लोग क्यों अपना नाम बदल लेते हें?

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Image caption टेरेंस किंग, व्यवसायी

आप कुछ ऐसे लोगों से ज़रूर मिले होंगे, जिनका असल नाम कुछ और है, लेकिन दुनिया उन्हें किसी और नाम से जानती है.

कई मर्तबा घरवाले प्यार से किसी दूसरे नाम से पुकारने लगते हैं. लेकिन पेशेवर ज़िंदगी शुरू करने के बाद लोग अपना नाम बदलते हैं तो ये थोड़ा हैरत में डालता है. आख़िर क्या वजह हो सकती है जिसके लिए उन्हें अपना नाम बदलने की ज़रूरत पड़ती है?

दरअसल, बहुत बार ये काम किसी ख़ास मक़सद से किया जाता है. अल्पसंख्यकों के साथ ये मसला कुछ ज़्यादा होता है.

चलिए, आपको टेरेंस किंग की कहानी के ज़रिए समझाते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है. टेरेंस का असली नाम वांग लाई मिंग है, यह एक चीनी नाम है, लेकिन देखने में वो दक्षिण एशियाई मूल के लगते हैं.

उन्होंने ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी से बिज़नेस मेनेजमेंट में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. लेकिन सिंगापुर में जब भी उन्होंने किसी नौकरी के लिए अर्ज़ी दी, उसे हमेशा ये कहकर ख़ारिज कर दिया गया कि वो देखने में चीनी मूल के नहीं लगते. लिहाज़ा उन्हें नौकरी नहीं दी जा सकती.

सिंगापुर में नाकामी के बाद टेरेंस काम की तलाश में न्यूज़ीलैंड गए. लेकिन इनकार का सिलसिला वहां भी जारी रहा. कोई उन्हें नौकरी देने को राज़ी नहीं था.

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Image caption अभनेता कैल पेन

बार-बार की नाकामी से थक-हारकर टेरेंस ने अपना नाम बदलने की सोची. इसके बाद उन्होंने अपना नाम वांग लाई मिंग से बदलकर टेरेंस किंग रख लिया. अब टेरेंस, न्यूज़ीलैंड में आराम से काम कर रहे हैं.

मैसे यूनिवर्सिटी के रिसर्चर पॉल स्पूनले का कहना है न्यूज़ीलैंड में नस्ल, जाति और बोलने के लहजे को लेकर काफ़ी भेदभाव होता है. न्यूज़ीलैंड के लोग अंग्रेज़ी बोलने के अंदाज़ को लेकर काफ़ी फ़िक्रमंद रहते हैं.

एशियाई मूल के लोग जब वहां जाते हैं तो उन्हें वहां की संस्कृति और ज़बान समझने में ज़्यादा परेशानी होती है. इसलिए उन्हें इस भेदभाव का सामना ज़्यादा करना पड़ता है.

बहुत बार बुलंदी तक पहुंचने के लिए भी लोग अपना नाम बदल लेते हैं, जैसे बॉलीवुड की अदाकारा सनी लियोनी.

सनी का असल नाम करनजीत कौर वोहरा है. इसी तरह सियासी नेता बॉबी जिंदल हैं जिनका पैदाइशी नाम पीयूष जिंदल है. भारतीय मूल की अमरीकी अदाकारा और कॉमेडियन मिंडी कलिंग हैं, जिनका असली नाम वेरा चोकालिंगम है.

इन सभी ने किसी जातीय भेदभाव की वजह से अपना नाम नहीं बदला. बल्कि, अपनी खुशी से अपने पेशे में नाम कमाने के लिए ऐसा किया.

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'यूके डीप पॉल' कंपनी के संस्थापक कोनराड ब्रैथवेट कहते हैं कि ब्रिटेन में हर साल क़रीब एक हज़ार अल्पसंख्यक अपना नाम बदलते हैं, ताकि नौकरी मिलने में कोई परेशानी ना हो.

चूंकि यहां नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत आसान है. इसलिए, लोगों को भी लगता है अगर नाम बदल लेने से नौकरी मिलने में आसानी होती है तो बुरा क्या है.

