सेकेंडों में फ़ारिग हो जाते हैं जानवर, इंसानों को इतना वक्त क्यों?

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पेट का मसला दुनिया का सबसे बड़ा मसला है.

पेट साफ़ नहीं हुआ. क़ब्ज़ हो गई. या पेट कुछ ज़्यादा ही साफ़ हो गया. पेट पानी हो गया, यानी दस्त होने लगे.

चौपालों की गप-शप हो, या फिर दफ़्तर की खुसर-पुसर. पेट को लेकर चर्चा ज़रूर होती है.

कोई साहब पेट सहलाते हुए कहते हैं कि आज वो हल्का महसूस कर रहे हैं. तो, किसी के चेहरे की ऐंठन बताती है कि आज हाजत रफ़ा करने में उन्हें दिक़्क़त पेश आई.

मरहूम ख़ुशवंत सिंह की तो कोई क़िताब, कोई उपन्यास बिना पेट की दिक़्क़त के ज़िक्र के पूरा ही न हुआ. उन्होंने लंबी उम्र का राज़ यही बताया था कि पेट साफ़ रहना चाहिए. न क़ब्ज़ हो. न दस्त हों.

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Image caption डायपर

पेट की शिकायत लेकर डॉक्टर के यहां जाएं तो वो भी पूछते हैं कि कैसा हुआ? आप बात करने में भले ही असहज महसूस करें, मगर वो आपके मल के रंग-रूप के बारे में इतनी तफ़्सील से सवाल करेंगे, मानो बेटे का ब्याह करने के लिए लड़की तलाश रहे हैं. सख़्त था या पतला? पानी जैसा या फिर ठोस? रंग कैसा था? वग़ैरह...वग़ैरह...

कुल मिलाकर साहब, ये मसला-ए-पॉटी ऐसा मसला है, जो ठीक से न हो तो परेशानी. कुछ ज़्यादा हो जाए तो परेशानी.

और जो इसमें हम साइंस और गणित के नियम जोड़ दें, तो बात और दिलचस्प हो जाती है. मसलन आकार, रंग-रूप और हाजत की रफ़्तार. भई, ये सारे मामले गणित और विज्ञान के असूलों के पैमाने पर ही तो कसे जाएंगे!

और पॉटी की इतनी चर्चा, उसके रंग-रूप में इतनी दिलचस्पी कोई नई बात नहीं. ये हिसाब-क़िताब तो सदियों से लगाया जा रहा है. प्राचीन काल में चीन में तो लोगों की सेहत का हिसाब-क़िताब उसके मल से लगाया जाता था. मिस्र और यूनानी सभ्यताओं में भी इसकी अलग से पढ़ाई होती थी. जिसमें लोगों की हाजत का हिसाब-क़िताब लगाकर उसकी सेहत के बारे में फ़ैसला किया जाता था. और अपने यहां का तो हाल हमने बता ही दिया कि किस तरह पेट की चर्चा हर नुक्कड़ पर होती पाई जाती है.

मसला-ए-मल हमारी सेहत से बहुत क़रीब से जुड़ा है. पेट साफ़ न होने से बहुत सी बीमारियां हो जाती हैं. किसी को क़ब्ज़, तो किसी को अतिसार और किसी को आंतों में संक्रमण की बीमारी हो जाती है. पेट की बीमारियों के इलाज में अमरीकी लोग हर साल अरबों डॉलर ख़र्च करते हैं.

अब जब ये हमारी सेहत के लिए इतना अहम है तो ज़ाहिर है इस पर बात करने से कतराने से काम नहीं चलेगा. हमें समझना होगा कि आख़िर पॉटी का रंग-रूप और आकार किन बीमारियों की तरफ़ इशारा करते हैं.

वैसे भी, जो लोग नए-नए मां-बाप बनते हैं, उन्हें बच्चों की नैपी बदलते-बदलते, बच्चे की पॉटी देखकर उसकी सेहत का अंदाज़ा हो जाता है.

हम दोनों ने ही ऐसा करते हुए अचानक इस बात की जानकारी का दायरा बढ़ाने की दिलचस्पी पैदा कर ली. हमारा मक़सद प्राचीन सभ्यताओं की तरह पॉटी का साइज़ और रंग देखकर सेहत के बारे में बयां करना नहीं था. हम तो बस ये समझना चाहते थे कि इंसानों और दूसरे जानवरों के मल इतने तरह के रंग-रूप के कैसे होते हैं?

