जहां नकद पैसा रखना सिरदर्द बन गया है

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बड़े-बुजुर्ग हमें हमेशा समझाते रहे हैं कि पैसा बहुत संभालकर रखना चाहिए. ये बड़े काम की चीज़ है. इससे कई तरह की मुश्किलें हल हो सकती हैं. लेकिन, दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहां के लोगों के लिए पैसा बोझ बनता जा रहा है. उसे सहेजकर रखना बड़ा सिरदर्द साबित हो रहा है.

ऐसा ही एक देश है यूरोप का नीदरलैंड. जहां पर लोगों को नक़द लेन-देन करते देखना बेहद मुश्किल है. किराने की छोटी सी दुकान हो या बड़ा सा रेस्तरां, ब्यूटी सैलून हो या फिर सिनेमाघर, हर जगह नक़द की जगह कार्ड से भुगतान का चलन है यहां.

आपको सब्ज़ी ख़रीदनी हो, या फिर पनीर, दूध लेना हो या कार के लिए पेट्रोल, सबके लिए आपको कार्ड की ही मदद लेनी होगी. आपने नक़दी दिखाई, तो बहुत मुमकिन है कि सामने वाला इसे लेने से ही इनकार कर दे.

दुकानदारों से लेकर बैंकवालों तक को, सबको अब नक़दी सहेजना सिरदर्द लगने लगा है. कार्ड से भुगतान आसान है सुरक्षित है. फिर चाहे टेलीफ़ोन का बिल भरना हो या किराया. सबको कार्ड से ही पेमेंट चाहिए.

नीदरलैंड में किसी छोटी-मोटी सब्ज़ी की दुकान में भी भुगतान के लिए कार्ड ही चलता है. दुकानदार को नक़द लेन-देन पसंद नहीं. सुबह की ब्रेड और दूध लेने जाएं तो भी कार्ड लेकर जाना पड़ता है.

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डच सेंट्रल बैंक के सलाहकार मिशेल वान डोएवरन कहते हैं कि आज नक़दी डायनासोर बनती जा रही है. ये पूरी तरह से तो ख़त्म नहीं होगी, मगर इसका चलन दिनों-दिन कम होता जाएगा. क्योंकि लोगों को इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन सुविधाजनक लगता है.

2015 में पहली बार नीदरलैंड में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की रक़म, नक़द लेन-देन से आगे निकल गई. नीदरलैंड के बैंकों की कोशिश है कि वो कार्ड से लेन-देन को और बढ़ावा दें. क्योंकि ये सस्ता है, आसान है और सुरक्षित है.

नीदरलैंड की ही तरह यूरोप के एक और देश स्वीडन का भी यही हाल है. यहां बड़ी तेज़ी से नक़दी का चलन ख़त्म हो रहा है. वजह ये भी है कि हर दुकानदार के कार्ड स्वाइप करने पर बैंक भी हिस्सा बनता है. इसीलिए अब स्वीडन के बैंक, नक़दी जमा करने आने वालों से भी पैसे लेने लगे हैं. जिससे कि लोग, नक़द भुगतान से बचें.

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स्वीडन की तमाम कंपनियां पहले ही नक़द लेन-देन ख़त्म कर चुकी हैं. जैसे कि वहां की सबसे बड़ी टेलीफ़ोन कंपनी टेलिया अब नक़द पैसे नहीं लेती. वो हर भुगतान अब इलेक्ट्रॉनिक तरीक़े से ही मांगती है. स्वीडन की बसों में सफ़र के लिए भी अब आपको कार्ड की ज़रूरत होगी. यहां तक कि क़िताबें और अख़बार बेचने वाले बेघर लोग भी कार्ड और मोबाइल के ज़रिए भुगतान की मांग करते हैं.

स्वीडन में नक़द पैसों का इतना बुरा हाल है कि जिनके घर में पहले के नोट और सिक्के रखे हैं, वो वैसे के वैसे रखे हुए हैं. कोई भी उनको मंज़ूर करने को तैयार नहीं. कई लोग तो ये पैसे अपने माइक्रोवेव में छुपाकर रखते हैं!

वैसे कई यूरोपीय देश ऐसे भी हैं, जहां नक़दी का इस्तेमाल अभी भी धड़ल्ले से हो रहा है. जैसे कि जर्मनी में. यहां अभी भी 75 प्रतिशत लेन-देन नक़द में ही होताहै. इटली में ये तादाद 83 फ़ीसद है.

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अमरीका में भी नक़दी का चलन है अभी. हालांकि अब चिप वाले क्रेडिट और डेबिट कार्ड तेज़ी से प्रयोग किए जा रहे हैं. लेकिन, बहुत से कारोबारी अब नक़द लेन-देन से बच रहे हैं. मोबाइल और ऐप के ज़रिए भी लोग ख़ूब भुगतान कर रहे हैं.

अब तो अफ्रीका के कई देशों में भी नक़द भुगतान से गुरेज किया जा रहा है. जैसे कि केन्या और तंज़ानिया में मोबाइल बैंकिंग सिस्टम, एम-पैसा के ज़रिए बहुत से लोग बिल का भुगतान कर रहे हैं. अपनी तनख़्वाह ले रहे हैं. जानवर भी इसी से ख़रीदे जा रहे हैं और कई बार दूध-सब्ज़ी और मांस भी ख़रीदते हैं.

भारत में भी सरकार और बैंक चाहते हैं कि आप नक़द के बजाय कार्ड के ज़रिए लेन-देन करें. इससे वो नक़दी को लाने-ले जाने और सहेजने के झंझट से बच जाते हैं.

वहीं सरकार को भी काले धन पर क़ाबू पाने में मदद मिलती है. बहुत से मोबाइल ऐप भी आ गए हैं जो आपको नक़द भुगतान के सिरदर्द से बचाते हैं. यानी आपको हर वक़्त जेब में पैसे डालकर चलने की ज़रूरत नहीं. आप या तो कार्ड के ज़रिए किसी चीज़ का भुगतान कर सकते हैं. या फिर, आपके पास मोबाइल से पेमेंट का विकल्प भी है.

वैसे बहुत से लोगों को नक़दी के बजाय इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन पसंद नहीं है. पर ये तय है कि आने वाले वक़्त में नक़दी की अहमियत कम होती जानी है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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