लोग औरतों को देखते हैं 'ख़ास चश्मे से,' और आप?

  • 26 अप्रैल 2017
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दुनिया भर में औरतों को हमेशा से एक ख़ास चश्मे से देखा जाता रहा है. वो ख़ूबसूरत होनी चाहिए. उनकी कमर में लोच होना चाहिए.

उनका फिगर दिलकश होना चाहिए. गर्दन सुराहीदार होनी चाहिए. उन्हें अपनी ख़्वाहिशें बयां नहीं करनी चाहिए.

सदियों से औरतों को इन्हीं पाबंदियों में क़ैद करने की कोशिश की जाती रही है. इसी वजह से बहुत सी महिलाएं ख़ूबसूरत दिखने के लिए ख़ुद पर न जाने कितने ज़ुल्म ढाती रही हैं.

जब भी कला के ज़रिए महिलाओं के अलग रूप को दिखाने की कोशिश की गई है, तब उसका विरोध हुआ है. उसका मज़ाक़ बनाया गया है. उसे नफ़रत की नज़र से देखा गया है.

ऐसा ही हो रहा है अमरीकी सीरियल 'गर्ल्स' को लेकर. इसमें कामकाजी लड़कियों की कहानी है. जिसकी ब्रिटेन और अमरीका में बड़ी चर्चा हो रही है.

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कई लोग इसे कुछ ज़्यादा ही बिंदास बता रहे हैं. कुछ लोग ये कहते है कि इसमें सेक्स और नग्नता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है. कुछ आलोचकों की नज़र में इस सीरियल में लड़कियों के जो किरदार बुने गए हैं, वो सच्चाई से परे हैं.

इस लेख को लिखने वाली ब्रिटेन की लेखिका एरिका जोंग महिलावादी लेखिका के तौर पर मशहूर हैं. एरिका कहती हैं कि उन्हें नौजवान लेखिकाएं ज़्यादा पसंद हैं.

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Image caption महिलावादी लेखन के लिए मशहूर हैं एरिका जोंग

जब वो जम़ाने की खींची गई लक्ष्मण रेखाओं को लांघ कर लिखती हैं तो वो और भी ज़्यादा लुभाती हैं. एरिका का मानना है कि गर्ल्स में भले ही कई खामियां हों, मगर उसने औरतों को लेकर एक नया नज़रिया पेश किया है, जो क़ाबिल-ए-तारीफ़ है.

'गर्ल्स' एक कॉमेडी ड्रामा है, जिसमें चार लड़कियों की कहानी है. ये लड़कियां न्यूयॉर्क में रहती हैं. सीरियल को लीना डनहम ने लिखा और डायरेक्ट किया है.

सीरियल की मुख्य पात्र हाना है जिसकी कहानी सीरियल की लेखिका और डायरेक्टर की ज़ाती ज़िंदगी से मिलती है.

हाना के माता-पिता उसे अचानक पैसे देना बंद कर देते हैं. इसके बाद वो अपनी सहेलियों के साथ मिलकर ख़ुद अपना ख़र्च उठाने के लिए तरह-तरह की तरक़ीबें अपनाती हैं.

औरतों की अनदेखी

इस सीरियल को लेकर काफ़ी नुक्ताचीनी की गई. कहा गया कि सीरियल में नंगेपन की भरमार है. सीरियल में ये दिखाया गया है कि इन लड़कियों के ब्वॉयफ्रैंड के साथ सेक्स में इन लड़कियों को कोई लुत्फ़ नहीं आता. उन लडकों को अपनी गर्लफ्रैंड की ख़्वाहिशों, उनकी पसंद-नापसंद की फिक्र ही नहीं.

वो बस सेक्स की ख़ुद की ज़रूरत पूरी करने के लिए इन लड़कियों के साथ हमबिस्तर होते हैं. ऐसे ख़ुदग़र्ज दोस्तों के साथ हमबिस्तर होती लड़कियां बग़ावत करती हैं. सेक्स को लेकर खुलकर अपनी ख़्वाहिशें ज़ाहिर करती हैं.

हालांकि सीरियल में इस कड़वे सच को थोड़े व्यंग्य के अंदाज़ में पेश किया गया है. लेकिन ये तो सदियों से दबाकर, छुपाकर रखी गई समाज की सच्चाई है. अक्सर, मर्द, जिस्मानी संबंध में औरतों की ख़्वाहिशों की अनदेखी करते हैं.

इस सीरियल में यही दिखाने की कोशिश की गई है. यौन संबंधों में दोनों ही पार्टनर की बराबर की हिस्सेदारी होती है और उसका आनंद लेने का हक़ भी दोनों का बराबर है.

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Image caption अमरीकी टीवी सीरियल गर्ल्स की एक क़िरदार

अक्सर ऐसा होता नहीं है. अगर महिला खुल कर अपनी ख़्वाहिश का इज़हार करती है तो उसे बेशर्म और नीच कहा जाता है.

जिन देशों में महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है वहां तो आज भी महिलाओं को सिर्फ़ मर्द की ख़्वाहिश का ख़्याल रखना पड़ता है. वो क्या चाहती है, उसे क्या पसंद है या नहीं है, ये बात तो वो अपनी ज़ुबान पर ला भी नहीं सकती.

