क्या डायन की 'ममी' ख़ुद को ज़िंदा किए जाने का बदला लेगी?

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मिस्र को लेकर पश्चिमी देशों में बहुत दिलचस्पी देखी जाती है. ख़ास तौर से दुनिया के सात अजूबों में से एक कहे जाने वाले मिस्र के पिरामिड को लेकर तो पश्चिमी देशों में जुनून की हद तक दीवानगी देखी जाती है.

पिरामिड में रखे गए, प्राचीन शासकों के शव को हम 'ममी' के नाम से जानते हैं.

ममी को लेकर भी पश्चिमी देशों में तमाम क़िस्से-कहानियां चलन में हैं. इन पर कई फ़िल्में भी बनी हैं.

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मिस्र की ममी पर एक बार फिर हॉलीवुड एक नई फ़िल्म लेकर आ रहा है. इसका नाम होगा- द ममी (The Mummy). इस फ़िल्म में सोफ़िया बौतेला ने एक चुड़ैल की ममी का किरदार निभाया है, जो गलती से छेड़ दिए जाने की वजह से जाग उठती है.

वैसे मिस्र की ममी को लेकर हॉलीवुड की ये पहली फ़िल्म नहीं है. इसका सिलसिला क़रीब एक सौ साल पहले शुरू हुआ था. जब 1920 के दशक में प्राचीन मिस्र के राजा तूतनख़ामेन की क़ब्र से उनकी ममी निकाली गई थी.

उसी दौर से पश्चिमी देशों में ममी को लेकर तमाम क़िस्से-कहानियां गढ़े गए.

1920 के दशक में तूतेनख़ामेन की क़ब्र खोदने का काम ब्रिटिश पुरातत्वविद होवार्ड कार्टर की अगुवाई में चल रहा था. उस दौरान इस मिशन से जुड़े कई लोगों की मौत की ख़बर आई.

होवार्ड का ये मिशन 1922 के दौरान चल रहा था. इसे 'वैली ऑफ़ किंग्स' की खोज कहा गया था.

जब कई लोगों की संदिग्ध मौत के बाद इस मिशन में पैसे लगाने वाले ब्रिटिश रईस लॉर्ड कार्नारवॉन की भी मच्छर काटने से मौत हो गई, तो इसे फैरो तूतनख़ामेन के श्राप का नतीजा बताया गया.

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रहस्यमय किरदार

इसके बाद तो मानो हॉलीवुड के फ़िल्मकारों को ममी की शक्ल में फ़िल्मी दुनिया का नया रहस्यमयी किरदार और खलनायक मिल गया. ये ऐसा किरदार था जो उस वक़्त के भयावने खलनायकों ड्रैकुला और फ्रैंकेंस्टीन से अलग था.

वो इसलिए कि तूतनख़ामेन असल दुनिया में भी रहे थे. फिर उनकी क़ब्र और ममी भी खोज निकाले गए थे. इससे ममी नाम का ये फ़िल्मी खलनायक असल और क़रीबी लगने लगा था.

फिर ममी को लेकर मीडिया की दिलचस्पी ने भी फ़िल्मकारों को ममी पर फ़िल्म बनाने को मजबूर किया. अमरीका में आर्ट डेको के नाम से पिरामिड की तरह की इमारतें बनाने का चलन भी शुरू हो गया था.

मिस्र और ममी को लेकर लोगों की दिलचस्पी देखते हुए हॉलीवुड केयूनिवर्सल स्टूडियो ने 1932 में ममी पर आधारित पहली फ़िल्म बनाई थी. फ़िल्म के लिए स्टूडियो के अंदर ही पूरी तरह से मिस्र का माहौल तैयार किया गया.

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फ़िल्म में मिस्र के पुजारी 'इम्होतेप' की ममी के ज़िंदा हो उठने की कहानी थी. ये किरदार बोरिस कार्लोफ़ ने निभाया था. जिसकी ममी गलती से एक जादुई मंत्र पढ़ने की वजह से फिर से ज़िंदा हो उठी थी.

इम्होतोप अपना प्यार खो चुका है और उसकी तलाश करता है. जिसका नाम अंखएसेनामुन था. वो राजा तूतनखामेन की सौतेली बहन और बीवी थी. फ़िल्म में दिखाया गया है कि इम्होतेप को ये यक़ीन हो जाता है कि उसकी माशूक़ा का पुनर्जन्म हुआ है. अमरीका उस दौरान महान मंदी के दौर से गुज़र रहा था. फ़िल्म को लोगों ने ख़ूब पसंद किया था.

फिल्म के स्क्रीनराइटर जॉन एल बाल्डरस्टोन पेशे से पत्रकार थे. उन्होंने तूतनख़ामेन के मक़बरे की खुदाई के दौरान एक अख़बार के लिए रिपोर्टिंग की थी. इसी वजह से जब उन्होंने फ़िल्म की कहानी लिखी तो लोगों को उस पर यक़ीन हो गया. जब लोगों ने उन घटनाओं को पर्दे पर किरदारों के तौर पर देखा तो उन्हें एक अलग जुड़ाव महसूस हुआ.

