हॉलीवुड फिल्म जिसने ऑस्कर में रचा था इतिहास

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कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं, जो कल्ट बन जाती हैं. जिनकी कामयाबी के फॉर्मूले को बार-बार दोहराने की कोशिश होती है.

इनके किरदारों की नक़ल करके कामयाबी दोहराने की कोशिश होती है. ऐसी फ़िल्में हर दौर में बनी हैं, जिनके किरदार लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो जाते हैं.

वो याद रह जाते हैं. इनकी बुनियाद पर फ़िल्मों में ऐसे ही और किरदार गढ़े जाते हैं, ताकि ओरिजिनल फ़िल्म के किरदार की लोकप्रियता को दोहराया जा सके.

बीबीसी कल्चर के निकोलस बार्बर बताते हैं कि हम अक्सर फ़िल्मी किरदारों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से भी जोड़ कर देखने लगते हैं. कई बार फ़िल्म के विलेन, हीरो के किरदार पर भारी पड़ते हैं.

वो हमारे दिलो-दिमाग़ पर छा जाते हैं. बॉलीवुड की फ़िल्मों के बहुत से विलेन बरसों से हमारे दिलों पर राज कर रहे हैं.

जैसे शोले का गब्बर, या मिस्टर इंडिया का मोगैंबो या फिर मदर इंडिया का लाला. इन सभी यादगार फ़िल्मों में विलेन ने बड़े मज़बूत रोल निभाए थे.

द साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब्स

हॉलीवुड में भी बहुत सी फ़िल्में बनी हैं, जो बरसों से लोगों के ज़हन में बसी हैं. ऐसी ही फ़िल्मों में से एक है 'द साइलेंस ऑफ़ द लैम्ब्स'.

25 साल पहले बनी ये फ़िल्म ऑस्कर अवॉर्ड के इतिहास में ऐसी तीसरी फ़िल्म है, जिसे पांच कैटेगरी में ऑस्कर मिला था.

ये एक ऐसी थ्रिलर फ़िल्म है, जिसमें हीरो और विलेन दोनों के किरदार दमदार हैं.

बल्कि आज बात करें तो फ़िल्म का विलेन डॉक्टर लेक्टर हैनिबल हमारी यादों में ज़्यादा बसा हुआ नज़र आता है.

इस रोल को ब्रिटिश अभिनेता सर एंथनी हॉपकिंस ने निभाया था. उनकी डायलॉग डिलिवरी को याद करके आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं.

पच्चीस साल पुरानी द साइलेंस ऑफ लैम्ब्स को आज भी एंथनी हॉपकिंस के किरदार डॉक्टर लेक्टर हैनिबल की वजह से याद किया जाता है.

जिस अंदाज़ में हॉपकिंस, फ़िल्म की हीरोइन क्लैरीस को आवाज़ देते थे, उसे याद करके आज भी सिहरन पैदा होती है.

लेक्टर की सनक, उसकी वासना भरी आंखें आज भी लोगों को डराती हैं. फ़िल्म का डार्क कैरेक्टर होने के बावजूद इस फ़िल्म ने एंथनी हॉपकिंस को नई पहचान दी.

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Image caption साइलेंस ऑफ द लैंब्स को ब्रिटिश अभिनेता सर एंथनी हॉपकिंस की वजह से याद किया जाता है

ये फ़िल्म थॉमस हैरिस के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी. यूं तो इस उपन्यास पर 1986 में ब्रायन कॉक्स ने मैनहंटर नाम से फ़िल्म बनाई थी.

लेकिन 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' की कहानी को जिस तरह से निर्देशक जोनाथन डेम और लेखक टेड टैली ने बुनकर पर्दे पर पेश किया, उसकी मिसाल कम ही मिलती है.

इंसान के भेस में दरिंदा

आज 25 बरस बाद भी लेक्टर हैनिबल लोगों को इंसान के भेस में दरिंदे की तरह याद आता है. हैनिबल एक ऐसा मनोचिकित्सक है जो बहुत खूंखार है.

बरसों से क़ैद में रहने की वजह से उसकी सेक्स की भूख हीरोइन क्लेरीस को देखकर जाग उठती है. ये वासना उसकी आंखों से टपकती नज़र आती है.

