किस्सा इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक की गॉड मदर का

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आज रीमिक्स संगीत का ज़माना है. अलग-अलग गानों को, धुनों को तोड़-जोड़कर एकदम नया संगीत तैयार कर लिया जाता है. हमने कई पुराने गानों को नई धुनों के साथ सुना है. कोई फ़ास्ट मोड में है, तो किसी को धीमा किया गया है.

लेकिन क्या आपको पता है कि संगीत की दुनिया में ये तजुर्बे किसने शुरू किए?

चलिए आज आपको उस शख़्सियत से मिलवाते हैं. उनका नाम था डैफ्ने ओरम. डैफ्ने का संगीत में दुनिया में बेशक़ीमती योगदान रहा. दुनिया की पहली रीमिक्स म्यूज़िक कम्पोज़िशन तैयार करने का सेहरा उन्हीं के सिर बंधता है जो उन्होंने महज़ 23 साल की उम्र में 1949 में तैयार की थी. और इसका नाम था 'स्टिल प्वाइंट'.

संगीत की धुनों को इलेक्ट्रॉनिक तरंगों पर उतारने, उनसे खेल करके नई धुनें और नया गाना तैयार करने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. डैफ्ने के काम ने संगीत की दुनिया में एक तरह का इंक़लाब ला दिया. 1957 में उन्होंने 'ओरेमिक्स मशीन' पर काम करना शुरू किया.

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'डैफ्ने ओरम वंडरफुल वर्ल्ड ऑफ़ साउंड'

इस मशीन से संगीत के ग्राफिक्स का इस्तेमाल करते हुए कोई भी मनचाही धुन तैयार की जा सकती थी. डैफ्ने की मौत साल 2003 में हुई थी. वो क्या शख्सियत थीं, ये लोगों ने उनकी मौत के बाद ही जाना. जो इज़्ज़त और शोहरत उन्हें ज़िंदगी में मिलनी चाहिए थी, वो उन्हें मरने के बाद नसीब हो रही है.

उनकी ज़िंदगी और काम पर आधारित एक ड्रामा तैयार किया गया है जिसका नाम है 'डैफ्ने ओरम वंडरफुल वर्ल्ड ऑफ़ साउंड.' इस प्ले के ज़रिए डैफ्ने के काम को लोगों तक पहुंचाया जा रहा है. इस प्ले में डैफ्ने के बचपन से लेकर म्यूज़िक कम्पोज़र बनने तक की कहानी को दिखाया गया है.

डैफ्ने की कला के जौहर को मशहूर संगीतकार लेज़्ले फ्लिंट ने पहचान था. हालांकि डैफ्ने के पिता चाहते थे कि वो एक नर्स बनकर लोगों की सेवा करें. लेकिन डैफ्ने ने अपने लिए अलग रास्ते का चुनाव किया.

ख़ुद इस ड्रामे को लिखने वालों का कहना है कि डैफ्नी की ज़िंदगी और काम से जुड़े ऐसे ऐसे दिलचस्प किस्से हैं, जिनसे संगीत प्रेमियों को वाक़िफ़ होना ज़रूरी है.

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इलेक्ट्रॉनिक साउंड इफैक्ट

डैफ्ने सिर्फ़ एक म्यूज़िक कम्पोज़र ही नहीं थीं, बल्कि वो एक साउंड इंजीनियर भी थी. 18 साल की उम्र में उन्होंने बीबीसी में म्यूज़िक बैलेंसर के तौर पर काम किया. चंद सालों में ही वो स्टूडियो मैनेजर बन गईं.

इसके साथ ही उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक साउंड इफैक्ट और म्यूज़िक तैयार करने लिए अलग स्टूडियो बनाने की लड़ाई शुरू कर दी. 1952 में उन्होंने लिखा था कि जिस तरह से कैमरे और सिनेमा में नए-नए आइडिया के ज़रिए कहानियां बताने में तजुर्बे किए गए. वैसे ही तजुर्बे माइक्रोफोन और टेप के साथ भी किए जा सकते थे.

जब 1950 में टेप की तकनीक शुरू हुई तो उन्हों ने इसके साथ भी कई तरह के तजुर्बे कर डाले और कई तरह के साउंड इफैक्ट तैयार किए. डैफ्ने के तजुर्बे उस दौर में काफ़ी क्रांतिकारी थे. वो साउंड मिक्सिंग का काम किया करती थीं. उस दौर में ये एकदम नई बात थी. लेकिन उनके काम को कभी तारीफ़ नहीं मिली.

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रेडियो ड्रामा

एक वजह शायद ये थी कि ये तजुर्बे एक महिला ने किए थे. और साउंड इंजीनियरिंग का काम मर्दों की जागीर समझा जाता था. मिक्सिंग तो ख़ैर उस वक़्त कोई करता ही नहीं था. ऐसे में एक महिला के लिए अपनी कोशिशों को मनवाना आसान नहीं था.