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फ़िल्मकारों की कल्पनाशीलता

फ़िल्म 'द ममी' के एक दशक बाद दूसरी फ़िल्म 1940 में आई 'द ममी हैंड'. लेकिन इस फ़िल्म को उतनी कामयाबी नहीं मिली.

फ़िल्मों में जिस तरह ममी को ज़िंदा होते हुए और चलते-फिरते दिखाया गया, वो तो बस फ़िल्मकारों की कल्पनाशीलता थी. असल में तो ममी, मर चुके लोगों की यादों को लंबे वक़्त तक सुरक्षित रखने के लिए बनाई जाती थी. मगर, फ़िल्मकारों ने ममी को एक ख़तरनाक जिन्न में तब्दील कर दिया.

सन 1959 में हैमर स्टूडियो ने टेरेंस फिशर के निर्देशन में ममी पर जो फ़िल्म बनाई वो पहले बनी फ़िल्मों के मुक़ाबले ज़्यादा डरावनी थी. लेकिन इस फ़िल्म में ममी के रोमानी पहलू को फिर से बहाल किया गया था.

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शुरूआती ममी फ़िल्म में रानी अंखएसेनामुन का जो किरदार दिखाया गया था, उसे इस नई फ़िल्म के स्क्रीनराइटर जिमी सेंग्सटर ने राजकुमारी अनानका के नाम से फिर से ज़िंदा किया. इस किरदार में अनानका को एक ग्लैमर गर्ल के तौर पर पेश किया गया था.

हैमर स्टूडियो ने बाद में भी ममी पर फ़िल्में बनाईं. जैसे 1967 में आई, फ़िल्म 'द ममी श्राउड' में कहानी को और आगे बढ़ाया गया. इसमें तूतनख़ामेन की क़ब्र खोदने वालों का एक के बाद एक रहस्यमयी तरीक़े से क़त्ल होते हुए दिखाया जाता. इस मिशन में पैसे लगाने वाले लॉर्ड कार्नरवॉन का क़त्ल होते हुए भी दिखाया गया था.

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फ़िल्म बनी अभिशाप

इसके बाद ममी की थीम पर एक और फ़िल्म बनी 'ब्लड फ्रॉम दा ममी टॉम्ब'. इस फ़िल्म की कहानी ब्राम स्टॉकर के नॉवेल 'दा ज्वेल ऑफ द सेवन स्टार' से प्रेरित थी.

फ़िल्म में मिस्र की बेहद ख़ूबसूरत मगर ख़तरनाक रानी की मौत के बाद उसके पुनर्जन्म की कहानी थी. ये फ़िल्म ख़ुद ही अभिशाप बन गई थी. प्रोडक्शन शुरू होने के पांच हफ़्ते बाद ही फ़िल्म के निर्देशक की दिल का दौरा पड़ने से अचानक मौत हो गई. फिर फ़िल्म में महारानी लियोन के पिता का किरदार निभाने वाले कलाकार फरदरमोर पीटर की पत्नी की मौत हुई, जिसके बाद वो फ़िल्म से अलग हो गए. फ़िल्म में उनकी जगह दूसरे कलाकार को लेना पड़ा.

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इसके बाद काफ़ी वक़्त तक ममी विषय पर हॉलीवुड में फ़िल्में नहीं बनीं. पिछली सदी के 80 के दशक में स्टीवन स्पीलबर्ग की इंडियाना जोंस सिरीज़ की कुछ फ़िल्मों की कहानी मिस्र पर आधारित थी.

उस दौर में ममी से हटकर मिस्र की प्राचीन संस्कृति, ऐतिहासिक स्मारकों की खोज और ख़ुद ममीकरण पर फ़िल्में बनाई गईं. पुरानी कहानियों में नयापन लाने के लिए स्पीलबर्ग ने हॉलीवुड के मशहूर जासूस किरदार शरलॉक होम्स को मिस्र में ममी बनाने के तरीके की पता लगाते दिखाया गया.

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Image caption टॉम क्रूज़ और एनाबेल वैलिस

1999 से लेकर सन 2008 तक ममी के विषय पर कई फ़िल्में आईं. ज़्यादातर कहानियां असली रिवायतों और मनगढ़ंत बातों के मेल पर ही आधारित थीं.

इन फ़िल्मों में मुख्य किरदार रैशेल वीज़ और ब्रैंडेन फ्रेज़र ने निभाए. इम्होतेप के किरदार को भी फिर से ज़िंदा किया गया. एक बार फिर से ममी का सिक्का बॉक्स ऑफ़िस पर ख़ूब चला.

अब ममी पर टॉम क्रूज़ और सोफ़िया बौतेला की फ़िल्म आ रही है. ट्रेलर से लगता है कि इस फ़िल्म में एक डायन की ममी ख़ुद को ग़लती से ज़िंदा किए जाने का बदला लेगी.

इसकी कामयाबी या नाकामी से तय होगा कि आगे चलकर हम ममी सिरीज़ की फ़िल्में कितनी जल्दी या देर से देख पाएंगे. पर ये तय है कि मिस्र की ममी पर फ़िल्में बनती रहेंगी.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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