वो जगह जहां अब तक 1000 जहाज़ डूब गए

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समंदर में कुछ ठिकाने बेहद ख़तरनाक होते हैं, जहां जहाज़ बार-बार हादसे के शिकार होते हैं. ऐसी जगहों को जहाज़ों की क़ब्रगाह कहा जाता है. जैसे कैरेबियन सागर में बरमूडा ट्रायंगल. जहां पर कई जहाज़ रहस्यमयी तरीक़े से लापता हो गए.

मगर, क्या आपको पता है कि समंदर में जहाज़ों की सबसे बड़ी क़ब्रगाह कहां है?

आपको लगेगा कि बरमूडा ट्रायंगल या फिर गहरे समंदर में कोई ऐसी जगह होगी जहां सबसे ज़्यादा जहाज़ डूबे होंगे. लेकिन आप ग़लत हैं. समंदर में जहाज़ों की जो सबसे बड़ी क़ब्रगाह है वो कोई गहरा समुद्री ठिकाना नहीं. वो तो बेहद उथली और तट के क़रीब की जगह है.

ये ठिकाना है, पूर्वी इंग्लैंड के शहर केंट के क़रीब स्थित गुडविन सैंड्स. यूरोप के सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक डोवर के पास है गुडविन सैंड्स. ये समुद्री किनारे पर स्थित उथली सी जगह है, जहां अक्सर लहरें आकर रेत को डुबो जाती हैं. फिर जब लहरें पीछे हटती हैं तो दलदली इलाक़ा समंदर के बीच से झांकता नज़र आता है. लहरों के हटते ही यहां पर कौड़ियां, रेत वाली ईल और केकड़े खेलते-कूदते नज़र आते हैं.

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क़रीब दस मील में फैला ये इलाक़ा मैरीन कंज़रवेशन ज़ोन के तौर पर घोषित करने की मांग हो रही है. यहां पर समंदर में रहने वाले तमाम तरह के जीव-जंतु मिलते हैं. ये इलाक़ा समुद्र तट को कटाव से बचाता है.

अब डोवर बंदरहगाह का प्रशासन, पोर्ट का दायरा बढ़ाने के लिए गुडविन सैंड्स की खुदाई करने का इरादा बना रहा है. पोर्ट बोर्ड चाहता है कि वो गुडविन सैंड्स से 25 लाख टन बालू निकालकर इसे और गहरा करे.

बहुत से लोग इसका विरोध कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि इससे पर्यावरण को भारी नुक़सान पहुंचेगा.

मगर, इसकी एक वजह और भी है. गुडविन सैंड्स के दामन में डूबे पड़े हैं सैकड़ों जहाज़, जो यहां अचानक आए तूफ़ान का शिकार हुए या किसी और वजह से डूब गए. कहते हैं कि ये इलाक़ा इंग्लिश चैनल का सबसे ख़तरनाक ठिकाना है. ख़ास तौर से जब तूफ़ान आते हैं. नवंबर 1703 में यहां आए भयंकर तूफ़ान में 1000 मछुआरे मारे गए थे.

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उस रात डूबे जहाज़ों में एक था एचएमएस स्टर्लिंग कैसल, जिसका मलबा 1979 में तलाशा गया था. हालांकि 1908 में इसे संरक्षित जगह घोषित कर दिया गया था ताकि लोग मलबे से लूट-पाट न करें.

1703 के तूफ़ान के बाद 24 जनवरी 1809 को ईस्ट इंडिया कंपनी का जहाज़ एडमिरल गार्डनर, मद्रास के लिए रवाना हुआ था. जहाज़ पर लोहा, तोपें और कंपनी के 48 टन सिक्के लदे हुए थे. इन सिक्कों को कंपनी के कर्मचारियों को तनख़्वाह के तौर पर दिया जाना था.

लेकिन जैसे ही जहाज़ केंट के तट से रवाना हुआ तूफ़ानी हवाओं ने जहाज़ को ऐसे थपेड़े लगाए कि जहाज़ डूब गया. कहते हैं कि गुडविन सैंड्स के तले में हज़ार से ज़्यादा डूबे जहाज़ों का मलबा पड़ा है. कुछ लोग ये आंकड़ा दो हज़ार से भी ऊपर का बताते हैं.

