ओलंपिक में पीछे हटना चाहते थे मोहम्मद अली

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मौत से कोई नहीं बच सकता. 'महानतम' इंसान को भी जाना पड़ता है. कैसियस मार्केल्स क्ले जूनियर जो मोहम्मद अली के नाम मशहूर हैं, ज़िंदगी की अपनी जंग हार चुके हैं.

लेकिन उनकी कहानियां हमेशा ज़िंदा रहेंगी. वे एक एथलीट, ओलंपिक विजेता, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता के रूप में तो जाने ही जाएंगे लेकिन इन सब से भी ऊपर उठकर वे एक महान इंसान थे.

अली का सफ़र 5 सितंबर 1960 से शुरू होता है जब उन्होंने रोम ओलंपिक में लाइटवेट के फ़ाइनल मुक़ाबले में पोलैंड के बीगन्यू ज़ीग्गी पैत्रिज्वोस्की को मात दी थी.

अगर वे हवाई जहाज़ में उड़ने के डर से रोम नहीं गए होते तो दुनिया उनके जलवे से महरूम रह जाती.

ओलंपिक से कुछ हफ़्ते पहले वे अपनी दावेदारी से पीछे हटना चाहते थे क्योंकि उन्हें हवाई जहाज़ से जाने में डर लगता था. उन्होंने यह भी पूछा था कि ऐसा नहीं हो सकता है कि वे पानी के जहाज़ या ट्रेन से रोम जा सकें.

जब उनसे कहा गया कि यह संभव नहीं है तो उन्होंने आर्मी के स्टोर से जाकर एक पैराशूट ख़रीदा था जो उन्होंने सफ़र भर अपने साथ रखा. ये सोच कर कि अगर विमान हादसे का शिकार हो गया तो वो कम से कम पैराशूट से नीचे कूद जाएंगे. लेकिन शुक्र है कि ऐसा नहीं हुआ और दुनिया को एक नायाब बॉक्सर देखने को मिला.

फिर वही मोहम्मद अली हवाई जहाज़ में बैठकर दुनिया भर में घूमे.

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उन्होंने बॉक्सिंग के चैंपियन के रूप में बड़ी शख्सियतों और आम लोगों से मुलाक़ात की.

मोहम्मद अली ने दलाई लामा से लेकर पोप तक कई हस्तियों से मुलाकात की थी. उन्होंने जिन लोगों से मुलाकात की थी उनमें अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश, बिल क्लिंटन, जिमी कार्टर, बराक ओबामा, भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, द बीटल्स, बॉब डायलन और जोन बेज़ शामिल थे.

बहुत कम लोग जानते हैं कि जब वे अपने करियर की चोटी पर थे तो भारत भी आए थे.

सत्तर के दशक के मध्य में वो जब दिल्ली से होकर गुज़र रहे थे जब राजीव गांधी ने उनके लिए शहर में रुकने का बंदोबस्त किया था.

तब जल्दी-जल्दी में उनके और भारतीय हेवीवैट चैंपियन कौर सिंह के बीच नेशनल स्टेडियम में एक प्रदर्शनी मैच रखवाया गया था.

नेशनल स्टेडियम में मुझे वो मुक़ाबला देखने का मौक़ा मिला था जो सही मायनों में मुक़ाबला था ही नहीं.

अली उस वक़्त सिर्फ़ कौर सिंह के मुक्कों को अपने दाएं हाथ से संभाल रहे थे और दूसरी तरफ मुंह करके हम बच्चों से बात कर रहे थे.

बाद में एक सात साल के बच्चे की ज़िद पर हम रिंग के अंदर गए और मैंने पसलियों में उंगली गड़ाकर देखा था कि वे हड्डी और मांसपेशी के बने हैं या किसी स्टील के!

1996 में अटलांटा में आयोजित ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह में मशाल रिले के अंतिम धावक के लिए पूरे स्टेडियम में अंधेरा छा गया था.

मीडिया स्टैंड में खड़े हम लोग बहुत सारे नामों के बारे में अटकलें लगा रहे थे कि स्टेडियम में कौन मशाल प्रज्ज्वलित करेगा. लेकिन मोहम्मद अली का किसी को ख़्याल भी नहीं था. यहां तक कि अमरीकी पत्रकार भी उनके नाम का अंदाज़ा नहीं लगा पाए थे.

वे कांपती हाथों से मशाल लेकर मंच पर खड़े हुए और यह हम सबों के लिए एक बेहद भावुक क्षण था.

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उस वक़्त अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन समेत पूरा स्टेडियम उनके सम्मान में खड़ा हो गया था.

अली को कई मेडल और सम्मान मिले थे. लेकिन मुझे कभी-कभी यह अजीब लगता था कि उन्हें नोबल शांति पुरस्कार क्यों नहीं मिला.

इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी ने भी उन्हें कभी अपना सदस्य नहीं बनाया.

अली से बेहतर इंसान कौन होगा जिन्हें 1998 में संयुक्त राष्ट्र का शांति दूत बनाया गया था और उन्होंने पूरी दुनिया में ग़रीब समुदायों के बीच शांति क़ायम करने और ग़रीबी को दूर करने के लिए काम किया?

अगर जीते जी नहीं तो कम से कम मरने के बाद ही उनका नाम नोबल विजेताओं में शामिल करके दुनिया को उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त करनी चाहिए.

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