बीसीसीआई के लिए आगे कुआं, पीछे खाई

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ़ कह दिया कि बीसीसीआई को सुधारों के लिए जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की सिफ़ारिशें लागू करनी ही होंगी.

कोर्ट ने कहा कि अगर बीसीसीआई को सिफ़ारिशें लागू करने में कोई परेशानी है, तो वह चार सप्ताह में कोर्ट को बताए. अगली सुनवाई तीन मार्च को होगी.

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब बीसीसीआई के सामने क्या चुनौतियां हैं, इसे लेकर बीबीसी ने क्रिकेट समीक्षक अयाज़ मेमन से बात की.

अयाज़ मेमन के मुताबिक़ बीसीसीआई क्रिकेट संघों के साथ बैठक कर चुका है, लेकिन कुछ तय नहीं हो पाया कि सुप्रीम कोर्ट को किस तरह का जवाब दे और सिफ़ारिशें माने या नहीं.

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अयाज़ मेमन मानते हैं कि अब समय कम है. बीसीसीआई को थोड़ा समय मिल गया है.

बीसीसीआई काफ़ी सिफ़ारिशें लागू करने का मन बना चुकी है, लेकिन कुछ बातों पर पेंच फंसा है.

जैसे कुछ राज्य संघों के अध्यक्षों की उम्र 70 साल से अधिक नहीं हो सकती. अब मुंबई क्रिकेट संघ के अध्यक्ष शरद पवार की उम्र 75 साल है, तो क्या वह अपनी कुर्सी छोड़ दें.

ये वो मुद्दे हैं जिन्हें लेकर बीसीसीआई सोच रही है कि सभी सिफ़ारिशें सही नहीं हैं. दूसरी तरफ़ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आपको कोई परेशानी है तो आकर बताएं, आगे देखेंगे कि क्या होगा.

अब अगर बीसीसीआई राजनेताओं को क्रिकेट से दूर रखने की सलाह मान ले तो फिर शरद पवार, अमित शाह, राजीव शुक्ला, अनुराग ठाकुर जैसे बीसीसीआई से जुड़े लोगों का क्या होगा.

मेमन मानते हैं कि उम्र से कहीं बड़ा यही सवाल है. कोई भी राजनेता स्टेडियम के दफ़्तर को राजनीति में नहीं बदल सकता लेकिन अगर देखा जाए तो भारत में हमेशा से ही बीसीसीआई में राजनेताओं की पकड़ रही है चाहे वह एनकेपी साल्वे हों या फिर एसएन वानखेड़े.

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इसे बदलना बीसीसीआई के लिए इतना आसान नहीं है. बीसीसीआई क़ानूनी रूप से इसे कैसे सुप्रीम कोर्ट में सही साबित करे यही बड़ी चुनौती उसके सामने है.

मेमन मानते हैं कि अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने या तो बीसीसीआई पर क़ब्ज़ा कर लिया है या करने की कोशिश की है.

राज्य संघों में देखा जाए तो सभी राजनीतिक दलों की कोशिश होती है कि उसमें उनके सदस्य हों या मंत्री ही बीसीसीआई में कार्यकारी सदस्य बन जाते हैं.

वो दूसरे मुद्दों पर तो लडते ही हैं उनकी लड़ाई क्रिकेट में भी खुलकर सामने आती है जिसने क्रिकेट को मुश्किल में डाला है. तो क्या अब बीसीसीआई के लिए आगे कुआं, पीछे खाई जैसे हालात हैं.

मेमन कहते है कि ऐसे हालात के लिए ख़ुद बीसीसीआई ज़िम्मेदार है.

पिछले 10-15 साल से ऐसे संकेत मिल रहे थे कि उसे कुछ सुधार करने होंगे. उसने ऐसा नहीं किया और हालात यहां तक पहुँच गए.

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आखिरकार राजनेता क्रिकेट से जुड़ते ही क्यों हैं. क्या इन्हें दूर करने से बीसीसीआई की कमाई कम हो जाएगी.

मेमन मानते हैं कि राजनेता पैसे से अधिक सुविधाएं जुटाते हैं.

हमारे देश में ऐसा होता आया है कि अगर स्टेडियम बनाना है तो उसके लिए क्लियरेंस चाहिए, ज़मीन चाहिए. एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र चाहिए.

यह आम लोगों के लिए आसान नहीं है. यहां तक कि चाहे वह कितना ही बड़ा खिलाड़ी हो या व्यवसायी.

राजनेताओं के आने से यह काम आसान हो जाते हैं. इसलिए राजनेता आते हैं और जब आते हैं तो फिर क्रिकेट में भी अपना गढ़ बना लेते हैं.

इसके अलावा ताक़त के दम पर वह और भी कुछ लाते हैं जिससे समस्याएं पैदा होती हैं.

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