क्या आपका रहन सहन हरकतों से मेल खाता है?

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माना जाता है इंसान के रहन-सहन, गुफ़्तगू के अंदाज़, चीज़ों के रख-रखाव से उसके किरदार की झलक मिलती है. मान लीजिए कोई अच्छे कपड़े पहना हुआ सभ्य नज़र आने वाला इंसान चोरी कर ले तो लोगों को हैरानी होगी.

वे यही कहेंगे कि देखने से तो नहीं लगता कि ये ऐसा भी कर सकता है. क्योंकि उसका हाव-भाव और रहन-सहन उसकी इस हरकत के साथ मेल नहीं खाता.

इसी तरह आपने देखा होगा कि दफ़्तर में कुछ लोग अपने काम की जगह बहुत सलीक़े से रखते हैं. कुछ लोग उसी जगह पर चीज़ें फैलाए रखते हैं. वे उसी जगह बैठे बैठे खा भी लेते हैं.

वहीं, कुछ लोग होते हैं जिन्हें अपनी डेस्क पर हरेक चीज़ क़रीने से रखी हुई पसंद होती है. गंदगी उनसे बर्दाश्त नहीं होती. ये सारी बातें उस इंसान की शख़्सीयत के बहुत से पहलू हमारे सामने लाती हैं.

बहुत सी रिसर्च इस बात पर मुहर लगाती हैं कि आपकी डेस्क के रख-रखाव का असर आपके काम पर पड़ता है. ब्रिटेन की एक यूनिवर्सिटी रिसर्च बताती है कि काम करने की जगह के रख-रखाव के आधार पर लोगों को पांच दर्जों में बांटा जा सकता है.

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कुछ दफ़्तरों में कर्मचारी डेस्क पर सामान बिखेर कर रखते हैं. एक डेस्क के साथ अगर दो कुर्सियों की जगह तो वहां तीन-चार कुर्सियां पड़ी होती है. सरकारी दफ़्तर में तो अक्सर ही ये मंज़र देखने को मिल जाता है.

कुछ लोगों ने तो अपनी डेस्क पर डेकोरेशन का भी ख़ूब सामान रखा होता है. इसकी वजह से उनकी डेस्क की ख़ूबसूरती नहीं बढ़ती, बल्कि वो जगह बेतरतीब लगने लगती हैं.

ब्रिटन की मनोवैज्ञानिक लिली बर्नहाइमर का कहना है ऐसे लोग खुले मिज़ाज के होते हैं. खुले दिल से लोगों का स्वागत करते हैं. इनके डेस्क के पास इतनी कुर्सियां पड़ी होती हैं. जिसका जहां दिल चाहता है, वो वहां बैठ जाता है. आने वाले को किसी तरह का तकल्लुफ़ नहीं उठाना पड़ता. ऐसे लोगों की शख्सीयत का ये एक अच्छा पहलू है.

लेकिन इस से एक बात और पता चलती है. हो सकता है वो कर्मचारी इतना मसरूफ़ रहता है कि उसे अपने काम की जगह को सलीक़े से रखने करने का वक़्त ही नहीं मिलता.

कुछ लोगों की डेस्क पर आपने देखा होगा कि बहुत मुख़्तसर सा सामान रखा होता है. उनकी डेस्क पर उतना ही सामान और फ़ाइलें रखी होती हैं, जितने की उन्हें ज़रूरत होती है. ऐसे कर्मचारियों को फैलाव पसंद नहीं होता. वे अपने मिज़ाज से सफ़ाई पसंद होते हैं.

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लेकिन इस बात के यह मतलब हरगिज़ नहीं है कि उन्हें लोगों से खुलना मिलना पसंद नहीं होता. या बेबाकी से अपनी बात नहीं रख सकते. बल्कि ऐसे लोग हरेक काम में बहुत एहतियात बरतने वाले, मेहनती और भरोसेमंद होते हैं.

कुछ लोगों की आदत होती है. जितनी जगह उन्हें ऑफ़िस ने बैठने के लिए दी होती है वो उन्हें काफ़ी नहीं लगती. उन्हें लगता है कि और बड़ी डेस्क मिलनी चाहिए. उनकी डेस्क के साथ कोई दूसरा अपनी डेस्क सटाकर ना बैठ जाए, वो इसे लेकर भी फ़िक्रमंद रहते हैं. अपनी चीज़ें दूसरों की डेस्क के पास ही रखना शुरू कर देते हैं. या, आसपास जो अल्मारी रखी होती है, उस पर ही सामान रख देते हैं.

वे ऐसा करके सिर्फ़ यह संदेश देना चाहते हैं कि ऑफ़िस में ज़्यादा से ज़्यादा जगह उनके पास है. ऐसा करके वो अपनी दबंगई का इशारा भी देते हैं. अगर आपका कोई सहकर्मी ऐसा करता है तो आपको उससे होशियार रहने की ज़रूरत है.

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कुछ कर्मचारियों की डेस्क पर आपने देखा होगा कि बहुत सी पत्रिकाएं और क़िताबें भी रखी होती हैं. ये लोग कभी-कभी क़ुदरती नज़ारों की ख़ूबरत तस्वीरें भी रख लेते हैं. इससे पता चलता है कि ऐसा करने वाला शख़्स, दफ़्तर की चार दीवारों के अंदर ही अपनी सारी कायनात नहीं देखता. वे उसके बाहर भी अपनी ज़िदंगी देखता है. उसे क़ुदरत के नज़दीक जाना पसंद होता है.

वे अपना मनोरंजन ऑफ़िस की गपशप से ही नहीं करता, बल्कि किताबें और पत्रिकाएं पढ़कर दुनिया को अलग अंदाज़ से देखता है. उनकी समझ, उसी ऑफ़िस में काम करने वाले दूसरे कर्मचारियों से अलग होती है. ऐसे लोग ऑफ़िस के लिए एक ख़ास तरह का सरमाया होते हैं.

ऑफ़िस में बहुत से लोगों को बैठने के लिए ऐसी जगह मिलती है जहां से हरेक आने जाने वाली की नज़र उन पर होती है. कुछ लोग होते हैं, जिन्हें ऐसी जगह पर बैठ कर काम करना पसंद नहीं होता.

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लेकिन कुछ पसंद करते है. जिन्हें पसंद नहीं होता, वो एक कोने में बैठ कर काम करना पसंद करते हैं. वो दूसरे लोगों की नज़र से बच कर ही बेहतर तरीक़े से सोच पाते हैं.

बार-बार लोगों के आने जाने से उनकी सोच में ख़लल पड़ता है. ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता है वो चिड़चिड़े मिज़ाज के होते हैं. अपनी राय खुलकर नहीं दे पाते. लेकिन वो अपने काम को अलग अंदाज़ और क्रिएटिव तरीक़े से करते हैं. ऐसे लोगों से बेहतर काम निकलवाने के लिए ज़रूरी है कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए. जब वो काम कर रहे हों तो उन पर ज़्यादा ताक झांक नहीं करनी चाहिए.

बहरहाल, ये किसी इंसान को समझने का सिर्फ अंदाज़ा है. बहुत मर्तबा अंदाज़े ग़लत भी साबित हो सकते हैं. लिहाज़ा किसी इंसान के बारे में राय तभी क़ायम करें जब आप उससे कोई बात-चीत करें.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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