वो शख़्स जिसने कौमी तरानों की शुरुआत की थी

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अक्सर बड़े आंदोलनों के गीत बन जाते हैं. जैसे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जब हिंदुस्तान ने बग़ावत की तो 'वंदे मातरम्' या 'शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले'- जैसे गीत, जोश भरने के लिए गाए जाते थे.

इसी तरह हमारा कौमी तराने 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' या फिर राष्ट्रगान- 'जन गण मन' नागरिकों और फ़ौजियों में आज भी जोश भरने का काम करते हैं.

असल में संगीत में रूहानी ताक़त होती है और इसे सुर और लय मिल जाए तो ये इंसान को जोश से लबरेज़ कर देते हैं.

गीतों के ज़रिए इंसानी जज़्बातों को हवा दी जाती है...मसलन फ़िल्मी गीत...'हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे...इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे.'

या फिर...हम होंगे कामयाब...एक दिन...हम होंगे कामयाब...

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क्या आपने कभी सोचा कि गीतों के ज़रिए लोगों को एकजुट करने, उनमें लड़ाई के लिए जोश भरने का काम कब और किसने शुरू किया था?

चलिए आज आपको उस शख़्स से रूबरू कराते हैं जिसने तरानों के ज़रिए आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का ये नुस्खा ईजाद किया था.

उस महान हस्ती का नाम था मार्टिन लूथर. मार्टिन लूथर एक जर्मन धार्मिक नेता थे जिन्होंने ईसाई धर्म की बुराइयों के ख़िलाफ़ मुहिम को कामयाबी की मंज़िल तक पहुंचाया था.

हाल ही में जर्मनी में प्रोटेस्टेंट सुधारवादी आंदोलन की 500वीं सालगिरह मनाई गई. 25 मई को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में ऐतिहासिक ब्रांडेनबर्ग गेट के पास एक कार्यक्रम आयोजित करके इस धार्मिक सुधारवादी आंदोलन के नेताओं को याद किया गया. इस कार्यक्रम में मुख्य मेहमान के रूप में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल थे.

जिस प्रोटेस्टेंट सुधारवादी आंदोलन की सालगिरह का ये जश्न था, वो मध्य यूरोप में पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में चलाया गया था. यूं तो इस आंदोलन के कई चेहरे थे. मगर इनमें सबसे प्रमुख थे मार्टिन लूथर.

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मार्टिन लूथर धर्मशास्त्र के प्रोफ़ेसर थे, संगीतकार थे, लेखक थे, पादरी और भिक्षु थे भी. वो ईसाइयत के सुधारवादी आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे. उन्हें आज भी उनके भजनों और धुनों के लिए याद किया जाता है. उन्होंने ईसाई धर्म के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से आवाज़ उठाई थी.

सन् 1517 में मार्टिन लूथर ने अपनी 95 थीसेज़ के ज़रिए कैथोलिक फिरके की बुराइयों पर सवाल उठाया और ईसाइयों के सबसे बड़े धर्म गुरू पोप लियो को सीधी चुनौती दी थी. पोम राजा चार्ल्स पंचम के फ़रमान के बावजूद मार्टिन लूथर अपनी बात से पीछे नहीं हटे.

उस वक़्त जर्मनी ही नहीं, पूरे यूरोप में जनता पढ़ी-लिखी नहीं थी. सोलहवीं सदी में जर्मनी की 85 फ़ीसद आबादी अनपढ़ थी. समाज पर पादरियों का शिकंजा था. वो किसी को भी पापी घोषित कर देते थे. फिर पैसे लेकर उसका पाप माफ़ करने का धंधा भी करते थे.

इसे उस दौर में इंडलजेंस (Indulgence) कहा जाता था. मार्टिन लूथर इसके सख़्त ख़िलाफ़ थे. वो कहते थे कि पादरियों को पाप को माफ़ करने का कोई अख़्तियार नहीं. असल में तो पाप को पुण्य करने का ये बढ़िया धंधा है, जिसके ज़रिए जनता को बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है.

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अनपढ़ लोगों को एकजुट करने के लिए मार्टिन लूथर ने गीत संगीत का सहारा लिया. वो जानते थे कि भाषणों से उनका संदेश दूर-दूर तक नहीं पहुंच सकता था.

इसलिए मार्टिन लूथर ने लोक भाषाओं में भजन और कविताएं लिखकर अपने संदेश का प्रचार किया. ये भजन लोग एक-दूसरे से सुनते-सुनाते थे और ऐसे ही इसका और मार्टिन लूथर के आंदोलन का प्रचार करते थे.

