सेक्स को हमेशा पर्दे के पीछे ही क्यों रखा गया?

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सेक्स, यानी यौन संबंध इंसान की ज़रूरत और कमज़ोरी दोनों है. इसके बिना ना तो इंसानी नस्ल में इज़ाफ़ा हो सकता है और ना ही इंसान की जिस्मानी और जज़्बाती ज़रूरत पूरी हो सकती है. इसके बावजूद सेक्स हर दौर में हौव्वा रहा है.

इसे निजी काम समझ कर पर्दे के पीछे छिपाकर रखा गया. ऐसा भी नहीं है कि जिस्मानी तौर पर एक दूसरे के क़रीब आने की ख़्वाहिश सिर्फ मर्द और औरत के दरमियान ही होती है. ये समान लिंग वालों के दरमियान भी हो सकती है.

लेकिन इस तरह की ख्वाहिशों का अक्सर विरोध होता रहा है. भारत में आज भी समलैंगिकता को पूरी तरह से मान्यता नहीं हासिल है. समलैंगिक संबंध को गुनाह मानकर सज़ा देने की बात कही जाती है.

आज इंग्लैंड में समलैंगिक संबंध को कानूनी दर्जा हासिल है. मगर अभी पिछली सदी के सत्तर के दशक तक इसे अपराध माना जाता था. महारानी विक्टोरिया के दौर में तो इसे इतना बड़ा गुनाह माना जाता था कि ऐसा करने वालों को मौत की सज़ा दी जाती थी.

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एक वक़्त था जब इंगलैंड और वेल्स में सोडोमी या दो मर्दों के बीच जिस्मानी संबंध, जिसे हिंदी में लौंडेबाज़ी कहा जाता है, का चलन था. लेकिन समाज में इसे गुनाह माना जाता था. ऐसा करने वालों को सज़ा-ए-मौत दी जाती थी. लेकिन 1861 में ये सज़ा ख़त्म कर दी गई. और 1967 में मर्ज़ी से समलैंगिक रिश्ते बनाने को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया.

लेकिन इस एक सदी में यौन संबंधों की ख़्वाहिशों को कैनवास पर ख़ूब उतारा गया. हाल ही में लंदन की मशहूर आर्ट गैलरी टेट ब्रिटेन में समलैंगिक रिश्तों को दर्शाने वाली नुमाइश लगाई गई. इसे क्वीर ब्रिटिश आर्ट नाम दिया गया है.

इस नुमाइश में समलैंगिक रिश्तों को दिखाने वाली कलाकृतियों की नुमाइश की गई है. प्रदर्शन में पिछली एक सदी के काम को दिखाया गया है.

इस प्रदर्शनी में उस ज़माने के मश्हूर कलाकार साइमियॉन सोलोमन की कई कलाकृतियों को लगाया गया है. सोलोमन के बनाए स्केच में उन्नीसवीं सदी के समलैंगिक रिश्तों और भावनाओं को बख़ूबी पेश किया गया है. यानी दबे तौर पर ही सही, उस दौर में भी तमाम लोग समलैंगिक रिश्तों की ख़्वाहिश रखते और बयां करते थे. भले ही वो ये काम छुप-छुपाकर करते रहे हों.

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नुमाइश में लगी सोलोमन की 1865 में बनाई गई एक पेंटिंग है. इसका नाम है 'विटनेस दा ब्राइड, दा ब्राइड ग्रूम ऐंड सैड लव'. इस पेंटिंग में एक ऐसे इंसान के रिश्ते को दिखाया गया है, जो समलैंगिकता का ख़्वाहिशमंद है. लेकिन उसे समाज में मान्यता प्राप्त शादी जैसे बंधन में बांध दिया जाता है. इस तस्वीर में आप देख सकते हैं कि दूल्हा अपनी दुल्हन की तरफ़ मुंह किए हुए है.

यानी वो एक नई ज़िंदगी की शुरूआत के लिए तैयार है. वहीं आप देखेंगे कि उसका एक हाथ पीछे की ओर है जहां एक लड़का पंख लगाए उदास खड़ा है. ये वो लड़का है जो इस दूल्हे का पहला प्यार है जिसके साथ वो ज़िंदगी गुज़ारना चाहता है. चूंकि ये रिश्ता समाज में मंज़ूर नहीं हो सकता, इसलिए उसे ना चाहते हुए भी अपने समलैंगिक साथी को छोड़ना पड़ रहा है.

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उस लड़के के पीछे जो पंख लगे हैं वो इस बात का प्रतीक हैं कि अगर उन्हें मौक़ा मिल जाए तो अपने रिश्ते को एक नई उड़ान दे सकते हैं. इस तस्वीर में नाकाम प्यार और हवस दोनों को एक साथ देखा जा सकता है.