कनाडा की टोरंटो यूनिवर्सिटी ने एक रिसर्च की. इसमें टोरंटो, मॉन्ट्रियल, और वैंकूवर शहरों में बहुत से लोगों के सीवी नौकरी के लिए भेजे गए. इसमें चाइनीज़, भारतीय, पाकिस्तानी मूल के लोग भी शामिल थे. लेकिन अंग्रेज़ी नाम के लोगों के मुक़ाबले एशियाई मूल के 40 फ़ीसद से भी कम लोगों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया.

ये उन देशों की स्थिति है जहां की इमिग्रेशन पॉलिसी उतनी सख़्त नहीं. कनाडा वो देश है जो पूरी दुनिया में अपनी खुली नीति के लिए जाना जाता है. जहां हर मुल्क़ और मजहब के लोगों को अपनाया जाता है.

नौकरी के लिए अर्ज़ी देने वालों के सीवी छांटते वक़्त इसी तरह का भेद-भाव अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस में भी देखा जाता है.

पेरिस स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के एक रिसर्चर का कहना है ये भेद-भाव नस्ली फर्क़ या पैदाइश की जगह की वजह से नहीं किया जाता. बल्कि ये एक ख़ास मानसिकता की वजह से किया जाता है.

दरअसल लोग अपने जैसे नज़र आने वाले और अपने जैसी ज़बान बोलने वालों के साथ ज़्यादा सहज महसूस करते हैं. इसलिए ऐसा भेद-भाव किया जाता है.

वैसे अपना नाम बदलना आसान काम नहीं है. क्योंकि ये किसी भी इंसान की पहचान होता है. ठीक उसी तरह जिस तरह हमारा रंग-रूप, हमारा देश, सब कुछ हमारी पहचान होता है.

लेकिन नौकरी तलाशने वाले अपने सीवी में सिर्फ इसलिए तब्दीली करते हैं ताकि एक बार उन्हें इंटरव्यू तक पहुचने का मौक़ा मिल जाए.

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साल 2016 में टोरंटो यूनिवर्सिटी और एडमिनिस्ट्रेटिव साइंस क्वाटरली ने एक रिसर्च की. लगभग 40 फ़ीसद अल्पसंख्यकों ने माना कि वो नौकरी पाने के लिए अपने सीवी में बदलाव करते हैं. कुछ जानकारियां हटाते हैं और अंग्रेज़ जैसे लगने वाले नाम रखना ज़्यादा बेहतर समझते हैं.

इस रिसर्च में काम करने वाली एक रिसर्चर सोनिया कांग कहती हैं कि इस समस्या को हल करने के लिए क़दम उठाए जाने ज़रूरी हैं.

हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में सोशल एथिक्स की प्रोफ़ेसर माहज़रीन बानाजी कहती हैं कि हम खुद को भले ही खुले ज़ेहन वाला होने का दावा करते हैं. लेकिन असल में हम उन्हीं लोगों को अपने साथ और आस पास देखना चाहते हैं, जो हम जैसे ही नज़र आते हैं. जिनकी तालीम, तजुर्बा और रहन-सहन सब कुछ मिलता जुलता होता है. और ये किसी एक कंपनी में या छोटे दर्जे की कंपनियों में ही नहीं होता.

बल्कि गूगल जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी इससे अछूती नहीं हैं. 2015 में सामने आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस कंपनी में काम करने वाले लगभग 60 फ़ीसद लोग अंग्रेज़ हैं, 31 फ़ीसद एशियाई हैं, तीन फ़ीसद हिस्पैनिक हैं और सिर्फ दो फ़ीसद लोग काली चमड़ी वाले हैं.

कोई भी इंसान अपना नाम बदलना नहीं चाहेगा. लेकिन जब रोज़गार हासिल करने की मजबूरी हो तो ऐसा करना ही पड़ता है.

यह ऐसी मुद्दा है जिस पर सभी को विचार करने और कोई हल निकालने की ज़रूरत है. अपनी क़ाबिलियत के मुताबिक़ काम तलाशना हर किसी का हक़ है, लेकिन सिर्फ रंग, नस्ल या नाम के बुनियाद पर उसे उसके हक़ से महरूम रखा जाए, ये ठीक नहीं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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