जब भारत ने अमरीका को 24-1 से हराया

1932 के ओलंपिक का आयोजन इमेज कॉपीरइट IOC

पूरी दुनिया में आई मंदी और वॉल स्ट्रीट क्रैश की वजह से वर्ष 1932 के ओलंपिक खेलों में हॉकी की स्पर्धा में सिर्फ़ तीन टीमों ने भाग लिया था. ये टीमें थीं अमरीका, जापान और भारत.

टीम के चयन से पहले कोलकाता में एक प्रतियोगिता हुई थी जिसमें वर्ष 1928 के कप्तान जयपाल सिंह को बंगाल की टीम तक से खेलने के लिए नहीं चुना गया, हाँलाकि वो उस समय कोलकाता में ही रह रहे थे और मोहन बागान हॉकी क्लब के कप्तान थे.

ध्यान चंद के अलावा वर्ष 1928 की टीम के सिर्फ़ तीन सदस्य, 1932 की टीम में जगह बना पाए. ये तीन खिलाड़ी थे - एलन, पिनीगर और हैमंड. लाल शाह बोख़ारी को इस टीम का कप्तान बनाया गया.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 18 मार्च, 1932 के अंक में लिखा, ''बोख़ारी को कप्तान बनाने से कुछ निराशा हुई क्योंकि 1928 के फ़ाइनल मैच में कप्तानी कर चुके पिनीगर ये मान कर चल रहे थे कि उन्हें ही कप्तान बनाया जाएगा.''

उन्होंने ये धमकी भी दी थी कि अगर उन्हें कप्तान नहीं बनाया गया तो वो टीम के साथ लॉस-एंजिल्स नहीं जाएंगे. उनको अंतत: एक पत्रकार चार्ल्स न्यूहेम ने जाने के लिए मनाया.

जयपाल सिंह को टीम के बाहर रखा गया, हाँलाकि वो अपने ख़र्चे पर लॉस-एंजिल्स जाने के लिए तैयार थे. इस समय भी हमेशा की तरह फ़ेडेरेशन के पास टीम को लॉस-एंजिल्स भेजने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं.

ध्यान चंद अपनी आत्मकथा गोल में लिखते हैं कि भारतीय टीम के लिए फ़ंड जमा करने के अभियान में महात्मा गांधी को शामिल करने की असफल कोशिश की गई.

चार्ल्स न्यूहैम ने महात्मा गांधी को पत्र लिख कर कहा कि वो भारतीय हॉकी टीम के ओलंपिक जाने के लिए धन जुटाने में उनकी मदद करें.

गाँधी जी ने न्यूहैम के पत्र के जवाब में लिखा, ''आपको जान कर आश्चर्य होगा कि मुझे पता ही नहीं है कि हॉकी जैसा भी कोई खेल होता है. मैं इस बारे में निश्चियत नहीं हूँ कि आम लोगों की इस खेल में रुचि भी है या नहीं. मुझे नहीं याद पड़ता है कि मैंने कभी इंग्लैंड, दक्षिण अफ़्रीका या भारत में हॉकी का कोई मैच देखा है. मुझे दुख है कि मैं इस संबंध में आपकी कोई मदद नहीं कर सकता.''

लेकिन इसके बावजूद भारतीय हॉकी फ़ेडेरेशन के प्रमुख एफ़ हेमैन और पंकज गुप्ता के प्रयासों से इतना पैसा जोड़ लिया गया कि भारतीय टीम के अमरीका जाने का किराया निकल आए. ध्यान चंद ने इसका ज़िक्र अपनी आत्मकथा 'गोल' में किया, ''सभी खिलाड़ी मैच के बाद मिलने वाला 2 पाउंड का भत्ता छोड़ने के लिए राज़ी हो गए ताकि टीम को पैसे की कोई किल्लत न रहे.''

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Image caption लॉस एंजिल्स बंदरगाह पर अपने जलयान के डेक पर उतरने की तैयारी करते भारतीय खिलाड़ी.

42 दिनों के पानी के जहाज़ के सफ़र के बाद भारतीय टीम लॉस एंजिल्स पहुंची. वहाँ के एक अख़बार ने लिखा, ''आज हॉकी के बादशाह पधार रहे हैं. उनकी बहुत सी बीवियाँ उनके साथ हैं. टीम में दो शेर भी आ रहे हैं.''

वास्तव में भारतीय टीम में एकमात्र महिला टीम के मैनेजर गुरुदत्त सोंधी की पत्नी थीं और टीम के दो शेर थे - दो सिंह, रूप और गुरमीत.