ये तस्वीर उस दौर में भी आम लोगों के लिए नहीं थी. बल्कि किसी के निजी कला संग्रह का हिस्सा थी. इसे आज के दौर के लिए भी मुखर ही माना जाएगा. सोलोमन बहुत फैशनवाले और मुख्यधारा से जुड़े हुए कलाकार थे. इनके काम को विक्टोरियन आर्ट के साथ रॉयल एकेडमी में भी जगह मिली.

सोलोमन ने आम लोगों के लिए जो आर्ट बनाया वो ख़ास लोगों के लिए बनाए गए आर्ट से अलग था. हलांकि उसमें भी समलैंगिकता के इशारे दिए गए हैं लेकिन वो इतने मुखर नहीं हैं. उन इशारों को गहरी समझ वाले ही समझ सकते हैं. सिमोन ने औरतों में भी पैदा होने वाली समलैंगिक ख़्वाहिशों को अपनी पेंटिंग में जगह दी है. लेकिन उन्हें अश्लीलता के दायरे से बाहर रखा है.

सोलोमन का शुमार अपने दौर के नामी कलाकारों में होता था. हर बड़ी आर्ट गैलरी में उनके काम की प्रदर्शनी होती थी. वो अपनी तस्वीरों में जिस तरह के हाव-भाव उभारते थे उन्हें सीधे तौर पर यौन संबंधों से जोड़कर देख पाना ज़रा मुश्किल होता था.

इसीलिए खुलकर कभी उनका विरोध नहीं हो पाता था. बल्कि लोग उन भावों को उस दौर की चिंताओं से जोड़कर भी देखते थे. अगर किसी को कोई आर्ट काबिले-ऐतराज़ लगता भी था तो वो सिर्फ़ चेहरे से अपनी नाख़ुशी ज़ाहिर कर देता था.

शायरी दिल और दिमाग के बंद दरवाज़े खोल देगी

अपनी कला के ज़रिए सारी दुनिया को समलैंगिकता, प्रकृति और जिस्मानी ख़ूबसूरती की बारीकियां बताने वाले सोलोमन के बारे में कहा जाता है कि वो ख़ुद भी समलैंगिक थे. 1873 में उन्हें एक सार्वजनिक शौचालय में किसी मर्द के साथ पकड़ा गया था. इसके लिए उन्हें 100 पाउंड का जुर्माना भरना पड़ा था.

इस घटना के ठीक एक साल बाद उन्हें फिर से पेरिस के एक शौचालय में अभद्र तरीके से छूने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया और उन्हें तीन साल की जेल हो गई. सोलोमिन का करियर पूरी तरह से तबाह हो गया था. कहा तो ये भी जाता है कि उन्हें कुछ वक़्त के लिए पागलख़ाने में भी रखा गया था. और बाक़ी की ज़िंदगी उन्होंने शराब के सहारे ही गुज़ार दी.

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ज़िंदगी के आख़री दौर में उनके पास एक फूटी कौड़ी नहीं थी. लेकिन इस सबके बावजूद सोलोमिन ने आर्ट बनाने का काम जारी रखा. उनके मरने के बाद फ़्रेडरिक होलियर ने सोलोमन के काम की तस्वीरें ऑस्कर वाइल्ड और वॉल्टर पीटर जैसे बड़े लेखकों को बेचीं.

क्वीर ब्रिटिश आर्ट एक ऐसी नुमाइश का मंच है, जहां कलाकार के काम को उसकी निजी ज़िंदगी के ज़रिए समझने का मौक़ा दिया जाता है. उस कला के नए नए आयाम लोगों तक लाने की कोशिश की जाती है.

इन कलाओं में छुपे वो राज़ सामने लाने की कोशिश की जाती है जो इससे पहले कभी किसी ने जाने ही नहीं थे. कलाकारों की आत्मकथाएं उनके काम के ज़रिए सुनाना एक दिलचस्प तजुर्बा होता है. कभी कभी इस काम के ज़रिए ऐसी चीज़ें सामने आती हैं जो नई रौशनी की तरह होती हैं. कई बार इनकी वजह से मुश्किल भी खड़ी हो जाती है. लेकिन कुल मिलाकर कला और कलाकार को जानने समझने का ये बहुत अच्छा मंच है.

आंखें बोलती तो हैं, मगर क्या?

टेट में लगी प्रदर्शनी में सिर्फ़ सोलोमन ही नहीं डेविड होकने और फ्रैंसिस बेकन, ऑस्कर वाइल्ड और ब्लूमसबरी ग्रुप के काम को भी रखा गया है. इन सबके ज़रिए अलग-अलग दौर में समाज में समलैंगिकता को लेकर जो रुख़ रहा, वो बताने की कोशिश की गई है.

इन सब में सोलोमन का काम एकदम अलग है. ये दिखाता है कि सोलोमन किस तरह से अपने समलैंगिक होने की वजह से समाज से अलग-थलग कर दिए गए. उनकी ज़िंदगी एकाकीपन में गुज़री. सोलोमन की पेंटिंग्स देखने वाला उनकी तकलीफ़ों का साझीदार बन जाता है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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