जब समलैंगिकों ने बना ली थी अपनी भाषा

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Image caption हास्य पोलारी भाषा का प्रमुख हिस्सा था

सेक्स, क़ुदरती और जिस्मानी ज़रूरत है. ये नस्ल बढ़ाने का भी ज़रिया है. हम यही समझते आए हैं कि इंसानी नस्ल बढ़ाने के लिए मर्द और औरत के बीच ही यौन संबंध होना चाहिए. इसके इतर अगर कोई जिस्मानी रिश्ता बनाता है तो वो जुर्म हो जाता है. समाज उन्हें मुजरिम मान बैठता है. समलैंगिकता भी क़ुदरत ही की देन है. लेकिन समाज की नज़र में अपराध है.

इंसान अपनी बहुत-सी ख़्वाहिशों का गला घोंट सकता है. कुछ हद तक अपने आप पर नियंत्रण भी रख सकता है. लेकिन सेक्स जैसी शरीर की कुछ ऐसी क़ुदरती ज़रूरतें, जिन पर वो चाह कर भी क़ाबू नहीं रख सकता. समलैंगिकता भी उसी में से एक है. एक-दूसरे के लिए उनके जज़्बात और ख़्वाहिशें भी ऐसी ही होती हैं, जैसी किसी मर्द और औरत की एक दूसरे के लिए होती है.

वो चाहकर भी अपने विपरीत लिंग की ओर आकर्षित नहीं हो सकते. अब ऐसे में वो ख़ुद क्या करें.

बीसवीं सदी की शुरुआत तक ज़्यादातर यूरोपीय देशों में समलैंगिकता जुर्म थी. अब एक तरफ़ तो ये जुर्म था. वहीं दूसरी तरफ़ समलैंगिकों के लिए क़ुदरती ज़रूरत. ऐसे में ब्रिटेन में समलैंगिकों ने समाज की नज़रों से छुप-छुपाकर संवाद का एक दिलचस्प ज़रिया तलाश लिया था.

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Image caption पोलारी थी गुप्त भाषा

भाषा का नाम था 'पोलारी'

इसके लिए उन्होंने एक नई भाषा ईजाद कर ली. इस भाषा को सिर्फ़ समलैंगिक संबंधों की ख़्वाहिश रखने वाले ही समझ पाते थे.

इस भाषा का नाम था 'पोलारी'. ये ठीक वैसा ही था जैसे ठग, चोर या अंडरवर्ल्ड के लोग अपनी अलग भाषा बोलते हैं.

जानकारों का कहना है कि पोलारी भाषा अपने आप में बहुत ताक़तवर थी. इस भाषा में ऐसे शब्दों का प्रयोग होता था जिनके ज़रिए मौक़े के मुताबिक़ पहचान को छुपाया या बताया जा सकता था.

हालांकि, आज इस ज़बान का इस्तेमाल बहुत कम है, लेकिन जिस ज़माने में ब्रिटेन में समलैंगिकता अपराध थी तब पोलारी ही उन्हें आज़ादी का एहसास कराती थी.

पोलारी ज़बान समाज के उस तबक़े में बोली जाती थी, जिसकी कोई इज़्ज़त नहीं थी. इसीलिए ज़बान के एतबार से इसकी अहमियत भी नहीं रही. भाषाओं को संजोने वालों ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया. नतीजा ये हुआ कि ये ज़बान व्यापक तौर पर बोले जाने के बावजूद लिखी नहीं गई. और इस भाषा का मज़बूत व्याकरण तैयार नहीं हो पाया.

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Image caption संगीत हॉलों में इस्तेमाल होने लगी थी भाषा

कई शब्दों की नहीं सुलझी गुत्थी

भाषाओं के ब्रिटिश इतिहासकार और जानकार पॉल बेकर का कहना है कि ये भाषा कई रूपों में मौजूद थी. लेकिन समाज के इज़्ज़तदार लोगों ने इसकी अनदेखी की. जिसकी वजह से इसकी नोंक-पलकें ठीक नहीं हो सकीं.

पॉल बेकर ने पोलारी भाषा पर बहुत काम किया है. इसके बावजूक वो पोलारी भाषा की बहुत से शब्दों की गुत्थी को सुलझा नहीं पाए. चूंकि ये ज़बान समाज के उस तबक़े में बोली जाती थी, जिसकी आवाज़ को हमेशा दबाया जाता था. लिहाज़ा इसका कोई पुख़्ता रिकॉर्ड भी नहीं रहता था. पकड़े जाने के डर से इस ज़बान के बोलने वाले इसे लिखने से बचते थे. सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की अदायगी भर से ही काम चला लेते थे.