पहले मैच में भारत ने जापान को 11-1 से हराया. ध्यान चंद ने चार गोल किए जबकि रूप सिंह और गुरमीत ने तीन-तीन गोल. भारत नर्म मैदान पर खेलने का आदी नहीं था, वर्ना जापान पर और गोल होते.

इस मैच के बाद भारत का आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि उनसे अमरीका के ख़िलाफ़ मैच में टीम में कई परिवर्तन किए.

बाद में भारतीय हॉकी फ़ेडेरेशन के प्रमुख हेमैन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ''ऐसा इसलिए किया गया ताकि टीम के सभी 15 खिलाड़ियों को खेलने का मौका मिले. ओलंपिक नियम कहते हैं कि उन्हीं खिलाड़ियों को पदक दिया जाएगा जिन्होंने प्रतियोगिता में कम से कम एक मैच खेला हो.''

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Image caption अमरीका के खिलाफ गोल करते ध्यानचंद.

सबको उम्मीद थी कि भारत अमरीका के ख़िलाफ़ जीतेगा, लेकिन किसी ने ये कल्पना नहीं की थी कि भारत औसतन हर तीन मिनट पर गोल करेगा और जीत का अंतर होगा 24-1. ओलंपिक हाकी में ये जीत का अब तक का सबसे बड़ा अंतर है.

स्टेट्समैन अख़बार ने अपने 13 अगस्त, 1932 के अंक में लिखा, ''भारतीय खिलाड़ियों ने ग़ज़ब का स्टिक वर्क दिखाया. फ़ारवर्डों का तालमेल देखते ही बनता था. हाफ़ बैक फ़ॉरवर्डों की मदद के लिए अक्सर आगे आ जाते थे. फ़ॉरवर्ड्स और हाफ़ बैक्स के फ़्लिक पास अमरीकियों के लिए नई चीज़ थे. कई बार तो वो खेलने के बजाए, अपने फुर्तीले प्रतिद्वंदियों के खेल को निहारने लगते थे. इस मैच में रूप सिंह ने 12, ध्यान चंद ने 7 और गुरमीत ने 3 गोल किए.''

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Image caption भारतीय हॉकी टीम

मैच के बाद अमरीकी टीम के एक सदस्य ने कहा कि बेहतर ये होता कि भारतीय खिलाड़ी बाँए हाथ से खेलते, जब शायद हम उनका मुकाबला कर पाते.

अमरीका से कहीं दूर वेस्ट ऑस्ट्रेलियन अख़बार ने बाद में अपने 30 अप्रैल, 1935 के अंक में भारत के इस अभियान के बारे में एक दिलचस्प ख़बर छापी, ''भारत और अमरीका के बीच मैच 5000 दर्शकों के सामने खेला गया था. उस समय चर्चा थी कि एक हज़ार डॉलर की शर्त लगाई गई है कि ध्यानचंद तीन से ज़्यादा गोल नहीं मार पाएंगे. अमरीकियों ने उनके पीछे तीन खिलाड़ी लगा रखे थे. इसके बावजूद ध्यान चंद सात गोल मारने में सफल रहे.''

मज़ेदार बात ये रही कि भारतीय अख़बारों में ओलंपिक जीत को पहले पन्ने तो दूर, खेल समाचारों में भी काफ़ी नीचे जगह दी गई थी.... वो भी सिर्फ़ एक कॉलम में. उस दिन की मुख्य खेल ख़बर थी - भारत ने काउंटी मैच में सॉमरसेट को हराया.

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Image caption 1932 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम

अमरीका में दो नुमाएशी मैच खेलने के बाद इस टीम ने यूरोप के चार देशों में 9 मैच और खेले. भारतीय हॉकी फ़ेडेरेशन के प्रमुख एफ़ हेमैन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ''हमारे दल के हर सदस्य ने इस दौरे का पूरा आनंद उठाया. हमारा इतना व्यस्त कार्यक्रम था कि बुडापेस्ट में मैच खेलने के लिए हम बस से सुबह साढ़े दस बजे वियेना से रवाना हुए. पाँच बजे बुडापेस्ट पहुंचे और मैच खेल कर सुबह दो बजे वापस वियेना पहुंच गए.''

जर्मनी में ध्यानचंद इतने लोकप्रिय हुए कि उन्होंने अपने सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाड़ी को जर्मन ध्यान चंद कहना शुरू कर दिया. प्राग में एक मैच के बाद एक युवती ने ध्यान चंद का चुंबन लेने की कोशिश की. उन्होंने उस मुश्किल से यह कह कर पीछा छुड़ाया कि वो शादीशुदा शख़्स हैं. बाद में ध्यान चंद ने लिखा कि ये उनकी नज़र में भारत की सर्वश्रेष्ठ हॉकी टीम थी - 1936 की बर्लिन ओलंपिक टीम से भी बेहतर !

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