हालांकि बाद में बीबीसी ने उनके लिए रॉयल अलबर्ट हॉल में रेडियो फोनिक वर्कशॉप का इंतज़ाम कराया. लेकिन उसके लिए बहुत ज़्यादा फंड नहीं दिया गया. ओरम को ज़्यादातर तेज़ आवाज़ वाले झन्नाटेदार साउंड इफैक्ट तैयार करने को कहा जाता था. जिनका इस्तेमाल रेडियो ड्रामा में होता था.

डैफ्ने में अपने काम के लिए एक तरह का जुनून था. वो अकेल दम पर पूरी-पूरी रात जाग कर काम कर लिया करती थी. और शायद उनके इसी जुनून से उनके दूसरे मर्द साथियों को डर लगने लगा था. डैफ्ने को अचानक छह महीने की छुट्टी पर जाने को कह दिया गया.

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दमदार महिला

तर्क दिया गया कि रेडियोफोनिक मशीनों का सेहत पर बुरा असर पड़ता है. और डैफ्ने के जो बॉस थे उन्हें डैफ्ने की सेहत की फ़िक्र है. डैफ्ने जानती थीं कि उनके साथ ऐसा बर्ताव जान-बूझकर किया जा रहा है. हताश होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

डैफ्ने के साथ काम करने वाले मैकार्थर का कहना है कि बीबीसी ऐसी संस्था थी जहां उस वक़्त सिर्फ़ मर्दों का बोलबाला था. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि ओरम ही सबसे ज़्यादा क़ाबिल और होशियार थीं. और ना ही उनके साथ काम करने वाले सभी लोग खराब थे. लेकिन वो एक दमदार महिला थी.

जहां उसे जो चीज़ गलत लगती थी, उसके ख़िलाफ़ वो आवाज़ उठाती थी. वो मज़बूत इरादों वाली ज़िद्दी महिला थीं. और मर्दों की दुनिया में एक औरत के मिज़ाज में इन बातों का पाया जाना शायद अच्छी बात नहीं समझा जाता था. बीबीसी छोड़ने के बाद ओरम ने अपना स्टूडियो बनाया.

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म्यूज़िक और साउंड

और स्पेशल साउंड इफेक्ट की मदद से टेप के ज़रिए ऐसी धुनें तैयार कीं, जो आज तक याद की जाती हैं. 1968 में महारानी एलिज़ाबेथ के राज की सालगिरह के मौक़े पर भी उनकी रीमिक्स वाली धुन बजाई गई. 'लेगो' और 'नेसटी' जैसे ब्रांड के लिए उन्होंने जिंगल भी तैयार किए, जिससे उन्हें पैसे की मदद मिल गई.

'द बीटल्स' और 'मिक जैगर' जैसी हस्तियों ने भी ओरम के स्टूडियो में जाकर उनके काम की सराहना की. 1976 में ओरम ने अपना एक लेख जारी किया जिसमें उन्हों ने तफ़्सील से समझाने की कोशिश की थी कि इलेक्ट्रिक सर्किट कैसे काम करते हैं.

म्यूज़िक और साउंड की दुनिया में ओरम ने ऐसे नए काम किए, जिनके बारे में दूसरे सोच भी नहीं पाते थे. ऐसा नहीं था कि लोग उनके काम का लोहा नहीं मानते थे. बस उन्हें उनका हक़ देने में कंजूसी करते थे. शायद इसलिए कि संगीत की दुनिया में वो नए विचार एक महिला ला रही थी.

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म्यूज़िक की गॉड मदर

और जिस दौर में ओरम अपने काम का लोहा मनवा रही थी, उस दौर में समाज पर मर्दों का बोलबाला था. शायद इसीलिए उन्हें जीते जीते पहचान नहीं मिल पाई. लेकिन अब ओरम को उनके क़द्रदान मिल गए हैं. इसी महीने 'पीआरएस' फ़ाउंडेशन और 'न्यू बीबीसी रेडियोफोनिक वर्कशॉप' ने उनके नाम से एक अवॉर्ड शुरू किया है.

ऐपल कंपनी ने भी ओरेमिक्स एप लॉन्च किया है. पिछले साल उनकी कंपोज़िशन 'स्टिल प्वाइंट्स' पर भी लंदन के ऑर्केस्ट्रा में परफ़ोर्म किया गया था. यही नहीं डैफ्न की हौसला अफ़ज़ाई वाली बातों को किताब की शक्ल देकर एक कॉफी टेबल बुक तैयार की गई है.

जिस तरह से डैफ्ने ओरम के काम को अब लोगों तक पहुंचाया जा रहा है उसे देखकर कहा जा सकता है कि अब इलेक्ट्रॉनिक म्यूज़िक की गॉड मदर को वो जौहरी मिल गया है, जिसकी उसे ता-उम्र तलाश रही.

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