'भरपूर पैसा कमाने के बाद काम छोड़ना कितना सही'

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ज़िंदगी की ख़ुशियां और ज़रूरतें पूरी करने के लिए रोज़गार होना ज़रूरी है. हम खुशियों के लिए ही तो दिन-रात मेहनत करके पैसा कमाते हैं.

लेकिन जब खूब पैसा कमा लेते हैं तो ख़्याल आता है कि क्या हम सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए दुनिया में आए हैं. हमारे कुछ शौक़ होते हैं. हम चाहते हैं पैसा तो बहुत कमा लिया अब अपनी मर्ज़ी से, अपने शौक़ के मुताबिक़ ज़िंदगी को जिया जाए.

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हालांकि सबके लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं होता. लेकिन कुछ लोग होते हैं जो ऐसा कर गुज़रते हैं. इन्हीं में से एक हैं अमरीका की सिलिकॉन वैली के एक बड़े व्यापारी कीथ.

कीथ ने ख़ूब पैसा कमाया और फिर सब काम छोड़कर एक साल तक सिर्फ़ यात्रा करते रहे. अपनी ज़िंदगी की खुशी तलाशते रहे.

लेकिन उन्हें कहीं वो इत्मीनान और खुशी नहीं मिल पाई जिसकी उन्हें तलाश थी. इस तजुर्बे के बाद उन्हें एहसास हुआ कि वो पैसा सिर्फ़ ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरा करने के लिए नहीं कमा रहे थे, बल्कि इस काम में कहीं ना कहीं वो खुशी छुपी थी जिसकी तलाश में वो एक साल के लिए सफर पर निकल गए थे.

इस एक साल में उन्हें एहसास हुआ कि उनकी क़ाबिलियत किसी काम की नहीं रह गई थी. लोगों से मिलना जुलना कम हो गया था.

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दरअसल हमारा पेशा हमारी पहचान होता है. जब हम काम करते हैं तो बहुत से लोगों से हमारा साबक़ा पड़ता है. हर रोज़ एक नए तरह के तजुर्बे से गुज़रते हैं. लेकिन जब एक बार पेशेवर ज़िंदगी से अलग होते हैं तो एहसास होता है कि हमारा वही पेशा हमारे जीने का मक़सद था.

मन मुताबिक़ तनख्वाह और काम दोनों बहुत कम खुशनसीबों को मिल पाता है. कहीं लोग अपने काम से मुतमईन होते हैं तो कहीं पगार कम मिलने से परेशान. अगर इन दोनों में तालमेल नहीं होता तो अक्सर लोग बहुत जल्द अपने पेशे से ऊबने लगते हैं.

उनके लिए फिर वो पैसे कमाने का ज़रिया भर ही रह जाता है. इसीलिए जब बहुत सा पैसा आ जाता है तो वो नौकरी छोड़ने का मन बना लेते हैं.

लेकिन ऐसा बहुत कम लोगों के साथ होता है. रिसर्च बताते हैं कि ऐसा सिर्फ़ दो फीसद लोगों के साथ ही होता है.

अमरीका की फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर टिमोथी जज का कहना है कि पैसे के लिहाज़ से मुतमईन होना तो ज़रूरी है ही. लेकिन बहुत से लोग अपने पेशे को इसलिए पसंद करते हैं और उसमें जीना चाहते हैं क्योंकि यहां से उनका नए नए लोगों से रिश्ता बनता है. उनका सामाजिक दायरा बड़ा होता है. जिससे उनकी पहचान मज़बूत होती है.

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अपना प्रोजेक्ट पूरा करके उन्हें जो तारीफ़ सुनने को मिलती है वो उसी में खुश हो लेते हैं. उन्हें एक टीम की लीडरशिप का मौक़ा मिलता है वही उन्हें ज़िंदगी में मक़सद दे देता है.ऐसे लोगों के लिए पैसा अहम नहीं होता बल्कि उनका काम उनकी खुशी होता है.

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका काम से दिल भर चुका होता है. पैसा भी खूब कमा लिया होता है, लेकिन फिर भी काम नहीं छोड़ते क्योंकि उन्हें डर रहता है अगर वो काम नहीं करेंगे तो लोग उन्हें नकारा समझेंगे. 'आप क्या करते हैं' ? इस सवाल का जवाब देना उनके लिए मुश्किल होता है. क्योंकि उनके काम से समाज में उन्हें एक पहचान मिलती है. लिहाज़ा वो खुद को काम में ही उलझाए रखते हैं.

जानकार मानते हैं हर रोज़ एक नई चुनौती का सामना करना और कामयाब होना हमारी आदत का हिस्सा बन जाता है. फिर हम उसी में खुशी तलाशने लगते हैं.

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