दफ़्तर की थकान आपकी जान भी ले सकती है

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अक्सर लोग कहते हैं कि दफ़्तर में काम का बहुत बोझ है. ऑफ़िस में इतना काम है कि थकान ही नहीं मिटती. दफ़्तर के काम के चलते तनाव बढ़ रहा है. वग़ैरह..वग़ैरह...

तो क्या वाकई ऐसा हो सकता है कि कोई दफ़्तर के काम से इतना थक जाए कि उसकी मौत हो जाए?

इस सवाल के जवाब में ज़्यादातर लोग ना ही कहेंगे. क्योंकि काम के बोझ से थकान, तनाव, बीमारियां तो हो सकती हैं, किसी की मौत हो जाए, यह कम ही लोगों ने सुना होगा.

पर दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जहां पर दफ़्तर के काम के बोझ से मौत की सच्ची घटनाएं हुई हैं.

इस मामले में जापान अव्वल है. जापान में तो बाक़ायदा इसके लिए एक शब्द भी ईजाद कर लिया गया है. ये शब्द है, 'कारोशी'. जिसका मतलब है "काम के बोझ से मौत".

जापान में पिछले कई दशकों से काम के बोझ से मरने की घटनाएं सुर्ख़ियां बटोरती रही हैं. मगर इनमें सच्चाई कितनी होती है? वाक़ई ऐसा होता है या फिर ये सिर्फ़ अफ़वाहें हैं?

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इसका जवाब यह है कि जापान में काम के बोझ से हक़ीक़त में कई लोगों ने दम तोड़ा है. जापाान का स्वास्थ्य मंत्रालय साल 1987 से बाक़ायदा ऐसी मौतों का हिसाब रख रहा है.

यही नहीं अगर यह साबित होता है कि किसी की मौत 'कारोशी' या काम के बोझ के चलते हुई है तो उसके परिवार को सालाना बीस हज़ार डॉलर सरकार की तरफ़ से मिलते हैं. वहीं जिस कंपनी का वो कर्मचारी होता है वो कंपनी भी सोलह लाख डॉलर का मुआवज़ा उसके परिजनों को देती है.

पहले जापान की सरकार के आंकड़ों में 'कारोशी' मौतों की संख्या सालाना कुछ सौ ही होती थी. मगर साल 2015 के आते आते काम के बोझ से मरने वालों की तादाद 2310 तक जा पहुंची थी. और ये शायद पूरी फ़िल्म का ट्रेलर ही है.

जापान की 'नेशनल डिफेंस काउंसिल फॉर विक्टिम्स ऑफ़ कारोशी' के मुताबिक़ यह आंकड़ा दस हज़ार के आस-पास है. यानी जापान में सालाना दस हज़ार से ज़्यादा लोग दफ़्तर के काम के बोझ के चलते दम तोड़ देते हैं. जापान में हर साल क़रीब इतने ही लोग सड़क हादसों में भी जान गंवाते हैं.

पर, सवाल फिर वही कि क्या वाक़ई काम के बोझ से किसी की जान जा सकती है? या फिर ये सिर्फ़ ज़्यादा उम्र और किसी और बीमारी की वजह से होता है.

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आज के दौर में जब हम तकनीकी तरक़्क़ी की वजह से चौबीसों घंटे दफ़्तर से जुड़े रहते हैं, काम का बोझ तो बढ़ा है. तो क्या दूसरे देशों में 'कारोशी' या काम के बोझ से होने वाली मौत की अनदेखी की जा रही है?

किसी की जान जाने की वजह 'कारोशी' या काम के बोझ से मौत कह पाना ज़रा मुश्किल होता है. टोक्यो के केंजी हमाडा को ही लीजिए. केंजी, एक सुरक्षा कंपनी में काम करता था. प्यारी सी बीवी थी. ख़ुशहाल ज़िंदगी थी. मगर दफ़्तर में काम बहुत ज़्यादा था. वो रोज़ क़रीब 15 घंटे ड्यूटी करता था. फिर चार घंटे दफ़्तर आने-जाने में लग जाते थे.

उन्हें एक दिन अपने दफ़्तर में औंधे मुंह लेटा देखा गया. साथियों ने सोचा कि वे सो रहे हैं. मगर जब केंजी कई घंटों बाद भी नहीं उठे, तो लोगों ने पास जाकर आवाज़ दी. पता चला कि केंजी की मौत हो चुकी थी. केंजी की उम्र महज़ 42 बरस थी.