वो हवा को सूंघ कर हर साज़िश, हर किरदार का पता लगा लेता है. पर्दे पर जब वो आता है तो उसे देखकर ही ख़ौफ़ आ जाता है. वो आदमखोर है.

इसीलिए उसे क़ैद में रखा जाता है. डॉक्टर लेक्टर के किरदार को जिस तरह से लिखा और निभाया गया, उसे बयान करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं.

फ़िल्म देखकर कर लगता है जैसे ये फ़िल्म इस किरदार के लिए ही बनाई गई है.

मगर इस फ़िल्म के देखने वालों पर लेक्टर का किरदार इस कदर हावी हो जाता है कि हम हीरोइन क्लेरीस स्टर्लिंग के ख़ूबसूरत रोल की अनदेखी कर बैठते हैं.

जबकि क्लेरीस का रोल, ही इस फ़िल्म की असल पहचान होनी चाहिए थी. 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' में क्लेरीस का रोल अभिनेत्री जोडी फोस्टर ने निभाया था.

सीरियल किलर को पकड़ना

वो एक नई एफबीआई ऑफिसर हैं, जिन्हें एक सीरियल किलर को पकड़ने की ज़िम्मेदारी दी जाती है.

वो अपने काम मे बहुत माहिर, होशियार और मेहनती है. कामयाबी के लिए वो किसी तरह का कोई समझौता नहीं करती. वो हर काम नियम के हिसाब से करती है.

हमने हॉलीवुड और बॉलीवुड में पुलिस के अफसरों या खुफिया एजेंटों पर बनी बहुत सी फ़िल्में देखी हैं.

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Image caption लेक्टर के किरदार ने कई खलनायकों पर असर डाला

इनके मुख्य अभिनेता अक्सर या तो नियम तोड़ने लगते हैं, या फिर बाग़ी हो जाते हैं. जेम्स बॉन्ड या जेसन बॉर्न के हॉलीवुड के रोल हमारे सामने हैं.

मगर 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' में क्लेरीस ऐसा कुछ नहीं करतीं. वो एफ़.बी.आई जैसी संस्था की शोहरत और नाम को पूरी तरह से बनाए रखती है.

औरतों को कमज़ोर मानने वालों को सबक

वो कभी भी कोई काम क़ानून के ख़िलाफ़ नहीं करती. हालात साथ नहीं देते, तब भी क्लेरीस बग़ावत नहीं करती. सब्र और ख़ुद पर क़ाबू रखना, उसका सबसे बड़ा हथियार है.

इनके ज़रिए वो अपराधियों से भी निपटती है. और मर्दवादी समाज में औरतों को कमज़ोर समझने वालों को भी सबक़ सिखाती है.

क्लेरीस को इतना मज़बूत किरदार बनाने का श्रेय फ़िल्म के निर्देशकर जोनाथॉन डैम और फ़िल्म का स्क्रीनप्ले लिखने वाले टेड टेली को जाता है.

उन दोनों ने ही क्लैरीस के रोल के ज़रिए दिखाने की कोशिश की है, कि, कामकाजी महिलाओं को कामयाबी की राह में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

फ़िल्म के बहुत से सीन सिर्फ़ क्लेरीस के रोल की ज़हनी मज़बूती दिखाने के लिए फ़िल्म में रखे गए हैं.

मसलन जब वो जॉगिंग के लिए निकलती है तो उसे लोग अजीब नज़रों से देखते हैं. कुछ लोग घूरते भी हैं.

इसी तरह, जब उसका सामना लेक्टर से होता है तो भी वो मज़बूत किरदार की तस्वीर पेश करती है.

निर्देशक जोनाथन डैम ने बहुत ख़ूबी से क्लेरीस के रोल की मज़बूती को पेश किया है.

पच्चीस साल पहले जिस तरह के समाज की तस्वीर 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' में पेश की गई है.

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Image caption क्लेरीस का रोल, ही इस फ़िल्म की असल पहचान होनी चाहिए थी

कमोबेश वैसा ही समाज आज भी है. महिलाओं को ऐसी ही नज़रों का सामना करना पड़ता है. तरक़्क़ी के लिए कई बार उन्हें बॉस के साथ हमबिस्तर भी होना पड़ता है.

