ग्रीस से दुनिया को ये ये चीज़ें मिली हैं

  • 14 मई 2017
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प्राचीन यूनान या ग्रीस को पश्चिमी सभ्यता का गुरू कहा जाता है. प्राचीन ग्रीस की परंपराएं, इतिहास, रिवाज, खोज और धर्म ने आज की पश्चिमी सभ्यता की बुनियाद रखी थी.

उस दौर की तमाम चीज़ों की झलक हम आज के पश्चिमी देशों में देख सकते हैं. उस दौर के रीति-रिवाज और चलन का आज भी पश्चिमी दुनिया पर गहरा असर दिखता है.

मिसाल के तौर पर लोकतंत्र को ही लीजिए. आज पश्चिमी देशों में लोकतंत्र का जैसा रूप दिखता है. उसकी जड़ें जितनी गहरी हैं. पश्चिमी देशों में जितनी शिद्दत से लोग लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर लड़ते हैं, वो, उन्हें प्राचीन ग्रीस से विरासत में मिला.

यूं तो जानकार कहते हैं कि आम लोगों का चाल-चलन सभ्यता और संस्कृति नहीं कहा जा सकता. जो आम है वो सभ्य और सुसंस्कृत हो ही नहीं सकता. ये तो सामंतवादी सोच है, जो फैशन डिजाइनर विवियन वेस्टवुड जैसे लोगों को ऐसा कहने को मजबूर करती है.

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मगर, यूं भी लोकतंत्र, जो आम लोगों के नाम पर चलता है, उसमें आम जनता की भागीदारी कम ही होती है.

नाटक कहां से आए?

पर, प्राचीन काल के ग्रीस में ऐसा नहीं था. वहां, जनता प्रशासन से लेकर मनोरंजन की दुनिया तक हर चीज़ में भागीदार थी. प्राचीन काल में यूनान में मनोरंजन का बड़ा ज़रिया नाटक हुआ करते थे. इंसानी सभ्यता को नाटकों की देन यूनान से ही मिली थी.

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ईसा की पांच सदी पहले से ही ग्रीस में नाटकों का लिखा जाना और उनके मंचन का दौर शुरू हो गया था. उसी दौर से हमें ग्रीक ट्रैजेडी यानी दुखी अंत वाले नाटकों की विरासत मिली.

ग्रीस की राजधानी एथेंस मे खुले थिएटर में नाटकों का मंचन होता था. जनता के बीच से चुने गए दस लोग इन नाटकों को अच्छे या बुरे के दर्जे में बांटने के लिए जज बनाए जाते थे. ये जज सिर्फ़ अपनी सोच की बुनियाद पर किसी नाटक को अच्छा या बुरा नहीं कह सकते थे. उन्हें आम लोगों की पसंद-नापसंद का ख़याल रखते हुए फ़ैसला सुनाना होता था.

सभ्यताओं के इतिहास पर नज़र रखने वाले मानते हैं कि प्राचीन एथेंस में नाटकों का ये मंचन, उस दौर के लोकतांत्रिक होने की गवाही था. वहां नाटक सिर्फ समाज के रईस लोगों के मनोरंजन का ज़रिया नहीं थे. ये समाज को सबक़ देते थे. हर तबक़े का मनोरंजन करते थे.

टैक्स का चलन

नाटकों का लेखन और मंचन ग्रीक समाज की बहुत बड़ी खोज थी. इसके ज़रिए लोगों को लोकतंत्र का, रीति-रिवाजों का और दुनियादारी का पाठ पढ़ाया जाता था. कुछ जानकार मानते हैं कि इन्हीं नाटकों की वजह से ग्रीस में गणित, मेडिसिन, दर्शन, इतिहास और साहित्य की पढ़ाई की बुनियाद पड़ी.

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प्राचीन एथेंस के तीन महान नाटककार हुए. इनके नाम एसीकिलस, सोफ़ोक्लेस और यूरीपिडस थे. ये तीनों ही दुख भरे अंत वाले नाटक लिखने के उस्ताद कहे जाते हैं. इन्हीं के नाटकों की वजह से 'ग्रीक ट्रैजेडी' का फलसफा दुनिया में मशहूर हुआ. इसी दौर में ग्रीस में मशहूर कॉमेडियन एरिस्टोफेन्स भी हुए.

प्राचीन यूनान में डायोनिसिया नाम के देवता के नाम पर पांच दिनों का जश्न मनाया जाता था. इस दौरान मेले लगते थे लोग शराब पीते थे. और नाटकों का खुला मंचन होता था. इसमें समाज के गरीब तबक़े को शामिल होने के लिए पैसे भी मिलते थे. रईस लोगों पर टैक्स लगाकर नाटक दिखाने का ख़र्च वसूला जाता था. ये भी एक तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था थी, जिसमें रईसों पर टैक्स लगाकर गरीबों की मदद की जाती थी.

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उस दौर के नाटकों को आज सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश कहकर ख़ारिज किया जा सकता है. मगर याद रहे कि ये नाटकों के लिखने का शुरुआती दौर था. लिखने वालों से लेकर देखने वालों तक, इस विधा के नए तजुर्बे कर रहे थे. अक्सर नाटकों में समाज के दबे-कुचले लोगों, जैसे महिलाओं, देश से निकाले गए लोगों और विदेशियों के क़िस्से बयां किए जाते थे. इन नाटकों के ज़रिए जज़्बातों का खुलकर इज़हार होता था.

