वो 5 पुरानी मशीनें जो कभी काम करती थीं...

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अगर नौकरी करते आपको लंबा अरसा बीत चुका है तो यक़ीनन आपने बहुत तरह की मशीनों पर काम किया होगा. देखते ही देखते वो मशीनें पुरानी हो गई होंगी.

उनकी जगह किसी नई मशीन ने ले ली होगी, क्योंकि तकनीक बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है.

हालांकि पुरानी मशीनें किसी काम की नहीं रह गई हैं, लेकिन नई चीज़ों के वजूद के लिए इशारे इन्हीं पुरानी चीज़ों से मिलते हैं.

बहुत बार तो हम इन मशीनों से बहुत कुछ सीखते भी हैं. साथ ही इन मशीनों से पता चलता है कि उस वक़्त दफ़्तर में काम का माहौल कैसा रहा होगा और आज हम कैसे काम कर रहे हैं.

चलिए आज आपको कुछ ऐसी ही चीज़ों के बारे में बताते हैं जो अपने वक़्त में किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थीं.

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द आइसोलेटर

आज ओपन ऑफ़िस का ज़माना है. खुले में बहुत से लोग एक साथ बैठकर काम करते हैं. शोर-शराबा भी खूब रहता है. काम में ध्यान लगाने के लिए ज़्यादातर कर्मचारी हेडफ़ोन लगाकर बैठ जाते हैं.

1925 में साइंस फिक्शन लेखक ह्यूगो जर्न्सबैक ने एक ऐसे हेलमेट की कल्पना की थी, जिसे पहनकर आदमी बाहरी दुनिया के शोर और मंज़र से पूरी तरह अलग हो जाता था.

इसे उन्होंने आइसोलेटर का नाम दिया था. इसमें दो छेद बनाए गए थे, जिनकी मदद से बाहर का नज़ारा देखा जा सकता था.

इस तरह आप सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर ही ध्यान केंद्रित कर सकते थे. इसे बनाने का आइडिया भले ही वक़्त से आगे की चीज़ रहा हो लेकिन उसे अमल में नहीं लाया जा सका.

अगर आज किसी को ज़रूरत हो सबके बीच रहते हुए भी सबसे बेखबर होकर सिर्फ अपना काम करने की, तो, वो इस आइसोलेटर पर हाथ आज़मा सकता है.

ये भी कहा जा सकता है कि हेडफ़ोन की ईजाद में भी इस आइडिया का अहम रोल रहा हो.

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डिक्टाफोन

एक ज़माने में कंपनी के बड़े अधिकारी ख़तो-क़िताबत ख़ुद नहीं करते थे. जो भी मज़मून लिखवाना होता था, उसे वो एक मशीन के ज़रिए बयां कर देते थे.

फिर उनका स्टेनोग्राफर उस ख़त को टाइपराइटर की मदद से लिखता था. इस मशीन का नाम था डिक्टाफ़ोन.

इसकी शुरुआत 1881 में टेलीफ़ोन ईजाद करने वाले ग्राहम बेल की कंपनी ने की थी. 1970 तक लगभग सभी बड़े बिज़नेस एक्ज़ेक्यूटिव इसका इस्तेमाल करते थे.

लेकिन 1980 तक डिक्टाफोन की अहमियत पूरी तरह से ख़त्म हो गई. और इसकी जगह वर्ड प्रोसेसर ने ले ली.

हालांकि डिक्टाफ़ोन से वर्ड प्रोसेसर तक का सफ़र तय करने में कई साल का वक़्त लगा. जबकि आज हम महीनों के अंदर ही अपनी चीज़ें बदल देते हैं. क्योंकि चंद महीनों में ही नई तकनीक सामने आ जाती है.

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लेम्बर्ट टाइपराइटर

कंप्यूटर के बढ़ते चलन की वजह से आज टाइपराइटर का इस्तेमाल बेहद कम हो गया है. मगर एक वक़्त में ये बेहद अहम थे.

