ज्वालामुखी की ताकत के सामने बेबस इंसान

  • 14 अप्रैल 2017
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'ज्वालामुखी के बारे में हमें हर बार कुछ न कुछ नया जानने को मिलता है'. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थ साइंस के प्रोफ़ेसर डेविड पाइल जब ये बात कहते हैं, तो सौ फ़ीसदी खरी कहते हैं.

प्रोफ़ेसर पाइल बताते हैं कि पिछले दो सौ सालों में क़रीब छह सौ ज्वालामुखी फटने का रिकॉर्ड है. अगले कुछ दशकों में क़रीब 1500ज्वालामुखी में विस्फोट होने का ख़तरा है.

इंसान ने भले ही बेहिसाब तरक़्क़ी कर ली है, मगर ज्वालामुखी आगे क्या कहर बरपाएंगे, इसका हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.

साइंस की लंबी छलांग भी ज्वालामुखियों को तबाही मचाने से नहीं रोक सकी है. पिछली सदी की शुरुआत से कम से कम दो बार ऐसा हुआ है कि ज्वालामुखियों ने भारी तबाही मचाई है.

8 मई 1902 को कैरेबियाई द्वीप मार्टिनिक मे माउंट पेली ज्वालामुखी में विस्फोट से सेंट-पियर नाम का शहर तबाह हो गया था. 28 हज़ार लोग मारे गए थे.

इसी तरह 1985 में कोलंबिया में नेवाडो डेल रुइज़ नाम के ज्वालामुखी में विस्फोट से ग्लेशियर पिघलने लगे थे. इनसे निकले कीचड़ ने आर्मेरो नाम के कस्बे को लील लिया था. इस ज्वालामुखी विस्फोट में 20 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

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ज्वालामुखियों के बारे में जानना हो तो ऑक्सफोर्ड की बॉडलियां लाइब्रेरी आएं. यहां 'वॉल्कैनोज़' नाम से एक नुमाइश लगी है. जिसमें ज्वालामुखियों की तस्वीरें हैं, क़िस्से हैं. और भी बहुत सी चीज़ें आप इस प्रदर्शनी में देख सकते हैं.

सदियों से ज्वालामुखी इंसान को लुभाते, अपनी ओर खींचते आए हैं. इनमें विस्फोट से मचने वाली तबाही भी लोगों को इतना नहीं डराती कि वो ज्वालामुखी से दूर रहें. इंसानी सभ्यता का हालिया इतिहास ऐसी तबाहियों की कई मिसालें देता है.

इटली में 79 ईस्वी में माउंट विसूवियस में विस्फोट हो या ताम्बोरा में 1815 में हुआ विस्फोट या फिर 1883 में क्राकातोआ ज्वालामुखी में विस्फोट. पिछले एक हज़ार सालों से ज्वालामुखियों के क़िस्से हम कलाकारों और लेखकों के ज़रिए सुनते आए हैं. वैज्ञानिक इनके बारे में पढ़ने को, इन्हें समझने को मजबूर हुए हैं.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में लगी नुमाइश में ज्वालामुखियों के बारे में लिखी बातों और तस्वीरों, स्केच वगैरह का बेहद दिलचस्प ज़खीरा जमा किया गया है. यहां पेंटिंग्स भी हैं और कलाकृतियां भी. इस प्रदर्शनी में ज्वालामुखी का सबसे पुराना स्केच भी है. ये स्केच जर्मन भाषा की एक पांडुलिपि में बना है. जिसका नाम है, 'द वोएज ऑफ सेंट ब्रेंडेन'. इसमें आयरलैंड के एक पादरी के अटलांटिक महासागर के सफर की कहानी है. इस सफर में वो एक पहाड़ देखता है, जिससे आग की लपटें उठ रही होती हैं. उस पादरी को यूं लगता है कि ये एक जलती हुई चिता है.