एसीकिलस का दुखांत नाटक द पर्सियन्स (472 ईसा पूर्व) ग्रीक नाटककारों की संवेदनशीलता को बख़ूबी बयां करता है. ये नाटक उस वक़्त लिखा गया था, जब फारस के राजा जैक्सिस ने ग्रीस पर हमला करके वहां तबाही मचा दी थी. इस नाटक के ज़रिए फ़ारसियों को इस बात के लिए फटकार लगाई गई थी. उन्हें समझाया गया था कि एथेंस को बर्बाद करके उन्होंने अच्छा नही किया.

जंग के ख़िलाफ़ आवाज़

लंदन के किंग्स कॉलेज के प्रोफ़ेसर एडिथ हॉल मानते हैं कि ये नाटक नहीं ग्रीस का हमलावर फारसियों को जवाब था. भले ही इसका नाम द पर्सियंस हो, मगर इस नाटक में फारसी हमलावरों से ज़्यादा ग्रीक लोगों का ज़िक्र था, यूनान में हुई तबाही और लोगों की तकलीफ़ों का ज़िक्र था. इसमें दिखाया गया था कि हमलावर राजा जैक्सिस को उसके पिता की आत्मा आकर हैवानियत करने के लिए फटकारती है.

कॉमेडियन एरिस्टोफेन्स के नाटक द आर्केनियन्स (425 ईसा पूर्व) के ज़रिए जंग के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई थी. ये एथेंस और स्पार्टा की लड़ाई पर आधारित व्यंग नाटक था. ग्रीक जजों ने उस दौर में भी उसे पहला पुरस्कार दिया था.

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कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर पॉल कार्टलेज कहते हैं कि प्राचीन ग्रीस के नाटक लोगों के लिए लोकतंत्र की पाठशाला थे. प्रोफ़ेसर पॉल ग्रीक नाटकों की तुलना आज के रियालिटी शो द एक्स फैक्टर और इंडियन आइ़डल वग़ैरह से करते हैं. वो कहते हैं कि आज हम किसी भी शो में हिस्सेदार नहीं होते. घर बैठकर चुपचाप उसे देखने को मजबूर होते हैं. मगर प्राचीन काल के ग्रीस में ऐसा नहीं था. वहां दर्शक नाटक का हिस्सा होते थे. वहीं पर अपनी सीधी और बेबाक राय दे सकते थे. ये लोकतंत्र ही तो था.

लेकिन बहुत से लोग, उस दौर में भी नाटकों के ज़रिए जनता को जम्हूरियत पढ़ाने के ख़िलाफ़ थे. प्लेटो का कहना था कि एथेंस के लोग नाटकराज में रहते थे. एथेंस का राज ऐसे लोगों के हाथ में है, जो थिएटर जाते हैं. वो जनता की भागीदारी के ख़िलाफ़ थे.

नाटकों का डर

जब ईसा से 404 साल पहले स्पार्टा ने एथेंस को हराया तो नए हुक्मरानों ने एथेंस में नाटक का मंचन बंद करा दिया. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तो एक विलासिता है. इसके बाद नाटक देखने के लिए टिकट लगने लगे. जिसके पास पैसे होते थे, वही नाटकों का लुत्फ़ उठा सकता था.

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एथेंस में पिछली सदी में जब 1967 में जनरलों ने तख्ता पलट किया तो उन्होंने ग्रीस में कॉमेडी और दुख भरे नाटकों के मंचन पर रोक लगा दी थी. सोचिए सैन्य तानाशाहों को सबसे ज़्यादा डर नाटकों से ही था.

बीसवीं सदी में ग्रीक ट्रैजेडी वाले नाटकों का दौर पश्चिमी देशों में फिर लौटा था. इसके सबक़ लेते हुए कई तरक़्क़ीपसंद नेताओं ने सामंतवाद और तानाशाही का विरोध किया.

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आज भी एथेंस के नाटक, लोगों के लिए सीख का ज़रिया हैं. प्रोफ़ेसर हॉल बताती हैं कि 1998 में आई फिल्म प्रोमेथियस, आम कामगारों के लिए बनी फ़िल्म है. जिसमें ब्रिटेन में कामगारों के सिमटते दायरे और कमज़ोर होते तबक़े का सोग मनाया गया था.

ग्रीक ट्रैजेडी की बुनियाद पर टीवी शो भी बने. एचबीओ की सीरीज़ The Wire एथेंस के नाटक से ही प्रेरित थी. इसके निर्माता डेविड साइमन ने कहा था कि ये सीरीज़ नई सदी की ग्रीक ट्रैजेडी है.

लोकतांत्रिक नाटकों की पूरी दुनिया में भरी-पूरी विरासत रही है. लेकिन तानाशाहों के दौर में अक्सर ऐसे खुलेपन को कुचला जाता रहा है. क्योंकि कट्टरपंथियों और तानाशाहों को लगता है कि अभिव्यक्ति की खुली आज़ादी, उनकी हुकूमत के लिए ख़तरा बन सकती है. ये नाटक और ऐसी फ़िल्में लोगों को बग़ावत के लिए उकसा सकते हैं.

तानाशाहों और कट्टरपंथियों का ये डर ही साबित करता है कि एथेंस में ईजाद हुए नाटक किस कदर लोकतांत्रिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते थे.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिएयहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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