मगर क्लेरीस सिर्फ़ अपनी मेहनत और मज़बूत इरादों से आगे बढ़ती है. ये ऐसा रोल है, जो युवाओं के लिए मिसाल के तौर पर याद रखा जाना चाहिए था.

क्लेरीस अपने इर्द-गिर्द ऐसे लोगों से घिरी है, जो उसके प्रति अच्छी सोच नहीं रखते. उसे कामुक निगाहों से देखते हैं. लेकिन वो अपने काम से पहचान बनाना चाहती है.

फ़िल्म के निर्देशक और लेखक ने इस बात का ख़याल भी रखा कि समाज में हमेशा लेक्टर जैसे लोग ही नहीं होते. इसीलिए क्लेरीस के बॉस के तौर पर जैक क्रॉफर्ड नाम के रोल को भी फ़िल्म में रखा गया.

वो बॉस जो क्लेरीस को क़ाबिल अफ़सर के तौर पर ही देखता है और तमाम ऐतराज़ दरकिनार करके उसे आगे बढ़ने और ख़ुद को साबित करने के मौक़े देता है.

डॉक्टर लेक्टर का ख़ूंख़ार किरदार लोगों को आज भी याद है. लेकिन इसके साथ साथ ये भी याद रखा जाना ज़रूरी था कि किस तरह क्लेरीस स्टर्लिंग एक केस के सिलसिले में इस आदमखोर मनोचिकित्सक की मदद लेती है.

डॉक्टर हैनिबल लेक्टर ऐसा किरदार है जिसके पास जाने में मर्दों की जान भी सूखती है. लेकिन क्लेरीस अपना काम पूरा करने के लिए डॉक्टर लेक्टर के पास जाने से नहीं डरती.

वो इस चुनौती को क़ुबूल करती है. उसके किरदार का ये पहलू सराहनीय है. अफ़सोस कि हमें सिर्फ़ डॉक्टर हैनिबल जैसा ख़ूंख़ार विलेन ही याद है.

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शायद वो इसलिए कि इंसान की फ़ितरत है कि वो नेगेटिव चीज़ें ज़्यादा लंबे समय तक याद रखता है. इसीलि फ़िल्मों में भी विलेन का किरदार ज़्यादा वक़्त तक याद रह जाता है.

डॉक्टर लेक्टर के रूप में हॉपकिंस को भरपूर तारीफ़ मिली. उन्हें ऑस्कर अवार्ड भी मिला. जोडी फ़ोस्टर को भी उनके काम के लिए ऑस्कर से नवाज़ा गया. लेकिन एक बहुत बड़ा फ़र्क़ रह गया.

फ़र्क़ ये कि हम आज भी फ़िल्म 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' को विलेन के लिए याद रखते हैं, क्लेरीस जैसे मज़बूत किरदार वाली लड़की के लिए नहीं.

'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' के बाद लेक्टर हैनिबल जैसे रोल वाली कई फ़िल्में और टीवी सीरियल बने. ख़ुद 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' का प्रीक्वेल और सीक्वेल बना.

मगर हर फ़िल्म में लेक्टर के रोल पर ही ज़ोर रहा. फ़िल्म के सीक्वेल में क्लेरीस की वैसी ही तस्वीर पेश करने की कोशिश की गई, जैसी आम तौर पर कामयाब हीरोइन के साथ होता है.

ये रोल जोडी फ़ोस्टर के बजाय जूलियन मूर ने निभाया था. जिसमें वो ग्लैमर गर्ल बनकर रह गई थीं. जिस क्लेरीस ने फ़िल्म में कहीं कोई समझौता नहीं किया, उसे सेक्स सिम्बल के तौर पर पेश किया गया.

ये हमारे पुरुषवादी समाज की उस सोच को भी दर्शाता जहां औरतों के ईमानदारी से काम करने और असूलों के साथ चलने को सराहा नहीं जाता.

फ़िल्म में क्लेरीस के किरदार ने जिस तरह से मेहनत की है, होशियारी और अक़्लमंदी दिखाई है, उसे हम उस वक़्त समझ ही नहीं पाए.

आज पच्चीस साल बाद 'द साइलेंस ऑफ द लैंब्स' को याद करते हुए हम अपनी ये ग़लती सुधार लें तो शायद बेहतर होगा.

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