केंजी की मौत साल 2009 में हुई थी. मगर जापान में 'कारोशी' से पहली मौत उससे चालीस बरस पहले दर्ज की गई थी.,जब 29 साल के एक आदमी की ऐसे ही मौत हो गई थी. वो आदमी जापान के सबसे बड़े अख़बार का कर्मचारी था.

ब्रिटेन की लैंकैस्टर यूनिवर्सिटी के कैरी कूपर कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध की हार के बाद जापानियों ने ख़ुद को काम में झोंक दिया था. जापान के लोग पूरा-पूरा दिन काम करके हार के ग़म को भुलाने और फिर से तरक़्क़ी करने में जुट गए थे.

कारोबारियों के लिए तो यह बहुत अच्छी बात थी कि लोग ज़्यादा घंटों तक काम कर रहे थे. उनका मुनाफ़ा बढ़ रहा था.

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जापानी कंपनियों ने भी ज़्यादा काम करने वाले लोगों की सुख सुविधाओं पर पैसे खर्च करने शुरू किए. उनके बीमा कराए गए. मकान का इंतज़ाम किया गया. सेहत का ख़याल रखने के लिए हेल्थ क्लिनिक खोले गए. बच्चों की देखभाल का इंतज़ाम भी कंपनी की तरफ़ से होता था.

कुछ दशकों बाद हालात बिगड़ गए. अस्सी के दशक में शेयर और रियल्टी के दाम तेज़ी से बढ़े. इस दौरान जापानियों की तनख़्वाह में भी ख़ूब इज़ाफ़ा हुआ. इसे जापान की 'बबल इकॉनमी' भी कहा गया.

उस दौर में जापान की पांच फ़ीसद आबादी हफ़्ते में 60 घंटे काम कर रही थी. यानी रोज़ाना औसतन बारह घंट. जबकि अमरीका और ब्रिटेन के लोग उस दौर में रोज़ाना आठ घंटे ही काम करते थे.

उस दौर में 1989 में जापान में हुए एक सर्वे में 45 फ़ीसद सीनियर कर्मचारियों और 66 फ़ीसद टीम मैनेजर्स को यह डर होता था कि वो काम के बोझ से मर जाएंगे. अस्सी के दशक में 'कारोशी' यानी ज़्यादा काम के चलते होने वाली मौतों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही थी. उसी दौरान जापान ने 'कारोशी' का हिसाब रखना शुरू किया.

किसी मौत को 'कारोशी' का दर्जा मिले. इसके लिए ज़रूरी है कि मरने वाला, मौत से एक महीने पहले हफ़्ते में 100 घंटे तक काम करता रहा हो. या मौत से पहले के दो महीनों में औसतन 80 घंटे हर हफ़्ते काम करता रहा हो.

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जब नब्बे के दशक में जापान की अर्थव्यवस्था में मंदी आई तो ये जापान की कंपनियों में काम का बोझ और बढ़ गया. इस दौरान 'कारोशी' की संख्या बहुत बढ़ गई. ख़ास तौर से मैनेजमेंट स्तर के लोगों की मौत के आंकड़े तो बेहद ख़तरनाक स्तर तक पहुंच गए.

अधेड़ लोगों की ख़राब सेहत जैसे दिल की बीमारी, डायबिटीज़ से मौत अलग बात है. लेकिन सेहतमंद युवाओं की बेवक़्त मौत वाक़ई गंभीर मसला है.

आज की दुनिया में जो रहन-सहन है, उसमें दो दिक़्क़तें बड़ी हैं. तनाव और नींद की कमी. अब सवाल यह है कि क्या ज़्यादा तनाव और न सो पाने से किसी की मौत हो सकती है? दफ़्तर में कितना वक़्त बिताने के बाद आपके ढेर होने का डर हो सकता है?

पूरी रात जागने के बाद सुबह नौकरी पर जाना किसी के लिए भी तकलीफ़देह हो सकता है. लेकिन नींद न पूरी होने से किसी मौत की मिसाल नहीं मिलती. इस बात के तो तमाम सबूत मिलते हैं कि नींद न पूरी होने से कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं. जैसे दिल की बीमारी, रोगों से लड़ने की बीमारी वग़ैरह.

नींद पूरी न होने से कई तरह के कैंसर भी हो सकते हैं. डायबिटीज़ भी हो सकती है. लेकिन जागते रहने से किसी इंसान की मौत की कोई घटना अब तक नहीं देखी-सुनी गई है.

