बढ़ती गर्मी की वजह से हो रही है गुर्दे की गंभीर बीमारी

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सारी दुनिया में हंगामा बरपा है कि धरती की आबो-हवा बदल रही है. जलवायु परिवर्तन बहुत तेज़ी से हो रहा है. इसके असर से समंदर में पानी बढ़ रहा है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं. नदियां सूख रही हैं. गर्मी बढ़ रही है. मॉनसून कमज़ोर होता जा रहा है. फ़सलें बर्बाद हो रही हैं. वग़ैरा...वग़ैरा...

यूं तो इसका असर सभी पर पड़ रहा है, लेकिन ग़रीब तबक़े को तो आबो-हवा का ये बदलाव किसी ज़हरीले नाग की तरह डस रहा है. एक नई रिसर्च से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन से कई इलाक़ों में लोग डिहाइड्रेशन से बीमार हो रहे हैं.

मध्य अमरीकी देश अल साल्वाडोर में बहुत से लोग गुर्दे की बीमारी के शिकार हो रहे हैं. इस बीमारी के ज़्यादातर मरीज़ ग़रीब मज़दूर हैं जो तपती धूप में सारा दिन मज़दूरी करके अपना पेट पालते हैं. आखिर इसकी वजह क्या है?

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एक रिपोर्ट के मुताबिक़ अल साल्वाडोर के बाजो लेंपा इलाक़े के क़रीब 25 फ़ीसद लोगों को गुर्दो की बीमारी है. आम तौर पर माना जाता है कि शुगर, हाईपरटेंशन, जैसी बीमारियां गुर्दों के ख़राब होने की बड़ी वजह हैं. लेकिन कई केस में बीमारी की वजह पता ही नहीं चलती. क्योंकि मरीज़ में ऐसा कोई लक्षण नज़र ही नहीं आता.

पानी की कमी से संकट

लेकिन अल साल्वाडोर में हुई रिसर्च के ज़रिए वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ये बीमारी ज़्यादातर उन मर्दों को होती है जो भयानक गर्मी और उमस भरे माहौल में काम करते हैं- जैसे मछुआरे, किसान और मज़दूर. ज़्यादा गर्मी में काम करने की वजह से इनके बदन में पानी की कमी हो जाती है.

इसका असर गुर्दों पर पड़ता है. अब वैज्ञानिक इस बात को लेकर ज़्यादा फ़िक्रमंद हैं कि क्या ये लोग दुनिया में बढ़ती गर्मी की वजह से गुर्दे की बीमारी के शिकार हो रहे हैं. अगर ऐसा है तो, क्या ये बीमारी सारी दुनिया में महामारी की शक्ल अख़्तियार कर लेगी?

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अल साल्वाडोर की राजधानी सैन साल्वाडोर के एक अस्पताल में दाख़िल ज़्यादातर मरीज़ों की यही कहानी है. अस्पताल के डॉक्टर रोमन गार्सिया त्रेबानिनो इसे क़ुदरत का किया सामूहिक हत्या कांड की संज्ञा देते हैं. वो बताते हैं कि अस्पताल में गुर्दे की बीमारी के इतने मरीज़ आ रहे हैं कि उनके लिए अस्पताल में जगह ही नहीं.

साल्वाडोर दुनिया का सबसे छोटा देश है और इसकी सरहदों पर ज़्यादातर साहिली इलाक़े हैं. इसके अलावा अल साल्वाडोर में 23 ज्वालामुखी हैं. इनसे निकले लावे और राख की वजह से यहां की ज़मीन काफ़ी उपजाऊ है. जिसकी वजह से यहां खेती बाड़ी की संभावनाएं भी ज़्यादा हैं. इसीलिए यहां के लोग काश्तकारी पर निर्भर रहते हैं.

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अल साल्वाडोर में कई ज्वालामुखी भी हैं. यहां भूकंप भी आते रहते हैं. यानी यहां के बाशिंदों को ख़तरों के बीच रहने की आदत है.

मगर क़ुदरत उनके लिए एक नई चुनौती खड़ी कर रही है, इसका इन्हें अंदाज़ा नहीं था. क्योंकि गुर्दे की बीमारी के शिकार ज़्यादातर लोगों को शुरू में ये पता ही नहीं चला कि वो बीमार हैं. वो थकान, बुखार, बदन में ऐंठन जैसी शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने के आदी थे. बुजुर्ग हों या युवा या फिर बच्चे.

हर किसी को ऐसी शिकायत हो, तो वो ये समझते थे कि मामूली दिक़्क़त है, अपने आप दूर हो जाएगी. मगर, हालत बिगड़ने पर जब वो अस्पताल पहुंचते, तो हालात हाथ से निकल चुके होते.

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डॉक्टर गार्सिया त्रेबानिनो बताते हैं कि ज़्यादातर मरीज़ ख़ुद को बचा पाने में नाकाम रहे. उनका कहना है उनके अस्पताल में कई बार तो किडनी की बीमारी वाले इतने मरीज़ आ जाते थे कि बिस्तर कम पड़ जाते थे. अस्पताल के गलियारों में मरीज़ों का इलाज होता है.