सीरियल के एक एपिसोड में हाना का सामना एक उपन्यासकार से होता है. वो उसे रिझाने की पूरी कोशिश करता है. पहली नज़र में हाना को भी वो एक सज्जन ही लगता है. लेकिन बाद में पता चलता है कि वो यही काम और भी कई लड़कियों के साथ कर चुका है.

रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे लोगों का सामना अक्सर हो ही जाता है. इसी तरह एक एपिसोड में हाना को गर्भवती दिखाया गया है. वो अपनी ज़िंदगी में बच्चा तो चाहती है, लेकिन इस बात को लेकर कन्फ्यूज़्ड है कि उसे बच्चे के साथ कोई साझीदार भी चाहिए कि नहीं. ये ऐसी तल्ख़ सच्चाई है जिसका पूरी दुनिया में महिलाएं सामना करती हैं.

शादी के बाद ख़ास चश्मा

एरिका अपने तजुर्बे भी बताती हैं. वो कहती हैं कि शादी से पहले के उनके सारे ब्वॉयफ्रैंड बहुत अच्छे थे. वो कहती है जब तक वो कॉलेज में थी उनके बॉयफ्रैंड उनकी काफ़ी इज़्ज़त करते थे. उनकी पसंद-नापसंद का ख़्याल करते थे.

मगर पहली शादी से तलाक़ के बाद जब भी वो डेट पर गईं उन्हें एक ख़ास चश्मे से देखने की कोशिश की गई. एरिका कहती हैं कि हाना की तरह उन्हें भी कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा था.

एरिका कहती हैं कि शादी और तलाक़ के बाद जब भी महिलाएं डेट पर जाती हैं, मर्द ये सोचते हैं कि वो पहली ही मुलाक़ात में हमबिस्तर होने के लिए आई हैं. एरिका के मुताबिक़ मर्द समझते हैं उसके लिए जिस्मानी संबंध बनाना आसान होगा. वो पहली मुलाक़ात में ही उसे अपने बेडरूम में ले जाने की सोचने लगते हैं.

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Image caption अमरीकी टीवी इतिहास में सबसे घृणा किया जाने वाला क़िरदार है स्कायलर व्हाइट

एरिका कहती हैं आप चाहे व्यंग्य लिखें, या रूमानी नॉवेल लिखें या कुछ और, उसमें सच्चाई होनी चाहिए. वो हक़ीक़ी ज़िंदगी के नज़दीक होना चाहिए. सीरियल 'गर्ल्स' में वो सच्चाई नज़र आती है. इस सीरियल की लेखिका और डायरेक्टर लीना डनहम ने लड़कियों को कई बंदिशों से आज़ाद किया है.

वो लड़कियों को बिना मेकअप या कई बार बिना कपड़ों के पेश करके ये दिखाना चाहती हैं कि औरतों के ऐसे रूप भी होते हैं. हमेशा छरहरी लड़कियां ही ख़ूबसूरत नहीं होतीं. एरिका के मुताबिक़ इस सीरियल के ज़रिए लीना ने औरतों की ख़ूबसूरती की परिभाषा बदलने की कोशिश की है. वो लड़कियों को आत्मविश्वास से जीने का संदेश देती हैं.

ऐसा नहीं है कि सीरियल में कोई बहुत अलग सी बात बताई गई हो. बल्कि ये बताने कि कोशिश की गई है कि ज़िंदगी किसी मैगज़ीन के कवर पेज की तरह मख़मली नहीं है.

हरेक महिला को सिर्फ़ खूबसूरती के पैमाने पर आंक कर उसकी क़ाबिलियत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लीना ने ये भी बताया है कि सारे मर्द भी एक जैसे नहीं होते, यानी वो चाहती हैं कि लोग दुनिया को नए-नए चश्मों से देखें.

सेक्स पर बेबाक लिखने पर उठे सवाल

एरिका कहती हैं लीना डनहम की जमकर आलोचना हो रही है, क्योंकि उन्होंने सेक्स जैसे मुद्दे को खुलेआम रखा. लड़कियों की ख़्वाहिशों को भी तरजीह दी. इसी वजह से इसकी आलोचना हो रही है.

लीना के हवाले से लेखिका एरिका अपने तजुर्बे भी बताती हैं. वो कहती हैं कि जब 1973 में उनकी किताब फ़ियर ऑफ़ फ्लाइंग प्रकाशित हुई थी, तो उन्हें भी ऐसे विरोध का सामना करना पड़ा था. क्योंकि उन्होंने सेक्स जैसे विषय पर बेबाकी से लिखा था. तब उनके किरदार पर ही सवाल उठाए गए थे.

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Image caption गर्ल्स सीरियल की एक अन्य अदाकारा

हम हिंदुस्तान में भी ऐसा होता देख चुके हैं. इस्मत चुग़ताई, कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी लेखिकाओं को समाज के दोगलेपन को उधेड़ने की वजह से काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा था.

दुनिया में अच्छी लेखिकाओं की कमी नहीं. लेकिन उन्हें भी अक्सर उसी ख़ास चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है, जो समाज की सोच के मुताबिक़ हो.

शायद इसीलिए कुछ लेखिकाएं लिखना छोड़कर घर बार संभालना ज़्यादा बेहतर समझती हैं. सीरियल 'गर्ल्स' की डायरेक्टर और लेखक ने जो साहस दिखाया है वो क़ाबिले-तारीफ़ है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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