क्यों आत्महत्या करते हैं क्रिकेट खिलाड़ी?

1991 में एक शीर्ष क्रिकेट लेखक डेविड फ्रीथ ने इस बात का उल्लेख किया था कि कई पूर्व क्रिकेटरों का आत्महत्या करना चिंताजनक है.

उन्होंने बाद में इसकी पड़ताल की और इसके कई सारे उदाहरण उन्हें मिले.

25 साल बाद भी उनकी किताब में कही गई बातों पर विवाद जारी है लेकिन जो बात बिल्कुल स्पष्ट है वो यह है कि क्रिकेट में ज़रूर मानसिक स्वास्थ्य पर ख़ास ध्यान दिया जाता है.

मानसिक समस्याओं से गुज़रने वाले क्रिकेटरों की संख्या को लेकर भले की कोई स्पष्टता ना हो लेकिन इसमें कोई विवाद नहीं है कि बड़े पैमाने पर हाई प्रोफाइल क्रिकेटरों ने किसी भी दूसरे खेल की तुलना में अधिक अपने संघर्ष के बारे में बोला है.

तब यह सवाल खड़ा होता है कि क्या क्रिकेट की प्रवृति ही ऐसी होती है जिसकी वजह से खिलाड़ियों को मानसिक दबाव से गुज़रना पड़ता है.

कई वर्तमान और पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी ऐसा ही सोचते हैं. इंग्लैंड के क्रिकेटर एंड्रयु फ्लिंटॉफ का कहना है कि इस खेल में सफलता और विफलता से जुड़ी छवि के कारण यह मानसिक दबाव होता है.

उन्होंने कप्तान रहते हुए बीबीसी को 2006-07 के ऐशेज श्रृंखला के दौरान कहा था, "अगर चीजें सही रहती हैं तब तो सब ठीक है. लेकिन जब ऐसा नहीं होता है तो ये आपकी छवि को लेकर चुनौती पेश करता है."

पूर्व क्रिकेटर जेम्स ग्राहम ब्राउन 'व्हेन द आई हैज गॉन' में कोलीन मिलबर्न का ज़िक्र करते हैं. कोलीन मिलबर्न इंग्लैंड के खिलाड़ी हैं. वो कोलीन के एक आंख खोने के बाद क्रिकेट में उनके संघर्ष को बताते हैं.

उनका कहना है, "यह एक अनोखा खेल है. यह एक टीम गेम है लेकिन वास्तव में इसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन की अहमियत बहुत है. अगर आप बैटिंग करने आते हैं तो वो बिल्कुल आपका ही खेल होता है और उसी तरह से अगर बॉलिंग करने की बारी आती हैं तो भी बिल्कुल आपका अपना निजी प्रदर्शन होता है."

बल्लेबाजों के लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि उन्होंने कितना अच्छा प्रदर्शन किया है, सिर्फ़ एक खराब शॉट या एक बेहतरीन गेंद उन्हें आउट कर देती है.

हर गेंद के साथ बल्लेबाज पर दबाव रहता है.

क्रिकेट और डिप्रेशन पर ब्लॉग लिखने वाले न्यूज़ीलैंड के इयन ओ ब्रायन और पूर्व ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज एड कोवान इस बात पर सहमति जताते हैं कि क्रिकेट खिलाड़ी "अपनी अगली सफलता से अधिक अपनी अगली नाकामी के बारे में सोचता है. यह क्रिकेट खिलाड़ियों की मानसिकता है. "

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पीटर हायटर ने मार्कस ट्रेस्कोथिक के साथ मिलकर उनकी आत्मकथा 'कमींग बैक टू मी' लिखी. इसमें इंग्लैंड के ओपनर ट्रेस्कोथिक के मानसिक तनाव के बारे में विस्तार से बताया गया है.

पीटर का कहना है कि क्रिकेट जिस तरह से किसी खिलाड़ी की निजी ज़िंदगी को प्रभावित करता है उस तरह से कोई और खेल प्रभावित नहीं करता.

