घर से भागे हुए बच्चों ने देखा था एक नई दुनिया का सपना

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पैसा सब कुछ ख़रीद सकता है!

मगर क्या पैसे से ख़ुशी ख़रीदी जा सकती है? क्या पैसे से सुकून ख़रीदा जा सकता है? क्या पैसे से दिली मोहब्बत ख़रीदी जा सकती है?

बहुत से मां-बाप होते हैं जो अपनी ज़िंदगी में पैसे कमाने में मशगूल होते हैं. वो अपने बच्चों को ढेर सारे खिलौने दिला देते हैं. तमाम तरह की सुख-सुविधाओं का इंतज़ाम कर देते हैं. नए-नए गैजेट्स, मोबाइल, शानदार गाड़ियां वग़ैरह...सामान की उनके बच्चों की कोई कमी नहीं होती. ऐसे बच्चों को कमी खलती है, मां-बाप की. उनकी मोहब्बत की.

ऐसे बहुत से बच्चे होते हैं, जो उकताकर घर छोड़कर भाग जाते हैं. आज तो ये चलन कम है, मगर पिछली सदी के साठ के दशक में एक दौर ऐसा आया था जब पश्चिमी देशों में बड़ी तादाद में बच्चे घर छोड़कर भाग रहे थे. वो उस वक़्त की अपनी दुनिया से उकताए, घबराए और परेशान थे. उन्हें सुकून नहीं था. उन्हें अपनी भी फ़िक्र हो रही थी और दूसरों की भी.

ऐसी ही एक लड़की थी मेलानी को. ब्रिटेन की रहने वाली मेलानी, अपना घर छोड़कर भाग गई थी. जाते हुए उसने अपने मां-बाप के लिए चिट्ठी लिखी थी. इसमें मेलानी ने लिखा था कि उन्होंने उसे तमाम सुख सुविधाएं तो दिला दीं, मगर प्यार नहीं दे सके.

घर से भागने वाले बच्चों का दौर

लंदन की रहने वाली मेलानी साल 1967 में घर छोड़कर भागी थी. वो दौर था घर से भागने वाले बच्चों का.

उसकी कहानी को ब्रिटिश मीडिया में बड़े ज़ोर-शोर से उठाया गया था. इसकी कहानी पढ़कर मशहूर रॉक बैंड द बीटल्स ने मेलानी की कहानी पर एक गाना तैयार किया था, जिसका नाम था-She's Leaving home.

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इस गाने को सर पॉल मैकार्टिनी और जॉन लेनन ने मिलकर तैयार किया था. गाने में मेलानी को और उस जैसे घर छोड़कर भागने वाले तमाम बच्चों का दर्द भी था, तो उनके मां-बाप की तकलीफ़ भी बयां की गई थी.

गाने के बोलों के ज़रिए कहा गया था कि मां-बाप अपने भागने वाले बच्चों के बारे में सोचते हैं कि उन्होंने तो उसे सब सुविधाएं दीं, फिर भी बच्चे उन्हें छोड़कर चले गए.

वहीं घर छोड़कर भागने वाले बच्चों की तरफ से भी गाने में कहा गया था कि वो अपने भीतर कुछ खोया सा, कुछ टूटा सा महसूस करते हैं. उन्हें लगता है कि बरसों से उनका हक़, उनके हिस्से की मोहब्बत छीनी जाती रही है. घर से भागने के बाद मेलानी को ने भी प्रेस को बताया था कि उसके पास वो सब कुछ था जो पैसे से ख़रीदा जा सकता था. हीरे, कपड़े और कार. लेकिन मेलानी के मुताबिक़ उसके मां-बाप ने कभी नहीं कहा कि वो उससे प्यार करते हैं.

ऐसा ही गाना 1966 में साइमन और गारफंकेल ने Richard Cory के नाम से तैयार किया था. इसमें भी पैसे और ख़ुशी के बीच की खाई को बयां किया गया था.

नई दुनिया बसा ली थी

उस दौर में बच्चों के घर छोड़कर भागने के बारे में कैरेन स्टालर ने Runaways के नाम से क़िताब भी लिखी है. कैरेन कहती हैं कि 1967 का साल मुश्किलों वाला था. घरों के आस-पास, मुहल्लों में और पार्क में खेलने वाले बच्चे घर छोड़कर भाग रहे थे. ये हाल सिर्फ़ ब्रिटेन का नहीं था. अटलांटिक पार अमरीका में भी यही हो रहा था.

न्यूयॉर्क के ईस्ट विलेज या सैन फ्रांसिस्को के हैट-ऐशबरी जैसे इलाक़ों में तो घर से भागे बच्चों ने अपना नया आशियाना, अपनी नई दुनिया भी बसा ली थी. उन्होंने 1967 के साल को समर ऑफ़ लव का नाम दिया था.

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क्रांति की पौध

1967 से 1971 के बीच अमरीका में क़रीब पांच लाख लोग अपना घर छोड़कर भागे थे. ये लोग ऐसे समुदाय बनाकर रह रहे थे, जो बाक़ी समाज से अलग था. इसे नए तजुर्बे वाले समुदाय कहा जाता था. हर शहर में ऐसे समुदाय बन गए थे. जैसे सैन फ्रांसिस्को में डिगर्स के नाम से एक ऐसी कम्युनिटी बसी हुई थी.

उस दौर में बच्चों के घर से भागने का आलम ये था मामला अमरीकी संसद तक जा पहुंचा था. संसद ने इस बारे में रनअवे यूथ एक्ट के नाम से 1974 में एक क़ानून भी बनाया था.