मिसाल के लिए 'बोना' शब्द का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता था. इसका मतलब था 'दिलकश'. इस शब्द को सबसे पहले अठारहवीं सदी में शेक्सपियर के नाटक हेनरी फोर्थ पार्ट टू में रिकॉर्ड किया गया.

इसी तरह नाच गाकर अपना गुज़ारा करने वालों, वेश्याओं, सर्कस और तमाशा करने वालों के बीच 'पार्लर' शब्द का इस्तेमाल ख़ूब होता था, जिसका मतलब है बात करना. ये शब्द इतालवी ज़बान से लिया गया है. इसी तरह और भी शब्द थे जो दूसरे भाषाओं से निकलकर पोलारी का हिस्सा बने थे.

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Image caption 1967 में समलैंगिकता के ख़िलाफ़ ब्रिटेन में आया था कानून

कई मानते हैं इसे भाषा-विरोधी

अठारहवीं सदी तक ब्रिटेन में ऐसे शब्द सिर्फ़ समाज के पिछड़े तबक़े में ही बोले जाते थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में जब संगीत हॉलों में इसका इस्तेमाल होने लगा, तो समलैंगिकों ने भी इसे अपनी बोल-चाल का हिस्सा बना लिया. भाषा के कुछ जानकार पोलारी को भाषा-विरोधी मानते हैं. उनका मानना है कि ज़बान आसान और सादा होनी चाहिए. असली भाषा वही है जिसे हर कोई समझ सके.

लेकिन, प्रशासन के डर से पोलारी बोलने वालों ने इसमें इतने मुश्किल शब्द शामिल कर लिए कि उन्हें समझ पाना हरेक के बस की बात नहीं थी.

पोलारी की एक ख़ूबी ये भी थी कि इसमें हास्य रस शामिल था. समलैंगिक इंसान एक-दूसरे को हंसाने के लिए इसका ख़ूब इस्तेमाल करते थे. आम ज़बान में जिस शब्द का मतलब गंभीर होता था, पोलारी में उसी शब्द का मतलब मज़ाहिया होता था.

ब्रिटेन में यौन अपराध से जुड़ा क़ानून बनने से पहले तक माना जाता था कि पोलारी बोलने वाले ख़ुद को इस भाषा के बूते ही मज़बूत करते थे. उन्हें लगता था कि उनकी ज़बान चूंकि दूसरे नहीं समझ पाते हैं, लिहाज़ा ये भाषा उन्हें डर के माहौल में निडर होकर जीने का मौक़ा देती है. कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि पोलारी ना सिर्फ़ ख़ुफ़िया भाषा होती थी बल्कि दुनिया को एक अलग नज़रिए से देखने का मौक़ा भी देती थी.

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Image caption दुष्प्रचार के ख़िलाफ़ भाषा को रणनीति माना गया

भारतीय समाज में था खुलापन

समलैंगिक होना या न होना किसी की पसंद नहीं हो सकता. लेकिन हैरत की बात है कि ख़ुद को तरक़्क़ीपसंद कहने वालों ने ही इसे जुर्म समझा. शायद इसलिए कि उनके मज़हब में इसकी गुंजाइश नहीं है. लेकिन समलैंगिक होने की ख़्वाहिश भी तो कुदरती है.

समलैंगिकता को लेकर प्राचीन भारतीय समाज में काफ़ी खुलापन था. प्राचीन भारत में इसे जुर्म नहीं माना जाता था. लेकिन जब अंग्रेज़ों ने भारत पर अपना राज क़ायम किया तो उन्होंने अपने समाज की सोच यहां पर थोप दी. अंग्रेज़ों के ज़माने का क़ानून ही आज भी भारत में समलैंगिकता को जुर्म बताता है. हालांकि, अब यहां बहुत हद तक इस क़ानून को ख़त्म करने पर सहमति बन गई है.

बहरहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि पाबंदियों ने ब्रिटेन एक नई ज़बान के पनपने कि लिए माहौल तैयार किया. अगर थोड़ी ढील मिली होती तो शायद पोलारी भी किसी भी अन्य भाषाओं की तरह विकसित हुई होती. और दुनिया एक नई भाषा बोल रही होती.

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