जब अंग्रेज चिल्लाए, 'कम ऑन इंडिया, कम ऑन इंडिया'

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1948 का साल कई मायनों में अहम था. महात्मा गाँधी की हत्या हो चुकी थी. ब्रेडमैन ओवल में अपना आख़िरी टेस्ट खेलने वाले थे. अरब और इसराइल के बीच पहला युद्ध शुरू हो चुका था और चार्ल्स डिकेंस के उपन्यास पर आधारित डेविड लीन की फ़िल्म ओलिवर ट्विस्ट, ब्रिटेन में रिलीज़ हो चुकी थी.

न सिर्फ़ ओलंपिक खेल दूसरे विश्व युद्ध के कारण 12 साल के अंतराल पर हो रहे थे बल्कि कई नए देश, जिसमें भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका भी शामिल थे, पहली बार एक आज़ाद देश के रूप में इन खेलों में हिस्सा ले रहे थे.

लंदन ओलंपिक खेलों में भाग लेने के लिए भारतीय हॉकी टीम 14 जुलाई, 1948 को वहां पहुंची लेकिन काफ़ी देर से. वजह ये थी कि टीम मुंबई में ख़ास तौर से तैयार किए गए लंबी घास के मैदान पर विशेष ट्रेनिंग कैंप में भाग ले रही थी.

जब भारतीय हॉकी टीम एयर इंडिया के विमान मुग़ल प्रिंसेज़ से लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरी तो भारतीय टीम के शेफ़ द मिशन मोएनुल हक़ ने उनका स्वागत किया.

भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व कर रहे थे राइट आउट किशन लाल. भारतीय दल को शुरू में लंदन से कुछ दूर रिचमैंड के एक कैंप में ठहराया गया.

कैंप में टीम के रहने और खाने का इतना बेहतरीन इंतज़ाम था कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संवाददाता एलेक्स वेलेंटाइन को अख़बार के 20 जुलाई, 1948 के अंक में लिखना पड़ा, “भारतीय खिलाड़ियों को न सिर्फ़ हर तरह का भारतीय खाना मिल रहा है बल्कि उसकी मात्रा भी काफ़ी है. खाना परोसने वाले भी भारतीय हैं जो ज़्यादातर बंगाल से आते हैं. डाइनिंग हॉल का माहौल भी भारत जैसा है. ज़ोर ज़ोर से ऊँची आवाज़ में बात करने और ठहाकों की आवाज़ें सुनाई देती हैं. खाने की मेज़ पर दाल, सब्ज़ी, मटन करी, रोटियों के अलावा भारतीय मिठाइयाँ भी दिखाई दे रही हैं. मज़े की बात है कि खाने के बाद हर खिलाड़ी को दूध की एक-एक बोतल भी दी जा रही है.”

भारतीय टीम ने लंदन में भारतीय जिमखाना के मैदान पर अभ्यास किया और जी भर कर लंदन घूमा.

बाद में टीम के एक सदस्य जसवंत सिंह राजपूत ने टेलिग्राफ़ अख़बार को दिए गए इंटरव्यू में बताया, “हम सब लोगों को ओलंपिक खेलों के पास दिए गए थे. उसे दिखाने पर हमें बसों का किराया नहीं देना पड़ता था. हम देख सकते थे कि दूसरे विश्व युद्ध में लंदन की कितनी बरबादी हुई थी. लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले बुलंद थे. युद्ध की विभीषिकाओं के बाद ओलंपिक खेलों की मेज़बानी करना लंदनवासियों के लिए एक सुखद अनुभूति थी.”

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टीम के एक और सदस्य केशव दत्त ने भी लंदन में युद्ध से हुई बरबादी को नोट किया. उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया, “युद्ध का असर हर जगह दिखाई देता था. खाने की कमी थी- ख़ास कर चॉकलेटों ओर अंडों की. लेकिन ओलंपिक प्रबंधकों ने ये सुनिश्चित किया था कि हमें किसी चीज़ की कमी न होने पाए. मैं अक्सर अपनी चॉकलेट्स उन बच्चों में बाँट देता था जो हमारे ऑटोग्राफ़ लेने आते थे.”