ऐसे घर से भागे लोगों का सबसे बड़ा अड्डा अमरीका का सैन फ्रांसिस्को समुदाय था. वहां पर इन भगोड़ों ने तो, सिम्बायोनीज़ लिबरेशन आर्मी के नाम से एक संगठन भी बना लिया था. इन्होंने फरवरी 1974 में बड़े चर्चित हुए पैटी हर्स्ट अपहरण कांड को अंजाम दिया था. पैटी हर्स्ट वहां के बड़े मीडिया परिवार से ताल्लुक़ रखती थी. इस अपहरण कांड और सिम्बायोनीज़ लिबरेशन आर्मी की अमरीका में उस वक़्त बहुत चर्चा हुई थी. बाद में पैटी भी एसएलए का हिस्सा बन गई थी.

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इसी आर्मी की एक सदस्य थी एमिली हैरिस, जो अपना घर छोड़कर भाग आई थी. एमिली ने अपने मां-बाप के बारे में लिखा था कि वो बाक़ी दुनिया के दर्द, ग़रीबों की तकलीफ़ों से अनजान हैं, इसलिए वो घर छोड़कर जा रही है. एमिली ने मां-बाप को चिट्ठी लिखकर बताया था कि वो अपने मां-बाप से प्यार करती है. लेकिन उनके जैसी ज़िंदगी नहीं जी सकती, जहां अपनी भलाई के लिए दूसरों का शोषण होता हो.

समाजवाद और वामपंथ से नाता

एमिली ने अपने मां-बाप को जो चिट्ठी लिखी, उसमें दो पीढ़ियों के बीच का फ़र्क़ साफ़ झलकता है. वो कहती है कि उसका भविष्य उन लोगों के लिए है, जो तकलीफ़ में हैं. वो उनकी मदद करना चाहती है.

घर से भागे ऐसे किशोरों और युवाओं को समाजवादी और वामपंथी रुझान ने अपनी तरफ़ खींचा था. ये एक ऐसी दुनिया का ख़्वाब देखते थे, जहां सबको बराबरी का हक़ हासिल था. लोग समाज की पाबंदियों से आज़ाद थे. जिसके साथ चाहे उसके साथ जिस्मानी ताल्लुक़ बना सकते थे. जिसके साथ दिल चाहे उसके साथ रह सकते थे. ये लोग पूंजीवादी समाज के विरोधी थे. इनका कहना था कि पूंजीवादी लोग, दूसरों का शोषण करके अपनी तिजोरियां भरते हैं. ये घर से भागे युवा, धार्मिक पाबंदियों को भी नहीं मानते थे.

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Image caption 1973 में बनी फ़िल्म द विकर मैन का एक दृश्य.

असल में पूंजीवाद जब से पश्चिमी जगत पर हावी हुआ था, तब से लोगों को तमाम तरह के नियम और क़ायदे के दायरे में रहने को कहा गया. युवाओं की ये बग़ावत इन्हीं सामाजिक बंदिशों के ख़िलाफ़ थी. ये लोग सिर्फ़ एक शख़्स से शादी करके उसके साथ पूरी ज़िंदगी बिताने को राज़ी नहीं थे. ये समाज की दूसरी पाबंदियों के भी कायल नहीं थे. उन्हें उस दौर की नैतिकता के पैमाने भी पसंद नहीं आते थे. ऐसे लोगों को 1973 में बनी फ़िल्म द विकर मैन में बख़ूबी दिखाया गया था.

उस दौर में घर से भागे ये लोग उस वक़्त के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने से उकताए हुए थे. वो नई दुनिया बसाना चाहते थे.

शोषण का नया चक्र

लेकिन जल्द ही इनकी पाबंदियों से आज़ाद दुनिया में भी हंगामे खड़े होने लगे. महिलाओं को लगा कि समाज में रहते हुए जहां वो किसी एक के साथ सोने को मजबूर थीं, वहीं इस नई दुनिया में आने पर तो हर ताक़तवर मर्द उनके साथ हमबिस्तर होना चाहता था. समाजवाद के नाम पर उन्हें इसके लिए हामी भरनी पड़ती थी. यानी शोषण का ये एक नया चक्र शुरू हो गया था.

इस मोहभंग का नतीजा ये हुआ कि बहुत जल्द ही डिगर्स और सिम्बायोनीज़ लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन ख़ुद ब ख़ुद ख़त्म हो गए. लेकिन उनके ख़याल, उनके सिद्धांत आज भी ज़िंदा हैं.

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Image caption बकमिंस्टर फुलर ने बग़ावती तेवरों वाले युवाओं के ख़याल से मेल खाता हुआ घर डिजाइन किया था.

2016 में गूगल और एपल कंपनियों ने अपने ऐसे मुख्यालय बनाने का एलान किया, जो सत्तर के दशक के इन बग़ावती तेवरों वाले युवाओं के ख़याल से मेल खाता है. इसकी कल्पना भी 1968-1971 के दौरान स्टीवर्ट ब्रांड के लिखे लेखों में की गई थी. स्टीव जॉब्स ने स्टीवर्ट के कैटेलॉग को गूगल का पेपरबैक संस्करण कहा था.

गूगल और ऐपल के डिज़ाइन से इतर अगर आज हम 1967 के घर से भागने वाले बच्चों के आज पर नज़र डालें, तो वो सारे ख़्वाब हवा हो चुके हैं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो ख़ुद मेलानी को हैं, जिनके घर से भागने से ये चलन शुरू हुआ था. मेलानी आज शादीशुदा ज़िंदगी बिता रही हैं. वो दो बच्चों की मां हैं और एक रियल एस्टेट कंपनी चलाती हैं.

यानी पचास साल बाद वक़्त से एक चक्र पूरा कर लिया है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)

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