इनमें भी फ़्रांस के लेम्बर्ट का बनाया हुआ टाइपराइटर दुनिया का सबसे पहला टाइपराइटर बन सकता था, अगर उन्होंने इसे उस समय दुनिया के सामने ला दिया होता. लेकिन लेम्बर्ट ने इसके लिए लंबा इंतज़ार किया.

इसका की-बोर्ड गोल था जो एक आयताकार मशीन पर घूमता था.

तब तक अंडरवुड स्टैंडर्ड के टाइपराइटर ने मार्केट में अपनी जगह बना ली थी. और लेम्बर्ट का टाइपराइटर एकदम पुराना सा लगने लगा.

ये एक सबक़ लेने वाली कहानी है कि जब तक मार्केट की मांग को देखते हुए कोई चीज़ बाज़ार में नहीं उतारेंगे, तब तक आपको क़ामयाबी नहीं मिल सकती.

मिसाल के लिए माइक्रोसॉफ्ट मोबाइल के बाज़ार में एप्पल और दूसरी आईटी कंपनियों के बाद आया. तब तक ये कंपनियां बाज़ार पर अपनी पकड़ मज़बूत कर चुकी थीं.

हालांकि माइक्रोसोफ्ट के मोबाइल ने तारीफ़ें तो ख़ूब बटोरीं. इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ़ एक फ़ीसद तक रह गई. कंपनी को अपने मोबाइल सेक्शन से 1350 नौकरियां खत्म करनी पड़ीं.

लिहाज़ा लेम्बर्ट के बारे में कहा जा सकता है कि उनका टाइपराइटर अपनी पैदाइश के वक़्त ही बेकार हो गया था.

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माइमियोग्राफ

अगर साल 1980 से पहले तक आप स्कूल में रहे होंगे, तो यक़ीनन आपको माइमियोग्राफ मशीन ज़रूर याद होगी. हर स्कूल, कॉलेज के ऑफिस में ये मशीन ज़रूर होती थी.

इस मशीन से किसी भी पेपर की नक़ली कॉपी तैयार हो जाती थी. यही काम आज हम फोटोकॉपी मशीन से करते हैं.

माइमियोग्राफ मशीन का आविष्कार यूं तो 1880 में हुआ था लेकिन नए डिज़ाइन के साथ ये साल 1900 में सामने आई, और 1980 के दशक तक इसने अपना दबदबा बरकरार रखा.

साल 1959 में ज़ेरॉक्स कंपनी ने जब नई फोटोकॉपी मशीन तैयार की, तो माइमियोग्राफ की अहमियत कम होने लगी.

हालांकि ज़ीरॉक्स ने आते ही माइमियोग्राफ मशीन की अहमियत को कम नहीं किया था. क्योंकि ज़ीरॉक्स मशीन की अपनी कुछ कमियां थीं.

लिहाज़ा माइमियोग्राफ की अहमियत भी बनी रही. साथ ही इस मशीन में जो स्याही भरी जाती थी वो बहुत सस्ती होती थी.

आज हम जिस कैलकुलेटर का इस्तेमाल करते हैं वो एक एडवांस वर्ज़न है. इससे पहले जिस तरह के कैलकुलेटर का इस्तेमाल होता था, वो बहुत बड़ा सा था.

मुनरो कैलकुलेटिंग मशीन कंपनी ने साल 1914 में एक कैलकुलेटर बनाया था जिसमें एक ख़ास तरीके से नंबर फीड करने पर ही वो सही उत्तर देता था.

लिहाज़ा इसमें काम करने में मुश्किल होती थी. लेकिन फिर भी बहुत लंबे अर्से तक लोग इसका इस्तेमाल करते रहे.

इसकी एक वजह ये भी थी कि लोग नई तकनीक को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे. हालांकि यही काम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के ज़रिए ज़्यादा जल्दी हो जाता था.

लेकिन फिर भी वो पुरानी तकनीक से ही काम करना पसंद करते थे क्योंकि वो उस मशीन के साथ ज़्यादा सहज महसूस करते थे.

लेकिन नई तकनीक के आगे पुरानी तकनीक ज़्यादा दिन नहीं रुक पाती. लिहाज़ा इस पुराने कैलकुलेटर को भी रुख़सत होना ही पड़ा.

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