गंभीर बीमारी ये है

उनके पास डायलेसिस की भी बहुत अच्छी सुविधा नहीं थी. लेकिन जो भी साधन उपलब्ध थे, उनका इस्तेमाल करके वो मरीज़ को एक महीने से ज़्यादा ज़िंदा नहीं रख पाते थे. लेकिन कोई भी इस तरफ़ ध्यान नहीं दे रहा था कि आखिर इस बीमारी की वजह क्या है और इससे बचने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं.

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दरअसल इस बीमारी में गुर्दे के टिश्यू नष्ट होने लगते हैं और वो खून को छान नहीं पाते. इससे ब्लड प्रेशर चाप बढ़ने लगता है. इसलिए फ़ौरन डायलेसिस की ज़रूरत होती है. चूंकि इस बीमारी का शिकार बड़े पैमाने पर मजदूरों के अलावा किसान होते हैं. लिहाज़ा डॉक्टरों को लगा कि शायद इसकी वजह कीटनाशक और दूसरे केमिकल हों.

इस बीमारी की वजह तलाशने के लिए स्पेन के एक डॉक्टर ने दक्षिण अमेरिका से लेकर मध्य अमेरिका तक का सफ़र किया. इस दौरान उसने रास्ते में मिले किसानों और मज़दूरों के यूरिन के सैंपल लिए. जो तेज़ खुली धूप अक्सर काम करते थे. इस तजुर्बे में पता चला कि सिर्फ अल साल्वाडोर ही नहीं, कई और देशों के लोग भी किडनी की इस बीमारी से जूझ रहे थे.

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अमरीका के कोलोराडो के किडनी स्पेशलिस्ट डॉक्टर रिचर्ड जे. जॉनसन ने 2011 में किडनी की बीमारी पर कनाडा में एक कांफ्रेंस की थी. इसी में उन्हें मध्य अमरीकी देशों में फैल रही गुर्दे की इस रहस्यमय बीमारी के बारे में पता चला.

उनके साथ तमाम और जानकारों ने इसका राज़ समझने की कोशिश की. इन सबने अपनी पड़ताल में पाया कि जब लोग शुगर फ्रुक्टोज का इस्तेमाल करते हैं तो लीवर को इसे पचाने में ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है और वो गुर्दों में जम जाता है. इससे यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है. इसके अलावा कम पानी से सबसे ज़्यादा नुक़सान होता है.

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पानी की कमी के चलते कई ज़हरीले केमिकल यानी टॉक्सिन्स शरीर से बाहर नहीं निकल पाते. वो अंदर ही अंदर गुर्दों पर असर डालते रहते हैं. रिसर्च में पाया गया कि पीड़ित किसानों के मूत्र के नमूनों में सुबह के समय यूरिक एसिड बनना शुरू होता है और सारा दिन बढ़ता चला जाता है. और जब ये मात्रा बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है तो गुर्दों पर अपना असर शुरू कर देती है. इसके अलावा जब गर्मी में पानी की कमी को पूरा करने के लिए सॉफ्ट ड्रिंक और सोडा जैसी चीज़ों का सेवन करते हैं. इससे भी गुर्दों पर असर पड़ता है.

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अल साल्वाडोर के एक्सपर्ट इमैनुअल जारचिन ने यहां के लोगों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर की पड़ताल की है. वो बताते हैं कि अल साल्वाडोर में गर्मी लगातार बढ़ रही है. सर्दियों के दिन कम हो गए हैं. इसका असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है.

जलवायु परिवर्तन है वजह

जलवायु परिवर्तन पर 2016 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ बढ़ती गर्मी कई तरह से सेहत पर असर डाल सकती है. गुर्दे इस का सबसे पहला शिकार बन रहे हैं. गुर्दों की इस ख़तरनाक बीमारी को रिसर्चर 'क्लाइमेट सेंसिटिव' की फ़ेहरिस्त में रखते हैं. वो कहते हैं कि जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ता जाएगा वैसे वैसे 'क्लाइमेट सेंसिटिव' बीमारियां भी बढ़ती जाएंगी. और इसका शिकार सबसे पहले और सबसे ज़्यादा ग़रीब तबक़े के लोग ही होंगे.

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ये तो साफ़ है कि अमीर देश और अमीर लोग ही जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं. लिहाज़ा अब ये उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि पर्यावरण की सुरक्षा में वो अपना सहयोग दें और इसे बचाने की कोशिश करें. वरना वो दिन दूर नहीं जब घातक बीमारियों से लड़ने की इंसान की ताक़त बेहद कमज़ोर हो जाएगी. हमें अपनी ताक़त ऐसी रहस्यमयी बीमारियों से जूझने में लगानी होगी.

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फिलहाल तो अल साल्वाडोर जैसे देश ही इसका शिकार हो रहे हैं. मगर आने वाले वक़्त में इसका दायरा बढ़ सकता है. यानी हमें वक़्त रहते सावधान होकर, ग़लतियां सुधारनी चाहिए.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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