अंग्रेज़ों की अंग्रेज़ी सबसे ख़राब!

अंग्रेज़ी आज पूरी दुनिया में कारोबार की ज़बान है. मगर ये अंग्रेज़ों की मातृभाषा है. जैसे बहुत से भारतीयों की मादरी ज़बान हिंदी है, ठीक उसी तरह से. अब हम सब जानते हैं कि जो ज़बान जिसकी मातृभाषा होती है, वो उसका उस्ताद होता है.

लेकिन, अगर हम ये कहें कि अंग्रेज़, सबसे ख़राब अंग्रेज़ी बोलते हैं तो आपको शायद ही यक़ीन हो. मगर है ये बिल्कुल सच.

अभी हाल ही में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को भारी नुक़सान उठाना पड़ा. वजह ये कि उसके एक अंग्रेज़ कर्मचारी ने जो ई-मेल भेजा, वो दूसरी कारोबारी कंपनी के कर्मचारी को उल्टा समझ में आया. जो डील होनी थी, वो नहीं हुई. इसकी वजह ये थी कि जिस अंग्रेज़ ने वो ई-मेल भेजा था उसमें स्थानीय बोलचाल का शब्द इस्तेमाल किया था. इसे दूसरे देश में रहने वाले दूसरी कंपनी के कर्मचारी ने ग़लत समझा और बहुराष्ट्रीय कंपनी को भारी नुक़सान झेलना पड़ा.

ग्लोबल हो रही दुनिया में अंग्रेज़ी सबसे बड़ी कारोबारी ज़बान बन गई है. तमाम देशों के लोग, जिनकी पहली ज़बान अपनी भाषा होती है, वो अंग्रेज़ी सीखते हैं. जैसे हम भारतीय. इसी तरह चीन, जापान, जर्मनी और फ्रांस के लोग भी अंग्रेज़ी सीखते हैं.

हम लोगों के मुक़ाबले अमरीकी और अंग्रेज़ लोगों को अलग से एक भाषा सीखने की ज़रूरत नहीं होती. मगर, कारोबार की दुनिया में बहुत से ऐसे लोगों से वास्ता पड़ता है जिन्होंने बड़ी मेहनत से अंग्रेज़ी सीखी होती है. उनके बोलने का लहजा अलग होता है. वो गिने-चुने अंग्रेज़ी के लफ़्ज़ इस्तेमाल करते हैं. ऐसे लोग बहुत संभलकर अंग्रेज़ी बोलते हैं, ताकि सामने वाला कहीं ग़लत न समझ बैठे.

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Image caption प्रोफेसर जेनिफर जेनकिंस

वहीं अंग्रेज़ या अमरीकी, जिनकी मातृभाषा अंग्रेज़ी है, वो बड़ी तेज़ रफ़्तार से बोलते हैं. वो ये नहीं अंदाज़ा लगा पाते कि उनके साथ के बाक़ी लोग उतनी तेज़ी से नहीं समझ रहे हैं. साथ ही, हर इलाक़े के लोग अपने हिसाब से कुछ लोकल अंग्रेज़ी लहजा इस्तेमाल करते हैं. इसे समझना उन लोगों के लिए और भी मुश्किल होता है जिनकी पहली ज़बान अंग्रेज़ी नहीं. जैसे कि हम हिंदुस्तानियों के लिए.

हमारी अपनी भाषा में कुछ ऐसे ख़ास शब्द होते हैं जिनका स्टैंडर्ड से हटकर मतलब होता है. इसी तरह बहुत से मज़ाक़ भी हर ज़बान के हिसाब से अलग होते हैं. अब जैसे अंग्रेज़ या अमरीकी, अपने तरीक़े का मज़ाक़ करते है, जो बहुत से चीनी, जापानी या भारतीय लोगों को बिल्कुल समझ में नहीं आता. फिर वो कई तरह के संक्षिप्त शब्द इस्तेमाल करते हैं, जो बाक़ी दुनिया के लोगों की समझ से परे होते हैं.

ब्रिटेन में भाषा की ट्रेनिंग देने वाले चिया सुआन चोंग कहते हैं कि अंग्रेज़ों को अंग्रेज़ी की बुनियादी बातें समझने की ज़रूरत है. उन्हें ये सीखने की ज़रूरत है कि सरल अंग्रेज़ी में कैसे अपनी बात दूसरों को समझाई जाए.

ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी की जेनिफर जेनकिंस कहती हैं कि आज अंग्रेज़ी बोलने वालों की तादाद आम अंग्रेज़ो से ज़्यादा है. वो इसलिए अंग्रेज़ों को अपने आप को बदलने की ज़रूरत है. क्योंकि वो अपनी बात बाक़ी दुनिया को नहीं समझा पाते हैं.

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असल में जो लोग अंग्रेज़ी को दूसरी या तीसरी ज़बान के तौर पर सीखते हैं वो अंग्रेज़ी बोलने में कम शब्द इस्तेमाल करते हैं. सीधे-सपाट लहज़े में बात रखते हैं. अंग्रेज़ी के तमाम मुहावरों के इस्तेमाल से बचते हैं.

बाहर से आकर ब्रिटेन में पढ़ने वाले छात्र एक-दूसरे की बात आसानी से समझ लेते हैं. वहीं स्थानीय छात्रों की बात समझने में उन्हें दिक़्क़त होती है.