जब 1979 में डोवर बंदरगाह के लिए गुडविन सैंड्स की खुदाई की गई थी, तो ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज़ के साथ क़रीब दस लाख सिक्के निकाले गए थे.

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अब खुदाई का प्लान बना रहे डोवर हार्बर बोर्ड का दावा है कि जहाज़ों के मलबे से कोई छेड़ख़ानी नहीं होगी. वो तो गुडविन सैंड्स के पूरे इलाक़े के चौथाई फ़ीसद से भी कम हिस्से में खुदाई करके बालू निकालेंगे.

बोर्ड के प्रवक्ता एंथनी ग्रीनवुड कहते हैं कि जिन ठिकानों को ऐतिहासिक रूप से अहम जगह का दर्जा मिला है, उनकी पूरी सुरक्षा होगी.

वहीं गुडविन सैंड्स में खुदाई के विरोधी कहते हैं कि पूरा इलाक़ा एक है, इसे टुकड़ों में बांटकर देखना ठीक नहीं. वो कहते हैं कि जैसे ही एक जगह से बालू की खुदाई होगी, दूसरी जगह का बालू उस गड्ढे को भरने लगेगा. इससे समुद्री जीव-जंतुओं को नुक़सान होगा.

वहीं एंथनी ग्रीनवुड कहते हैं कि इस इलाक़े में सत्तर और नब्बे के दशक में भी खुदाई की गई थी. इससे तो कोई नुक़सान नहीं हुआ था. हालांकि न तो खुदाई के पहले और न ही बाद में इससे हुए नुक़सान की कोई पड़ताल की गई थी.

पर्यावरण के हामी लोग कहते हैं कि खुदाई से समुद्री माहौल पर बुरा असर पड़ेगा. यहां के जीव-जंतुओं का नुक़सान होगा. खुदाई से तटीय इलाक़ों को समुद्र से ख़तरा बढ़ जाएगा.

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हालांकि सिर्फ़ इस तर्क के आधार पर खुदाई की इजाज़त नहीं मिलेगी, ये कहना ज़रा मुश्किल है. हां एक और वजह हो सकती है जिसे बुनियाद बनाकर, गुडविन सैंड्स में खुदाई को रोका जा सकता है.

यहां पर बहुत सारे विमान भी डूबे हुए हैं. इनमें से साठ तो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ही या तो हादसे का शिकार हुए थे या फिर मार गिराए गए थे. इनमें सवार लोग भी मारे गए थे. 2013 में ही एक जर्मन लड़ाकू जहाज़ को समुद्र के भीतर से निकाला गया था.

केंट म्यूज़ियम के डेविड ब्रोकेलहर्स्ट का दावा है कि गुडविन सैंड्स के भीतर सौ से ज़्यादा विमानों के मलबे और पचास से ज़्यादा लोगों के शव पड़े हुए हैं. इन्हें बचाए जाने की ज़रूरत है. ब्रिटेन के प्रोटेक्शन ऑफ़ मिलिट्री रिमेंस एक्ट 1986 के मुताबिक़ किसी जंगी मलबे से छेड़ख़ानी नहीं की जा सकती.

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हालांकि डोवर पोर्ट बोर्ड के ग्रीनवुड कहते हैं कि वो जानकारों की निगरानी में गुडविन सैंड्स की खुदाई कराएंगे. लेकिन, फ़िक्रमंद लोगों को इस भरोसे पर ऐतबार नहीं. उन्हें लगता है कि एक बार इस इलाक़े से रेत निकालने का काम शुरू हुआ तो एक्सपर्ट सिर्फ़ तबाही के तमाशबीन बनकर रह जाएंगे.

अब दोनों पक्षों के तर्क सुनकर ब्रिटेन का मरीन मैनेजमेंट ऑर्गेनाइज़ेशन ये तय करेगा कि गुडविन सैंड्स की खुदाई की इजाज़त दी जाए या नहीं.

ये भी हो सकता है कि खुदाई से गुडविन सैंड्स को कोई नुक़सान हो ही न. लेकिन, अगर नुक़सान का डर है तो सवाल ये है कि समुद्र में दफ़न लोगों को उनके हाल पर छोड़ना ही बेहतर होगा या नहीं?

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