कहीं आप भी वर्क हसबैंड या वर्क वाइफ़ तो नहीं?

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मौजूदा दौर में स्त्री और पुरुष दोनों घर से बाहर निकल कर काम कर रहे हैं. दोनों का वक़्त घर से ज़्यादा दफ़्तर में गुज़रने लगा है. लिहाज़ा एक ही ऑफ़िस में काम करने वालों के दरमियान नज़दीकियां भी बढ़ने लगी हैं.

एक ज़माना था कि लोग ऑफिस में सिर्फ़ अपने काम से काम रखते थे. आठ घंटे की शिफ्ट में काम निपटाया और आ गए अपने घर. लेकिन अब अर्थव्यवस्था बदल गई है. लोग सातों दिन, 24 घंटे काम करने लगे हैं. ऐसे में लोग दफ़्तर में ही अपने साथियों के साथ अपने सुख-दुख बांटते हैं.

ज़्यादा वक़्त साथ बिताने पर लोग, एक दूसरे को बेहतर तौर पर समझने लगते हैं. एक टीम बनने के बाद वो बिल्कुल ऐसे ही काम करने लगते हैं जैसे एक घर को चलाने के लिए मियां-बीवी काम करते हैं. इसीलिए ऐसे लोगों को 'वर्क हसबैंड' और 'वर्क वाइफ़' कहा जाने लगा है.

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जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बदल रही है वैसे-वैसे दफ़्तर की दोस्ती भी नए रंग-रूप ले रही है. एक करियर वेबसाइट 'वॉल्ट डॉटकॉम' ने एक सर्वे कराया.

पाया गया कि जहां 2010 में 30 फ़ीसद लोग 'वर्क हसबैंड' और 'वर्क वाइफ़' थे. वहीं, चार साल बाद, 2014 में ये आंकड़ा बढ़कर 44 फ़ीसद हो गया. अमरीका की नेब्रास्का यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशन स्टडीज़ के प्रोफेसर चैड मैक्ब्राइड का कहना है अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और उनकी विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहीं, कॉन्डोलिज़ा राइस के बीच जो कामकाजी ताल्लुक़ात थे, वो भी वर्क हसबैंड या वर्क वाइफ़ के दायरे में आते हैं.

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अमरीका में 2015 में 276 लोगों पर एक सर्वे कराया गया था. इस सर्वे के नतीजों के आधार पर कहा जा सकता है कि काम करने की जगह पर लोगों के बीच जो रिश्ता बनता है, वो ज़्यादा भरोसेमंद होता है. लोग ईमानदारी से इस रिश्ते को निभाते हैं, एक दूसरे पर भरोसा करते हैं.

इस रिश्ते में बहुत सी ऐसी ख़ूबियां होती हैं जो एक शादीशुदा रिश्ते में देखने को मिलती हैं. लेकिन एक ख़ासियत बहुत कम देखी जाती है. इस रिश्ते में रोमांस नहीं होता. वो एक दूसरे के लिए जज़्बाती लगाव रखते हैं, ख़्याल करते हैं, लेकिन जिस्मानी तौर पर एक दूसरे के क़रीब नहीं होते.

प्रोफेसर मैक्ब्राइड को अपने सर्वे में सिर्फ़ दो ऐसे लोग मिले, जिनके बीच कामकाजी रिश्ते के साथ-साथ रूमानी रिश्ता भी था. सर्वे में शामिल लोगों का ये भी कहना है कि किसी एक सहकर्मी के साथ अच्छा रिश्ता बनने के बाद उनके काम के तरीके में बेहतरी आई. वर्क हसबैंड या वर्क वाइफ़ का रिश्ता बन जाने के बाद दोनों ही कर्मचारी मिलकर कंपनी के लिए बेहतर काम कर पाते हैं.

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Image caption जॉर्ज बुश और कॉन्डोलिज़ा राइस

गुज़रे कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव आए हैं. हर एक कंपनी के सामने अपना टारगेट हासिल करने की चनौती है. इस चुनौती को वो हर हाल में पूरा करने चाहते हैं.

ये तभी मुमकिन है जब कंपनी के सभी कर्मचारी आपसी तालमेल से बेहतर काम करें. नए-नए आइडिया के साथ नए प्रोजेक्ट पर काम किया जाए.

इसीलिए कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए अक्सर पार्टी आयोजित कराती हैं ताकि सभी कर्मचारी एक ख़ुशगवार माहौल में एक दूसरे को समझ सकें.

एक दूसरे की कमज़ोरी और ताक़त दोनों को पहचान सकें ताकि उन्हें अपनी टीम चुनने का मौका मिले तो ख़ुद ही ऐसे साथी को चुनाव कर सकें, जिसके साथ वो बेहतर काम कर सकते हैं.

वर्क हसबैंड और वर्क वाइफ़ का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. इसके बावजूद बहुत से लोग इस शब्द का इस्तेमाल करने से कतराते हैं. शादीशुदा और ग़ैर शादीशुदा दोनों ही अपने परिवार और दोस्तों के दरमियान इस शब्द का इस्तेमाल करने से बचते हैं.

प्रोफ़ेसर मैक्ब्राइड और नेब्रास्का की कार्ला मैसन बर्गेन ने जो रिसर्च की उसमें पाया कि ऐसे रिश्तों में बंधे 40 फ़ीसद लोग इसे वर्क हसबैंड या वर्क वाइफ़ का नाम देने से कतराते हैं.

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बहरहाल, ऐसे रिश्ते काम करने के लिहाज़ से कंपनी और कर्मचारी दोनों के लिए अच्छे हो सकते हैं. लेकिन जिस तरह एक शादीशुदा जोड़े के बीच तलाक़ हो जाता है उसी तरह इस रिश्ते में भी कई बार अलगाव हो जाता है.

जैसे अगर आपकी वर्क वाइफ़ किसी और कंपनी में चली जाए तो आपको नए सिरे से उस जैसा साथी तलाशना होगा. और आपकी वर्क वाइफ़ को भी नए वर्क हसबैंड की ज़रूरत होगी.

लेकिन फ़ैसला हमेशा होशमंदी से कीजिए. अगर आपको पेशेवर जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए अच्छे मौक़े मिल रहे हैं तो सिर्फ़ अपनी वर्क वाइफ़ या हसबैंड के लिए इस मौक़े को गंवा देना ठीक नहीं.

अगर आप कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं, तो हरेक सीढ़ी पर आपको ऐसा कोई ना कोई साथी ज़रूर मिल जाएगा जो आपके काम और सफ़र दोनों को हसीन बना देगा.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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