स्विटज़रलैंड के रहने वाले माइकल ब्लैटनर की मातृभाषा स्विस है. मगर वो कारोबार के लिए अंग्रेज़ी ही इस्तेमाल करते हैं. वो बताते हैं कि ऐसे साथी जो अंग्रेज़ नहीं हैं, वो उनकी बात आसानी से समझ लेते हैं. जबकि अंग्रेज़ों को माइकल की अंग्रेज़ी समझ में नहीं आती.

अंग्रेज़ और अमरीकी लोग, बहुत से ऐसे संक्षिप्त शब्द इस्तेमाल करते हैं, जो बाक़ी दुनिया के लोगों की समझ से परे होते हैं. बातचीत में ये चीज़ सबसे बड़ी मुश्किल पैदा करती है. मुश्किल और बढ़ जाती है जब आपको पता चलता है कि ब्रिटिश और अमरीकी अंग्रेज़ी के एब्रिविएशन अलग-अलग होते हैं.

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Image caption ज्यां पॉल नेरियर

ब्रिटिश और अमरीकी अंग्रेज़ी में फ़र्क़ समझने और बातें कहने का भी होता है. जैसे कि अगर किसी अंग्रेज़ को कोई प्रस्ताव अच्छा नहीं लगता तो वो कहेगा That's interesting. इसका मतलब है कि आपका प्रस्ताव बकवास है. वहीं जब कोई अमरीकी आपका प्रस्ताव ख़ारिज करेगा तो उसका तरीक़ा अलग होगा.

कारोबार की दुनिया में अक्सर अलग देशों के लोग फोन पर या वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए बात करते हैं. अब जिन लोगों की पहली ज़बान अंग्रेज़ी नहीं होती, वो कई बार ब्रिटिश या अमरीकी शख़्स की बात नहीं समझ पाते. ख़राब कनेक्शन से बात और बिगड़ सकती है.

स्विटज़रलैंड के डेल कोल्टर कहते हैं कि अंग्रेज़ों को नहीं पता कि इंटरनेशनल लेवल की अंग्रेज़ी कैसे बोली जाती है. वो एक क़िस्सा बताते हैं. एक बार एक कंपनी के जर्मन कर्मचारियों के लिए अमरीका के कैलिफ़ोर्निया से कांफ्रेंस कॉल की गई. उन्हें कुछ नई बातें समझानी थीं. क़रीब घंटे भर की कांफ्रेंस कॉल के बाद कैलिफ़ोर्निया से बोल रहे लोगों ने ये कहा कि उन्होंने अच्छे से अपनी बात कह दी है. मगर कांफ्रेंस कॉल में शामिल जर्मन कर्मचारियों को आधी से ज़्यादा बात समझ नहीं आई.

डेल कहते हैं कि जो लोग अंग्रेज़ी को नई ज़बान के तौर पर सीखते हैं, वो शर्मिंदगी के डर से अक्सर उन बातों पर भी हामी भरते हैं, जो उन्हें समझ में नहीं आई होतीं.

इसीलिए फ्रांस के ज्यां पॉल नेरियर ने अंग्रेज़ी को सरल रूप में समझने-समझाने के लिए पंद्रह सौ शब्दों की नई ज़बान गढ़ी है. इसे उन्होंने ग्लोबिश नाम दिया है. इसमें केवल पंद्रह सौ शब्द हैं, जिनके जरिए लोग अपनी बात कह सकते हैं. इतने कम शब्दों में बात कहने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि आप अपनी बात आसान लफ़्ज़ों और सीधे-सपाट लहजे में कह सकते हैं. पिछले बारह सालों में नेरियर ने ग्लोबिश की दो लाख से ज़्यादा प्रतियां बेची हैं. इसका 18 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

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नेरियर कहते हैं कि अगर आप कम शब्दों में अपनी बात कह सकते हैं, तो उससे अच्छा कुछ नहीं. आपके ग़लत समझे जाने की गुंजाइश कम हो जाती है.

फ्रांस में रहकर फ्रेंच भाषा सीखने वाले अंग्रेज़ रॉब स्टेगल कहते हैं कि आप साफ़ लहजे में सीधी सपाट बात कहें. इसमें किसी के ऊपर रौब गांठने वाला अंदाज़ न हो. अंग्रेज़ी बोलने का ये सबसे बेहतर तरीक़ा होगा.

प्रोफेसर जेनिफर जेनकिंस कहती हैं कि अंग्रेज़ों के तेज़ रफ़्तार में बोलने के बजाय ठहरकर बोलना चाहिए. दूसरों की बातें ध्यान से सुनना चाहिए. सामने वाला शायद उतनी तेज़ रफ़्तार से अंग्रेज़ी न बोल सके. ऐसे में उसकी बात को ठहरकर सुनना चाहिए. उतावलापन दिखाना ठीक नहीं.

जेनकिंस के मुताबिक़ अक्सर अंग्रेज़ और अमरीकी लोग, दूसरों को धीरे बोलते देखकर परेशान हो जाते हैं. जबकि जिन्होंने अंग्रेज़ी को दूसरी-तीसरी भाषा के तौर पर सीखा होता है, वो तसल्ली से बात कहते-सुनते हैं. अंग्रेज़ों को भी ये सीखने की ज़रूरत है. वरना मीटिंग ख़त्म होने के बाद लोग सवाल करेंगे कि भाई आप क्या समझाना चाह रहे थे?

कुल मिलाकर, अंग्रेज़ी भले ही 'फनी लैंग्वेज' हो, मगर अंग्रेज़ों को इंटरनेशनल इंग्लिश को संजीदगी से, नए सिरे से सीखने की ज़रूरत है.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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