वो बताते हैं, "आप हर वक्त इसके बारे में सोचते रहते हैं. क्रिकेट खिलाड़ी ख़ुद को लेकर बहुत आत्म-विश्लेषणात्मक होते हैं. उनके विरोधी उन्हें नीचा दिखाने का मौका ढूंढ़ा करते हैं. यह निजी अनुभव के आधार पर अलग-अलग होता है. "

यह ट्रेस्कोथीक की अपने समस्या के प्रति ईमानदारी थीं कि उन्होंने इसके बारे में इतनी स्पष्टता से अपनी बात रख दी जबकि इस समस्या को आम तौर पर क्रिकेट का एक हिस्सा माना जाता था.

समय के साथ इससे जुड़े मानसिक तनाव को माना जाने लगा.

हायटर का कहना है कि कई लोग इस बात को नहीं समझ सके कि, "क्रिकेट में ऐसा क्या है जो मानसिक तनाव पैदा करता है" और ट्रेस्कोथीक की किताब ने उन्हें यह समझने में मदद किया.

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हायटर बताते हैं, “मर्कस ने ईमानदारी से अपने अनुभव रखने के अलावा और कुछ नहीं किया है लेकिन लोगों ने उससे अपने आप को जुड़ा हुआ पाया. “

ग्राहम ब्राउन मानते हैं कि ट्रेस्कोथीक की वजह से क्रिकेट को देखने का नजरिया अचानक से बदल गया और बाद में कोवान और ओ ब्रायन और इंग्लैंड के दूसरे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी माइकल यार्डी और जोनाथन ट्रॉट ने इसमें भूमिका निभाई.

इंग्लैंड्स क्रिकेटर्स एसोसिएशन के जैसन रैटक्लिफ बताते हैं कि तीन साल पहले पूर्व खिलाड़ियों के एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि हर पांच में से एक पूर्व खिलाड़ी मानसिक तनाव और डिप्रेशन से गुज़र चुका है.

ब्रिटेन में यह आकड़ा हर चार में से एक का है. वो इस बात पर जोर देते हैं कि "क्रिकेट खिलाड़ी आम लोगों से बहुत अलग नहीं होते."

उनका कहना है, “हालांकि डेविड फ्रीथ की किताब काफ़ी डरावनी है. मुझे लगता है कि कहीं यह क्रिकेट का नाम आत्महत्या की वजह से ख़राब ना कर दे.

“साफ तौर पर जनवरी में टॉम एलेन के आत्महत्या के बारे में सुनकर काफी सदमा पहुंचा. हम उम्मीद करते हैं कि आगे हमें किसी और आत्महत्या के बारे में सुनने को नहीं मिलेगा. "

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ट्रेस्कोथीक ने जब यह मुद्दा उठाया था तो उसके पहले भी रैटक्लिफ की प्रोफेशनल्स क्रिकेटर्स एसोसिएशन (पीसीए) क्रिकेटरों की मानसिक स्वास्थ्य के मामले में मदद किया करती थी.

उन्होंने इस बात को पकड़ा कि खिलाड़ी अपनी परेशानी अपने कोच बताने से डरते हैं और इस पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है. इसके लिए एक गोपनीय हेल्पलाइन बनाया गया था.

उनका कहना है, "मुझे लगता है कि प्रतिस्पर्धी महौल की वजह से खिलाड़ी ड्रेसिंग रूम में अपनी समस्याओं के बारे में ज्यादा बात नहीं करते होंगे."

“कोच क्या सोचेंगे, इसका कॉन्ट्रैक्ट पर क्या असर होगा जैसी चीज़ों को लेकर वो उन्हें चिंता होती है. ड्रेसिंग रूम में की गई बातें लीक भी हो सकती हैं. "

हायटर इस बात से सहमत है कि ड्रेसिंग रूम का प्रतिस्पर्धी माहौल बड़ा मुद्दा है.

उनका कहना है, “आप कभी नहीं चाहते हैं कि कोच को यह पता चले कि आप संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि हो सकता है वो आपको निकाल दे. उसी तरह आपके टीम के साथी आपके सबसे बड़े ताक़त होते हैं लेकिन अक्सर वहीं आपके प्रतिस्पर्धी भी होते हैं.”

रैटक्लिफ का कहना कि पीसीए इस पहल के तहत आने वाले क्रिकेट खिलाड़ियों में तब्दीली देख रहा है.

“मुख्य बात यह है कि हम कैसे इस बात को सुनिश्चित कर सकते हैं कि हमारे क्रिकेट खिलाड़ी दिन पर दिन मानसिक रूप से स्वस्थ्य हो?”

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