सबसे ज़्यादा वक़्त तक जागने का रिकॉर्ड, रैंडी गार्डनर नाम के शख़्स के नाम है. जो 264 घंटे तक लगातार जागा था. साल 1964 में 11 दिन जागने का रिकॉर्ड बनाकर जब रैंडी सोए तो वो 14 घंटे चालीस मिनट बाद उठे थे. रैंडी आज भी ज़िंदा हैं और अमरीका के सैन डिएगो में रहते हैं.

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यूं तो तनाव को कई बीमारियों की जड़ कहा जाता है. मगर अब तक तनाव से किसी को दिल का दौरा नहीं पड़ा. हां इससे स्मोकिंग या शराबनोशी जैसी बुरी लत आपको ज़रूर पड़ सकती है.

तनाव से कैंसर होने जैसी भी कोई घटना नहीं हुई है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने 'मिलियन वुमन स्टडी' की थी, जिसमें क़रीब सात लाख महिलाओं की सेहत पर क़रीब एक दशक तक नज़र रखी गई.

इस दौरान 48 हज़ार 314 महिलाओं की मौत हो गई. मरने वाली ज़्यादातर महिलाओं ने ख़ुद को तनाव का शिकार बताया था. मगर उन्हें दूसरी बीमारियां भी थीं. इस तजुर्बे से साफ़ है कि तनाव से आपकी कोई बीमारी बढ़ सकती है. मगर तनाव मौत की वजह नहीं हो सकता. फिर चाहे दफ़्तर में एक हफ़्ता आपका बेहद तनाव में गुज़रा हो या फिर पूरा साल.

जापान में 'कारोशी' पर हुए रिसर्च से साफ़ है कि जो लोग हफ़्ते में 55 या इससे ज़्यादा घंटे दफ़्तर में गुज़ारते हैं, उन्हें दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा बढ़ जाता है. उनके मुक़ाबले ऑफ़िस में 40 घंटे बिताने वालों को ये ख़तरा कम होता है. यानी अपनी कुर्सी पर ज़्यादा देर बैठना आपकी सेहत के लिए नुक़सानदेह है.

आज की तारीख़ में जापानी लोग दफ़्तर में उतना वक़्त नहीं गुज़ारते, जितना चीन, भारत या फिर मेक्सिको के लोग. लिहाज़ा 'कारोशी' की सबसे ज़्यादा घटनाएं फ़िलहाल चीन में दर्ज की जा रही हैं.

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चीन में काम के बोझ से मौत को 'गुओलाओसी' कहते हैं. चीन में हर साल क़रीब 6 लाख लोगों की जान दफ़्तर में काम के ज़्यादा बोझ से वक़्त से पहले चली जाती है. यानी चीन में रोज़ाना 1600 लोग काम के बोझ से ही मर जाते हैं.

भारत, दक्षिण कोरिया, ताईवान में भी काम का बोझ लोगों पर बढ़ रहा है. लैंकैस्टर यूनिवर्सिटी के कैरी कूपर 2013 में लंदन में हुई घटना की याद दिलाते हैं, जब अमरीकी कंपनी मेरिल लिंच के मोरिज एरहार्ट की मौत दफ़्तर में लगातार 72 घंटे काम करने बाद घर लौटने पर हो गई थी.

मोरिज की उम्र महज़ 21 बरस थी. इस घटना की जांच के बाद मेरिल लिंच में इंटर्नशिप के घंटों की मियाद 17 तक सीमित कर दी गई थी.

इन बातों से साफ़ है कि आप दफ़्तर में काम होने पर ही रुकें. बेवजह बैठकर काम के घंटे मत बढ़ाएं. तमाम सर्वे से यह बात सामने आई है कि अक्सर लोग दिखावे के लिए दफ़्तर में ज़्यादा देर बैठे रहते हैं. बेहतर है कि वे घर जाएं और परिवार के साथ वक़्त बिताएं.

जापान हो या भारत, बहुत से कर्मचारी अपने बॉस से पहले घर जाने से घबराते हैं. मगर इससे न कंपनी का भला होता है और न ही किसी कर्मचारी का. ज़्यादा देर दफ़्तर में बैठना सेहत के लिए नुक़सानदेह हो सकता है. इस वक़्त का और बेहतर इस्तेमाल करने की सोचें.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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