उसी हॉकी टीम के एक और सदस्य थे बलबीर सिंह. उनके लिए भारतीय हॉकी टीम का सदस्य होकर लंदन जाना बहुत रोमांचक था.

बलबीर सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था, “इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे लिए अपने पूर्व शासकों की राजधानी जाना बहुत रोमांचक था. जब वो शासक होते थे तो हम उनसे डरा करते थे लेकिन जब हम वहाँ पहुंचे तो उन्होंने हमारे साथ बहुत दोस्ताना व्यवहार किया. ये हमारे लिए थोड़ी आश्चर्य की बात है कि एक शासक के रूप में उनका हमसे व्यवहार थोड़ा कड़ा और रूखा होता था.”

यह पहला मौक़ा था जब भारतीय दल ओलंपिक खेलों में अपने झंडे तले मार्च कर रहा था. अपना पहला ओलंपिक खेल रहे लेस्ली क्लाडियस के लिए ये एक न भूल पाने वाला क्षण था.

लेस्ली क्लाडियस बताते हैं, “जब हम डिफ़ेंडिंग चैम्पियन के तौर पर वेंबली स्टेडियम के बीस हज़ार दर्शकों को सामने उतरे तो उन्होंने खड़े होकर हमारा स्वागत किया. मुझे लगा जैसे मैं स्वर्ग पहुंच गया हूँ. ड्रेस कोड का पालन करते हुए मैंने ज़िंदगी में पहली बार पगड़ी बाँधी. हमारे सेंटर फ़ॉरवर्ड बलबीर सिंह ने इसे बांधने में मेरी मदद की.”

भारत ने ऑस्ट्रिया के ख़िलाफ़ अपना पहला मैच 8-0 से जीता. दूसरे मैच में उन्होंने अर्जेंटीना के ख़िलाफ़ गोल अंतर को बढ़ाते हुए 9-0 से जीत दर्ज की. इसके बाद भारत को बहुत मुश्किल से 2-0 से स्पेन के ख़िलाफ़ जीत मिली. दूसरे ग्रुप में पाकिस्तान भी अच्छा खेल रहा था और हर जगह चर्चा थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच ही ओलंपिक हॉकी का फ़ाइनल होगा.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अपने 8 अगस्त, 1948 के अंक में लिखा है, “जिस तरह से इन दोनों देशों के खिलाड़ी शानदार ढ़ंग से अपने प्रतिद्वंद्वियों को छकाते हुए, छोटे छोटे पासों का आदान प्रदान करते हुए विंग्स से गेंद को आगे ले जाते हैं, कोई भी टीम उनका मुक़ाबला नहीं कर सकती. अगर ये डी में घुस गए तो कोई उन्हें गोल करने से नहीं रोक सकता.”

सेमीफ़ाइनल में भारत तो हॉलैंड को हराने में सफल हो गया लेकिन आशा के विपरीत पाकिस्तान इंग्लैंड से हार गया. फ़ाइनल मैच था भारत और इंग्लैंड के बीच.

केशव दत्त ने बाद में टेलिग्राफ़ को दिए गए इंटरव्यू में कहा, “मैच से एक दिन पहले रात को ज़बरदस्त बारिश हुई और 12 अगस्त को मैच वाले दिन भी रह रह कर बारिश होती रही. फ़ाइनल मैच से पहले उसी मैदान पर कांस्य पदक के लिए हुए मैच में जब पाकिस्तान हार गया तो हमारी चिंता और बढ़ गई. हमें लग गया कि कीचड़ भरी घास में हमारी एशियन स्टाइल की हॉकी चल नहीं पाएगी. इसलिए हमने गेंद उठा कर हवा में पास देते हुए खेलने का फ़ैसला किया.”

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Image caption बलबीर सिंह सीनियर अपने कोच के साथ इस तस्वीर में नज़र आ रहे हैं.

सेंटर फ़ॉरवर्ड बलबीर सिंह को 68 साल बाद भी वो मैच इस तरह याद है जैसे कल की ही बात हो.