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इस नुमाइश में 1606 में फिनलैंड के नक़्शकार अब्राहम ओर्टेलियस का बनाया नक़्शा भी है. इस नक़्शे में आइसलैंड द्वीप के ज्वालामुखी की तस्वीर उकेरी गई है. आज के माउंट हेक्ला और इयाजाफ्लालजोकुल ज्वालामुखियों के स्केच भी इस नक़्शे में उकेरे गए हैं. अभी हाल ही में यानी 2010 में इयाजाफ्लालजोकुल ज्वालामुखी में विस्फोट से इतना धुआं और राख निकली थी कि कई दिनों तक यूरोपीय देशों में उड़ानों पर असर पड़ा था. कई देशों में इसकी वजह से अंधेरा छाया रहता था.

प्रदर्शनी में रोमन काल का एक दस्तावेज भी है. जिसमे 79 इस्वी में माउंट विसूवियस में हुए विस्फोट का ज़िक्र है. यहां पर प्लिनी द यंगर का 15वीं सदी में लिखे ख़तों का ज़ख़ीरा भी है. जिसमें प्लिनी ने माउंट विसूवियस में हुए विस्फोट का आंखों देखा हाल बयान किया है. प्लिनी का हलफिया बयान इतना सच्चा है कि आज भी उस जैसे ज्वालामुखी विस्फोट को 'प्लिनियन' कहा जाता है.

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लेखक और इतिहासकार जेम्स हैमिल्टन कहते हैं कि इटली के माउंट विसूवियस में हुए विस्फोट का पश्चिम सभ्यता पर गहरा असर नज़र आता है. 18वीं सदी में रोमन शहरों पॉम्पियाई और हरक्यूलेनियम के खंडहरों के मिलने से विसूवियस के क़िस्सों में लोगों की और दिलचस्पी हो गई. ये दोनों ही शहर माउंट विसूवियस के लावा में दफ़न हो गए थे.

जब इन शहरों के खंडहर खोजे गए तो ये इलाक़े रातों-रात पसंदीदा पर्यटन स्थल बन गए. बहुत से रईस इन इलाक़ों को देखने आते थे. नेपल्स से लौटकर वो यहां की यादों को लोगों के सामने बड़े गर्व से बयां करते थे.

पुराने दौर में ज्वालामुखी की तुलना नर्क से की जाती थी. वर्जिल की एनेईड की बुक सिक्स में क़िस्सा है कि एनियास एक गुफा के ज़रिए अंडरवर्ल्ड की दुनिया में जाता है. ये गुफा एवर्नस झील के पास है. ये झील इटली के नेपल्स शहर के क़रीब स्थित फ्लेग्रियन या फ्लेमिंग फील्ड्स नाम के इलाक़े में है. माना जाता है कि यहां समुद्र के भीतर कई ज्वालामुखी ऐसे हैं जिनमें कभी भी विस्फोट हो सकता है. आइसलैंड के ज्वालामुखी पर्वत हेक्ला के बारे में भी ऐसी ही कहानियां चर्चित है.

डेविड पाइल बताते हैं कि 18वीं सदी तक ज्वालामुखियों को वैज्ञानिक नज़रिए से समझने की कोशिश शुरू हो गई थी. मिसाल के तौर पर नेपल्स मे ब्रिटेन के राजदूत विलियम हैमिल्टन ने माउंट विसूवियस के क़रीब एक विला किराए पर लिया था. वो वहां रहकर माउंट विसूवियस पर निगाह रखते थे. उन्होंने अपने तजुर्बे के आधार पर लंदन की रॉयल सोसाइटी को कई ख़त लिखे थे. ये ख़त 1776 से 1779 के बीच 'फील्ड्स ऑफ फायर' के नाम से छपे थे. इन ख़तों के साथ अंग्रेज़ कलाकार पिएट्रो फैब्रिस के बनाए स्केच भी छपे थे.

