दफ़्तर में होने वाले शोर का क्या करें!

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कई बार हमें कुछ आवाज़ों से चिढ़ हो जाती है. किसी को कंप्यूटर पर टाइपिंग की आवाज़ से खीझ होती है, तो किसी का अपने दफ़्तर के साथी का बार-बार कुछ पूछना या बात करना चिढ़ पैदा करता है.

आजकल ओपन ऑफ़िस का ज़माना है. लोग बंद दरवाज़ों में नहीं, खुले में, साझा डेस्क पर बैठकर काम करते हैं. ऐसे में बहुत से लोगों को आस-पास का शोर परेशान करता है. काम में उनके ध्यान लगाने में ख़लल डालता है.

लंदन की तान्या पार्कर ऐसी ही महिला हैं. वो एक क्रिएटिव एजेंसी में काम करती हैं. उनकी डेस्क पर और लोग भी साथ बैठते हैं. फ़ासला बस इतना ही होता है मानो हवा की दीवार हो. कई बार उनकी कुहनी, बगल में बैठे साथी के फ़ोन से टकरा जाती है. तान्या जिस जगह बैठती हैं, वहां से लिफ्ट भी पास ही है.

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फ़ोकस

अक्सर हील की आवाज़ करती हुई लड़कियां उनके पास से गुज़रती हैं. इससे तान्या को सबसे ज़्यादा खीझ होती है. वो अपने काम पर फ़ोकस नहीं कर पातीं. जब भी उन्हें ज़्यादा खीझ होती है, वो या तो बाहर टहलने निकल जाती हैं. या कॉफी शॉप में जाकर सुकून के कुछ पल गुज़ारती हैं. कई बार तो वो वॉशरूम जाकर दिमाग़ को शांत करती हैं.

दुनिया में तान्या पार्कर जैसे बहुत से लोग हैं, जो दफ़्तर के शोर से हलकान होते हैं. वो तनाव में आ जाते हैं.

अमरीका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी ने दफ़्तरों के शोर से परेशान 40 लोगों से बात की थी. इस सर्वे में पता चला कि दफ़्तर के शोर से इन लोगों में एपिनेफ्राइन नाम के हारमोन का लेवल बढ़ जाता था. इससे शरीर या तो उस शोर का जवाब देने की कोशिश करता था, या उन्हें वहां से हट जाने को प्रेरित करता था. कई लोगों को तो दूसरों के सेब काटकर खाने या फिर हंसने से भी दिक़्क़त होती थी.

इन लोगों का मानना था कि कई बार लोगों का फ़ोन पर बातें करना भी उनकी क्रिएटिविटी में ख़लल डालता है.

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समस्या

दुनिया भर में क़रीब एक तिहाई लोग चाहते हैं कि उन्हें दफ़्तर में काम करने के लिए शांत कोना दिया जाए. लेकिन इन कामगारों के बॉस ऐसा नहीं चाहते. इनकी कंपनियां ऐसा नहीं चाहतीं. ये बात एक सर्वे में सामने आई थी. जो लोग बॉस होते हैं. जिन्हें बैठने के लिए अलग केबिन मिलता है. उन्हें ये लगता है कि दफ़्तर में इतना शोर होता ही नहीं कि किसी के काम में खलल पड़े. और अगर किसी को दिक़्क़त होती है, तो वो इससे ख़ुद निपटे.

अमरीका के नॉर्थ कैरोलिना की रहने वाली लॉरी रटीमैन कहती हैं कि अक्सर ऑफ़िस की परेशानियों को दूर करने का काम कर्मचारी आपसी समझदारी से करते हैं. इसमें न तो एचआर डिपार्टमेंट उनकी मदद करता है, और न ही बॉस.

दफ़्तर के शोर से बचाने के लिए कुछ शोर दबाने वाले माइक्रोफ़ोन भी आते हैं. जिन्हें पहनने से आपको आस-पास की आवाज़ नहीं सुनाई देती. लेकिन आंख से तो दिखाई ही देता रहता है. इससे भी आपके काम में खलल पड़ता है.

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सहायता

जानकार कहते हैं कि दफ़्तर के शोर से ज़्यादा परेशानी होने पर आपको एक्सपर्ट की मदद लेनी चाहिए. वो आपको इससे छुटकारे के कुछ नुस्खे सुझा सकते हैं. उसकी बिनाह पर भी आप दफ़्तर में अपने लिए एक शांत कोना मांग सकते हैं. या फिर घर से काम करने का विकल्प अपनी कंपनी से मांग सकते हैं.

वैसे दफ़्तर में कई बार अपने साथियों से बात करना भी कारगर साबित हो सकता है. अगर आपको किसी की चबाकर खाने की आदत, या ज़ोर-ज़ोर से हंसने की आदत, या शोर मचाते हुए चलने की आदत से दिक़्क़त है, तो, आप उसे अपनी परेशानी बता सकते हैं. ज़्यादातर लोग साथियों के लिए अपनी आदतों में सुधार लाने की कोशिश करते हैं.

दफ़्तर के शोर से निपटने का ये नुस्खा फिलहाल सबसे कारगर है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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