बलबीर सिंह ने बीबीसी को बताया, “स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था. आजकल जो इंग्लैंड की महारानी है, उस समय राजकुमारी की हैसियत से मुख्य अतिथि थीं. मैदान गीला था और थोड़ा रपटीला भी. हमारे कुछ खिलाड़ियों ने जूते उतार कर खेलने का फ़ैसला किया. लेकिन मैंने बूट नहीं उतारे. उसी के साथ खेलता रहा.”

“इंग्लैंड की टीम 1908 और 1920 में ओलंपिक ख़िताब जीत चुकी थी. वहाँ के बाशिंदे समझते थे कि उस दिन इंग्लैंड भारत को हरा देगा. लेकिन मैच शुरू होने के कुछ मिनटों के अंदर भारत ने मेरे ज़रिए गोल कर दिया. उससे पहले वो बहुत शोर मचा रहे थे... कम ऑन इंग्लैंड, कम ऑन इंग्लैंड. कुछ देर बाद मैंने दूसरा गोल भी कर दिया. जब हमने चार गोल कर दिए तो इंग्लैंड के लोग भी भारत के हक में शोर करने लगे, कम ऑन इंडिया, कम ऑन इंडिया, मेक इट हाफ़ ए डज़न.”

बाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संवाददाता एलेक्स वेलंटाइन ने अख़बार के 13 अगस्त, 1948 के अंक में लिखा, “कीचड़ भरे मैदान और बारिश के बावजूद भारत अपने बेहतरीन गेंद नियंत्रण, सटीक पासिंग और सोचे समझे पोज़ीशनल खेल से ब्रितानी टीम पर छाया रहा. अगर इंग्लैंड के पास ब्रोडी के अलावा कोई दूसरा गोलकीपर होता, तो जीत का अंतर दोगुना हो सकता था. दूसरे हाफ़ के मध्य तक ब्रिटेन को अहसास हो गया था कि वो ये मैच जीत नहीं सकते. इसलिए उसके बाद उनकी पूरी कोशिश थी कि जीत के अंतर को बढ़ने नहीं दिया जाए. उनमें जितनी भी ताक़त बची थी वो उन्होंने अपने रक्षण में लगा दी.”

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जैसे ही फ़ाइनल विसिल बजी, सेवाइल रो सूट पहने हुए ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त कृष्णा मेनन दौड़ते हुए मैदान में घुस गए और भारतीय खिलाड़ियों को गले लगाने लगे. सैकड़ों ब्रिटेनवासी भारतीय खिलाड़ियों का ऑटोग्राफ़ लेने उनके ड्रेसिंग रूम के बाहर जमा हो गए.

ब्रितानी कप्तान नौर्मन बोरेट ने कहा, “मैं नहीं समझता कि एक ऐसे मैदान पर जो उनके खेल के बिल्कुल माफ़िक नहीं है, उन्हें इस तरह की जीत मिलने वाली है. लेकिन आज हमें पता चला कि उनमें हर हालात में बेहतरीन खेलने की क्षमता है.”

हर भारतीय खिलाड़ी को स्वर्ण पदक दिया गया. उस समय तक गले में पदक पहनने का रिवाज नहीं शुरू हुआ था. ओलंपिक में आख़िरी दिन 14 अगस्त को क्लाडियस, ओवल मैदान में डॉन ब्रेडमैन की आख़िरी पारी देखने गए. ब्रेडमैन दूसरी ही गेंद पर आउट हो गए, वो भी सिफ़र पर.

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सितंबर, 1948 में भारतीय टीम पानी के जहाज़ एम वी सिरकासिया से मुंबई पहुंची. उस टीम में कोलकाता के तीन खिलाड़ी थे जो स्वर्ण पदक जीत कर लाए थे. क्लाडियस, केशव दत्त और जसवंत सिंह राजपूत. उनमें से एक स्वर्ण पदक अभी भी सुरक्षित है.

लेस्ली क्लाडियस का स्वर्ण पदक उनके ड्राइंग रूम से चोरी हो गया. केशव दत्त ने 1962 के चीन आक्रमण के समय नेहरू के आह्वान पर अपना स्वर्ण पदक देश को दान कर दिया. जसवंत सिंह राजपूत का स्वर्ण पदक उनके पास था. लेकिन पिछले वर्ष 15 जनवरी को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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