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इंसानों के सिवा बाक़ी जानवरों की पॉटी के बारे में भी हमने गहराई से पड़ताल की. पॉटी के विज्ञान की इस खोज में हमारे साथ अमरीका की अलाबामा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेनियल चू जुड़े. इनके अलावा यूनिवर्सिटी के ही दो छात्र कैंडीस कामिंस्की और मोर्गन लामार्का भी इस रिसर्च में हमारे साझीदार बने. इन लोगों ने अमरीका के अटलांटा के चिड़ियाघर में 34 स्तनधारी जानवरों के पॉटी करने के मंज़र को तस्वीरों में क़ैद किया.

इस रिसर्च से पता चला कि हाथी और दूसरे शाकाहारी जीवों तैरने वाला मल त्याग करते हैं. यानी इनकी पॉटी पानी में डूबती नहीं, तैरती रहती है. इसी तरह बाघों समेत मांसाहारी जानवरों का मल पानी में डूब जाता है. बाघ और गैंडे की पॉटी सबसे ज़्यादा बदबूदार होती है. वहीं पांडा का मल सबसे कम बदबूदार होता है. जानवरों के मल तरह-तरह के आकार में निकलते हैं.

हमने रियोमीटर नाम की मशीन में तमाम जानवरों की पॉटी को डालकर इनकी केमिकल बनावट के बारे में भी पता लगाया. कौन सूखा और सख़्त है? किसका मल गीला है? इसकी वजह क्या है? रियोमीटर की मदद से हमें इन सवालों के जवाब भी मिले.

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हमें और भी दिलचस्प बातें पता चली. मसलन बड़े जानवरों के मल की तादाद ज़्यादा होती है. वो ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से हाजत रफ़ा करते हैं, यानी मलत्याग करते हैं. जैसे, हाथी का मल छह सेंटीमीटर प्रति सेकेंड की रफ़्तार से निकलता है. वहीं कुत्ते के मलत्याग की रफ़्तार हाथी के छठें हिस्से के बराबर होती है. इंसान के हाजत रफ़ा करने की रफ़्तार इसके बीच में यानी दो सेंटीमीटर प्रति सेकेंड की होती है.

पर, सभी जानवर मलत्याग करने में कमोबेश एक बराबर वक़्त लेते हैं. सभी जानवर औसतन 12 सेकेंड में फारिग हो जाते हैं. हालांकि पॉटी की तादाद जानवरों के शरीर के आकार के हिसाब से कम या ज़्यादा होती है. 66 फ़ीसद जानवर फ़ारिग होने में 5 से 19 सेकेंड के बीच का वक़्त लेते हैं. हाथी एक बार में बीस लीटर मल त्याग करता है. वहीं कुत्ता एक बार में दस मिलीलीटर.

सवाल ये उठा कि जब तादाद में इतना फ़र्क़ है, तो कैसे कुत्ता और हाथी एक बराबर वक़्त में पॉटी कर लेते हैं?

इस सवाल का जवाब भी हमारी रिसर्च से मिला. असल में मल की तादाद, जानवर के शरीर के हिसाब से तय होती है. जो बड़े जानवर होते हैं, उनकी बड़ी आंत के भीतर म्यूकस की एक परत होती है, जो फिसलन भरी होती है. ये तेज़ी से पॉटी करने में काफ़ी मददगार होती है. इसीलिए कुत्ता और हाथी के शरीर में भले ही बहुत बड़ा फ़र्क़ हो, उनके पॉटी करने का वक़्त कमोबेश एक जैसा ही होता है.

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इस काम में भौतिक विज्ञान का नियम लागू होता है. म्यूकस के बग़ैर रफ़्तार से मल त्याग करना मुमकिन नहीं होता. जब आंतों में म्यूकस की कमी होती है, तो क़ब्ज़ की शिकायत हो जाती है. कई बार इसकी वजह से बैक्टीरिया का इन्फेक्शन भी हो जाता है.

हमारी इस रिसर्च से एक बड़ा फ़ायदा ये हुआ कि हमने तमाम आंकड़ों की मदद से अंतरिक्ष यात्रियों के लिए नए तरह के डायपर तैयार किए. अंतरिक्षयात्रियों को एक स्पेससूट हफ़्ते भर तक पहने रहना होता है. इस दौरान वो हाजत के लिए डायपर की मदद लेते हैं. हमने जानवरों के मल-त्याग की रिसर्च की बुनियाद पर उनके लिए नए तरह के डायपर बनाए, जो अंतरिक्षयात्रियों के लिए ज़्यादा आरामदेह हों. नासा के स्पेस पूप चैलेंज में हमारा डायपर सेमीफ़ाइनल तक पहुंचा.

साफ़ है कि गणित और भौतिक विज्ञान के नियमों की मदद से दुनिया का कोई भी मसला हल किया जा सकता है.

फ़ारिग होने का मसला भी!

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी अर्थ पर उपलब्ध है.)

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