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माउंट विसूवियस में विस्फोट होने का मंज़र देखने के लिए बहुत से लोग वहां जाते थे. ब्रिटिश कलाकार जोसेफ़ राइट, विलियम हैमिल्टन के साथ रहने के लिए इटली गए थे. जोसेफ ने इसे क़ुदरत का सबसे दिलकश नज़ारा बताया था. हालांकि वो विसूवियस में विस्फोट का मंज़र नहीं देख सके.

इसी तरह ब्रिटिश पेंटर जेएमडब्ल्यू भी 1819 में नेपल्स गए थे. वहां से लौटकर उन्होंने 'द इरप्शन ऑफ़ द सौफ्रायर माउंटेंस' के नाम से पेंटिंग्स भी बनाई थीं. टर्नर ने ये पेंटिंग्स अपने ख़ुद के तजुर्बे से नहीं बल्कि एक किसान से सुनी बातों के आधार पर बनाई थी. वो ख़ुद कोई ज्वालामुखी विस्फोट नहीं देख सके थे.

बहुत से और कलाकारों ने भी ज्वालामुखी में दिलचस्पी दिखाई थी. जैसे जापान के कलाकारों होकुसाई और हिरशिगे ने माउंट फुजी के लकड़ी के प्रिंट बनाए थे. इसी तरह जॉन रस्किन ने इटली के माउंट एटना की पेंटिंग बनाई थी. 1985 में एंडी वारहोल ने माउट विसूवियस में विस्फोट की कई पेंटिंग्स बनाई थीं.

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कार्टूनिस्टों ने भी ज्वालामुखियों को बुनियाद बनाकर व्यंगचित्र बनाए हैं. 1815 में जॉर्ज क्रिकशैंक ने वाटरलू की लड़ाई से पहले माउंट विसूवियस पर आधारित कार्टून बनाया था. इसमें नेपल्स के राजा और उसकी पत्नी को ज्वालामुखी विस्फोट के बाद बाहर निकलते दिखाया गया था. 2010 में आइसलैंड मे इयाजाफ्लालजोकुल ज्वालामुखी में विस्फोट पर आधारित एक कार्टून जेराल्ड स्कार्फे ने भी बनाया था.

बहुत से लेखकों ने भी ज्वालामुखी विस्फोट के बारे में ख़ूब लिखा है. 1883 में क्राकातोआ ज्वालामुखी में हुए विस्फोट की पूरी दुनिया में ख़ूब चर्चा हुई थी. तब अमरीका और यूरोप के बीच टेलीग्राफ लाइन बिछ गई थी. विस्फोट की ख़बर कुछ घंटों के भीतर यूरोप पहुंच गई थी. इस पर उपन्यास भी लिखा गया था.

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Image caption ज्वालामुखी पर बनी फ़िल्म 'स्ट्रॉमबोली'

ज्वालामुखियों पर फिल्में भी बनी हैं. ऑक्सफोर्ड में लगी नुमाइश में दो फ़िल्मों के पोस्टर भी हैं. इनमें से एक है 1950 की फ़िल्म 'वॉल्केनो' और दूसरी है रॉबर्ट रोज़लेनी की फ़िल्म 'स्ट्रॉमबोली'.

ज्वालामुखियों के नाम के तमाम सामान भी बाज़ार में उतारे गए. सवाल ये है कि ज्वालामुखियों का इंसान की ज़िंदगी पर इतना गहरा असर कैसे रहा है?

डेवि़ड पाइल कहते हैं कि तबाही में इंसान की दिलचस्पी हमेशा से रही है. ज्वालामुखी, तबाही की जीती-जागती मिसालें हैं. ये डर पैदा करते हैं. कई बार इंसान को डर में भी लुत्फ़ आता है. वो क़ुदरत की बेहिसाब ताक़त का भी प्रतीक हैं. जिनके आगे इंसान नतमस्तक होता है.

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