में डीआरएस नहीं था.

ऑस्ट्रेलिया में भारत (2007-08): सिडनी टेस्ट में मैदानी अंपायरों के कई फ़ैसलों पर उंगली उठी. कम से कम आठ फ़ैसले भारतीय बल्लेबाज़ों के ख़िलाफ़ गए. तत्कालीन कप्तान कुंबले इतने नाख़ुश थे कि उन्होंने पोस्ट मैच प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार किया.

199वें टेस्ट में सचिन (2013): सचिन तेंदुलकर अपने करियर का 199वां टेस्ट खेल रहे थे. अंपायर ने उन्हें पगबाधा करार दिया. इस फ़ैसले को लेकर खूब चर्चा हुई. जानकारों ने कहा कि डीआरएस होता तो सचिन क्रीज पर होते.

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