शार्क ख़ौफ़ का दूसरा नाम क्यों?

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समंदर में लाखों तरह के जीव रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर हमें दिलकश लगते हैं. जैसे व्हेल दुनिया का सबसे विशाल जीव होने के बावजूद हमें डराती नहीं. इसी तरह डॉल्फ़िन, जो सबसे प्यारी और इंसान की दोस्त है.

मगर जैसे ही ज़ेहन में शार्क का ख़याल आता है सिहरन सी होने लगती है. ज़ेहन में तस्वीर बनती है एक लंबी चौड़ी, जबड़ा खोले हुए, पैने, नुकीले दांत वाली मछली की. जो पलभर में किसी को भी चीर फाड़ दे. शार्क ख़ौफ़ का दूसरा नाम मानी जाती है.

हाल ही में शार्क की एक तस्वीर ने सोशल मीडिया पर खूब सुर्ख़ियां बटोरीं. उस पर चर्चा भी ख़ूब हुई. ये फ़ोटो ली थी अंडर वॉटर फ़ोटोग्राफ़र तान्या हूपरमेंस ने.

इस फ़ोटो में वो लम्हा क़ैद है जब एक शार्क छोटी-बड़ी कई तरह की मछलियों के झुंड को चीरते हुए आगे निकलती दिख रही है.

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लोगों का डर

ये मंज़र बेहद ख़ौफ़नाक है. किस तरह शार्क दहशत फैलाती है, वो डर इस तस्वीर से साफ़ ज़ाहिर होता है. कैसे मछलियों के झुंड में शार्क के आने से हड़कंप मच जाता है. वो ये तस्वीर बख़ूबी दिखा रही है.

दरअसल समुद्र में जब छोटी मछलियों को किसी बड़ी मछली या किसी दूसरे जानवर से ख़तरा होता है तो वो मिलकर एक घेरा बना लेती हैं.

इस घेरे को ही 'बेट बॉल' कहा जाता है. गुमान होता है कि ये कोई बड़ा पत्थर या चट्टान है. इस तरह छोटी मछलियां ख़ुद की हिफ़ाज़त करती हैं.

लेकिन इस फ़ोटो में शार्क उस घेरे को भेदते हुए आगे निकल जाती है. इस फ़ोटो के वायरल होने से पहले तक शार्क को लेकर दिल में ख़ौफ़ बना हुआ था. लेकिन जब इंटरनेट पर इस फ़ोटो ने धमाल मचाया तो कुछ हद तक शार्क को लेकर लोगों का डर कम हुआ.

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हॉलीवुड मूवी

तस्वीरें हों या पेंटिंग्स, शार्क को हमेशा ख़ौफ़ पैदा करते हुए ही दिखाया गया है. फ़िल्मों में भी शार्क हमेशा एक विलेन के तौर पर पेश की गई गई. अक्सर इंसान के डर का भाव कला में उकेरते वक़्त शार्क के तौर पर दिखाया गया है.

आपको स्पीलबर्ग की नामी फ़िल्मों में से एक फ़िल्म 'द जॉस' तो याद ही होगी. शार्क की खूंख़ारी को जिस बेहतरीन अंदाज़ में स्पीलबर्ग ने पेश किया है उसी से अंदाज़ा हो जाता है कि शार्क कितनी ख़तरनाक हो सकती है.

शार्क को लेकर कुछ इसी तरह का काम साल 1992 में एक ब्रिटिश फ़नकार डैमियन हर्स्ट ने पेश किया था. डैमियन ने जबड़ा खोले शिकार पर हमला करती हुई शार्क का हूबहू पुतला लोगों के सामने पेश कर दिया था. शार्क की ये तस्वीर जो भी देखाता है ख़ौफ़ज़दा हो जाता है.

शार्क से सामना होने का मतलब है मौत से सामना. मौते के ख़ौफ़ के इसी पल को अठारहवीं सदी में ब्रिटिश-अमरीकी पेंटर जॉन सिंग्लटन कॉप्ले ने कैनवस पर उतारा था.

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ख़ूंखारी की कला

बात 1779 की है क्यूबा के हवाना हार्बर पर 14 साल के एक लड़के का सामना शार्क से हुआ था. टाइगर शार्क ने इस लड़के की टांग पर हमला कर दिया था. इस हमले में ख़ुद को बचाने की जो जद्दोजहद हुई, उसे 30 साल बाद कैप्ले ने कैनवास पर उतारा.

इस पेंटिंग में दिखाया गया है कि कैसे शार्क लड़के को अपने जबड़े में दबा रही है और नाव पर सवार दूसरे लड़के भाले से शार्क पर हमला कर रहे हैं. शार्क का शिकार हुए लड़के और उसे बचाने वालों के चेहरे पर जो ख़ौफ़ था उसे ही इस पेंटिंग में दिखाने की कोशिश की गई है.

इस पेंटिंग ने ही शार्क को हमारे ज़हन में आदि शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया. इसके बाद से ही शार्क की खूंख़ारी को कला में जगह दी जाने लगी.

वैसे शार्क की अठारहवीं सदी में बनी ये पेंटिंग इंसान के डर के भाव को दिखाने की अच्छी मिसाल है.

ये कुछ उसी सिलसिले की शुरुआत लगती है जिसे फ्रांसिस बेकन ने अपनी मशहूर पेटिंग्स चीखते हुए पोप में आगे बढ़ाया था. डर को पेंटिंग में ज़ाहिर करने की एक और मिसाल एडवर्ड मंच की 'द स्क्रीम' सीरीज़ की पेंटिंग्स रही हैं.

उसी कड़ी में तान्या हूपरमैंस की ली हुई तस्वीर भी शामिल हो गई है.

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