इस गांव में शतरंज की वजह से लोगों की शराब और जुए की लत छूटी

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बचपन में एक कहावत अक्सर सुनने को मिलती थी. खेलोगे-कूदोगे बनोगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब. लेकिन वक़्त ने इस कहावत को ग़लत साबित कर दिया है.

तंदुरूस्त रहने और बहुत सी बुरी आदतों से निजात पाने के लिए खेल ज़रूरी है. ये बात केरल के मारोट्टिचल गांव पर बिल्कुल सटीक बैठती है. एक दौर था जब यहां के लोग जुए और शराबखोरी जैसी लतों के शिकार थे. लेकिन आज ये पूरा गांव इन बुरी आदतों से आज़ाद है. अब इन्हें एक नई लत लग गई है. ये है शतरंज खेलने की.

आज मारोट्टिचल के हर गली-कूचे में लोगों की मंडलियां शतरंज खेलती नज़र आ जाएंगी.

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मारोट्टिचल के लोगों को इस लत का आदी बनाया है, उन्नीकृष्णन ने. जो इस गांव के लिए उम्मीद की नई रौशनी बन कर आए.

अब से पचास साल पहले उन्नीकृष्णन इसी गांव में रहते थे. बाद में वो रोज़गार के लिए पास के कल्लूर गांव चले गए. क्योंकि इस गांव में रोज़गार के मौक़े कम थे. गांव वाले बुरी आदतों का शिकार थे. लेकिन अपने पुश्तैनी गांव से बेपनाह लगाव के चलते वो वापस इस गांव में आए.

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उन्नीकृष्णन अपने गांव अकेले नहीं लौटे थे, बल्कि अपने साथ एक मज़बूत इरादा लेकर आए थे. इरादा था गांव को बुरी आदतों से आज़ाद कराने का. इसके लिए उन्होंने तरीक़ा भी बहुत नायाब खोज निकाला था. उन्होंने लोगों को शतरंज खेलना सिखा दिया.

गांव में आकर उन्नीकृष्णन ने चाय की दुकान खोली. अपनी दुकान में आने वाले ग्राहकों को वक़्त गुज़ारने के लिए उन्होंने शतरंज खेलना सिखा दिया.

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दरअसल शतरंज कोई मामूली खेल नहीं है. ये भारत का सबसे पुराना खेल है. कहते हैं कि छठी शताब्दी में भारत में ही शतरंज का खेल शुरू हुआ था.

ये रणनीति का खेल है. इसमें बहुत होशियारी से चालें चलनी पड़ती है. अपने दिमाग़ का भरपूर इस्तेमाल करना पड़ता है. अब तक जो लोग शराब के नशे में चूर होकर एक तरफ़ पड़े रहते थे वो अब अपने दिमाग़ का बेहतर इस्तेमाल करने लगे थे.

इस खेल की वजह से लोग ना सिर्फ़ उन्नीकृष्णन की दुकान पर ग्राहकों की तादाद बढ़ने लगी, बल्कि इस खेल की चर्चा पूरे गांव में होने लगी. जगह-जगह पर लोग शतरंज खेलने लगे.

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असर ये हुआ कि गांव से जुआख़ोरी ख़त्म हो गई. शराब की दुकानों की जगह चायख़ाने आबाद होने लगे.

हालत ये है कि आज यहां बाक़ायदा चेस एसोसिएशन बना दी गई है. इस एसोसिएशन के अध्यक्ष बेबी जॉन का कहना है कि भारत के किसी भी गांव के मुक़ाबले उनके गांव में सबसे ज़्यादा शतरंज के खिलाड़ी हैं.

इस गांव की आबादी क़रीब 60 हज़ार है. बेबी जॉन का दावा है कि आज 60 हज़ार में से क़रीब 40 हज़ार लोग शतरंज खेलना जानते हैं. यानी हर घर में शतरंज का खिलाड़ी मौजूद है. इस का पूरा श्रेय जाता है उन्नीकृष्णन को.

बेबी जॉन कहते हैं कि इस खेल ने लोगों में एकाग्रता को बढ़ाया है. लोगों को एक दूसरे के नज़दीक लाने में एक अहम रोल निभाया है. लोग ग्रुप में एक दूसरे के साथ खेलते हैं. बातें करते हैं. वो एक-दूसरे की सोच को समझने की कोशिश करते हैं.

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इस गांव में ये खेल जितना बड़ों को पसंद है, उतना ही बच्चे इसे खेलते हैं. स्कूलों में बाक़ायदा इस खेल के मुक़ाबले होते हैं. ब्रेक टाइम में भी बच्चे शतरंज खेलते मिल जाते हैं. बेबी जॉन कहते हैं कि पिछले साल उन्हों ने स्कूल में 15 चेस बोर्ड दिए थे. लेकिन एक साल बाद आज यहां हर बच्चे के पास अपना चेस बोर्ड है. यहां तक कि चेस को स्कूल सिलेबस का हिस्सा बनाने की बात भी कही जा रही है.

बेबी जॉन का कहना है कि गांव वाले टीवी देखकर अपना वक़्त बर्बाद नहीं करते हैं. बल्कि वो कोशिश करते हैं कि जैसे ही उन्हें खाली वक़्त मिले तो इसका इस्तेमाल वो शतरंज खेलने में करें. यहां तक कि बच्चे भी बड़ों के साथ खेल में शामिल हो जाते हैं.

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आप सोच रहे होंगे कि डिज़िटाइज़ेशन के दौर में मारोट्टिचल गांव सिर्फ़ शतरंज खेल रहा है. कहीं ये गांव दुनिया की दौड़ में पिछड़ तो नहीं जाएगा. ऐसा बिल्कुल नहीं है. यहां के लोग मॉडर्न गैजेट्स का भरपूर इस्तेमाल करते हैं. यहां तक कि स्मार्ट फ़ोन पर भी वो शतरंज खेलते हैं.

शतरंज के प्रति इनकी दीवानगी ने इनके गांव को एक अलग पहचान दिला दी है. दूर-दूर से लोग यहां शतरंज के खिलाड़ियों से मिलने आते हैं. यहां तक कि अमरीका और जर्मनी जैसे देशों के लोग यहां शतरंज में महारत हासिल करने आते हैं. ख़ुद इस गांव के लोग अब यहां से कहीं और जाना नहीं चाहते.

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