मार्टिन लूथर ने लोगों को बताया कि मुक्ति और अमरता अच्छे कर्मों के ज़रिए नहीं मिलती. असल में ये तो भगवान का तोहफ़ा है जो मुफ़्त में ही इंसान को मिला है. ये पादरी और पोप, ज़बरदस्ती ही भगवान और इंसान के बीच दलाल बन बैठे हैं.

उस वक़्त बाइबिल सिर्फ़ लैटिन ज़बान में ही पढ़ाई जाती थी. मार्टिन लूथर ने इसका अनुवाद स्थानीय भाषा में करके इसे आम लोगों तक पहुंचाया. इसका जर्मनी पर गहरा असर हुआ था.

मार्टिन लूथर के भजन, उनके संगीत, एक वक़्त में मध्य यूरोप में घर-घर में गाए जाते थे. उनकी प्रेरणा से ही लोगों ने पोप और पोप के समर्थक राजाओं के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी. प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक राजाओं ने अपने-अपने मोर्चे बना लिए, जिनके बीच तीस साल तक जंग चली. कहते हैं कि इस जंग में 80 लाख से ज़्यादा लोग मारे गए थे.

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पूरे यूरोप में आज भी मार्टिन लूथर की सियासी और धार्मिक विरासत का गहरा असर देखा जा सकता है. बग़ावती तेवर वाले गायक-संगीतकार आज भी मार्टिन लूथर से प्रेरणा लेते हैं. उनका बनाया लोक संगीत आज भी लोग गाते हैं.

असल में मार्टिन लूथर से पहले संगीत का लुत्फ आम लोगों की पहुंच से बाहर था, आम लोग सिर्फ चर्च में धार्मिक गीत ही सुन पाते थे. समाज में पादरियों का ऐसा शिकंजा था कि लोग संगीत जैसी नेमत से भी महरूम थे.

लेकिन मार्टिन लूथर ने अपने लोक गीतों और धुनों के जरिए संगीत को यूरोप के घर-घर का हिस्सा बना दिया. उनके लिखे भजनों से ईसाइयत में इंक़लाब का सैलाब आ गया.

उस वक़्त ज़्यादातर गीत लैटिन ज़बान में लिखे जाते थे. लेकिन मार्टिन लूथर ने जर्मन भाषा में गीत लिखे. इससे वो अनपढ़ जनता के दिलों में बस गए.

मार्टिन लूथर को मालूम था कि संगीत लोगों की रूह को छू लेता है, उसे जगा देता है. इसीलिए उन्होंने बच्चों को संगीत पढ़ने का हौसला दिया. मार्टिन लूथर का सबसे मशहूर गीत Ein Feste Burg आज भी लोग गाते हैं.

उस वक़्त प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हो गया था. मार्टिन लूथर और उनके सहयोगियों ने स्थानीय भाषाओं में पर्चे छपवाकर दूर-दूर तक अपना प्रचार किया. इन गीतों का कई भाषाओं में तर्जुमा किया गया. इससे मार्टिन लूथर की शोहरत पूरे यूरोप में फैल गई थी.

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सत्रहवीं सदी में तीस साल के युद्ध में भी लोगों ने उनके गीत गाकर ख़ुद में जोश भरा था. इन गीतों का दूसरे आंदोलनों में भी इस्तेमाल किया गया. यहां तक कि बीसवीं सदी में नाज़ियों ने भी मार्टिन लूथर के गीतों और भजनों को अपने प्रचार में इस्तेमाल किया था.

नए दौर के आंदोलनों में भी मार्टिन लूथर की बनाई धुनों पर गीत तैयार किए गए.

जैसे बंकिंम चंद्र चटर्जी का गीत वंदे मातरम् उन्हें अमर कर गया. कबीर की साखियां सदियों से गायी जा रही हैं. रहीम के दोहे आज भी मिसाल देने में काम आते हैं. मीरा के भजन आज भी गाए जाते हैं.

ठीक इसी तरह पश्चिमी सभ्यता के बीच मार्टिन लूथर के गीत, संगीत और भजन आज भी बेहद लोकप्रिय हैं. इनकी सबसे बड़ी ख़ूबी इनका सरल भाषा में होना है.

मार्टिन लूथर कहा करते थे कि संगीत भगवान की दी हुई बेशक़ीमती नेमत है. अपने भजनों के ज़रिए मार्टिन लूथर आज भी यूरोप और दूसरे पश्चिमी देशों के दिलों में ज़िंदा हैं.

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