पढ़े लिखे लोग अपनी बात पर क्यों अड़ जाते हैं?

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Image caption अमरीका में लोगों ने फ्रेकिंग तकनीक का विरोध तथ्यों के आधार पर नहीं, अपने विचारों पर किया.

कट्टरपंथियों को देखकर अक्सर यह मान लिया जाता है कि उन्हें कम जानकारी होती है, इसीलिए वे इतने कट्टर होते हैं. उनके पास तर्क कम होते हैं. वे कम पढ़े लिखे होते हैं. उनकी राय बदलने के लिए उन्हें आंकड़े और जानकारी देना भी बेकार है.

लेकिन, असल में यह ख़याल बिल्कुल ग़लत है. ज़्यादातर पढ़े लिखे लोग अपनी राय को लेकर बहुत ज़िद्दी होते हैं. वे जो सोचते हैं बस उसे ही सच मानते हैं, वे दक्षिणपंथी हों, या वामपंथी. कट्टर सोच हर खेमे में पाई जाती है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जो जितना पढ़ा-लिखा और जानकार है, उसकी राय उतनी ही पक्की और अटल.

मसलन, पर्यावरणवादी तमाम आंकड़ों की मदद से ग्लोबल वार्मिंग को दुनिया के लिए, इंसानियत के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बताएंगे. उनकी राय के ख़िलाफ़ आप चाहे जितने आंकड़े दिखा दें, चाहे जितने लेख उन्हें पढ़ा दें, उनकी राय और मज़बूत होती जाती है.

ठीक इसी तरह विकास के हामी, जंगलों को काटने से होने वाले नुक़सान को हमेशा कम करके बताएंगे. उन्हें चाहे जितने आंकड़े दिखा दिए जाएं कि जंगलों के कम होने से हमारा पर्यावरण कमज़ोर हो रहा है, वे मानने को तैयार नहीं होंगे.

आख़िर क्या वजह है कि पढ़े-लिखे, जानकार लोग अपनी बात को लेकर इतने ज़िद्दी हो जाते हैं?

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Image caption जलवायु परिवर्तन का विरोध वैज्ञानिक जानकारी नहीं, राजनीतिक विचारधारा के आधार पर हुआ.

मनोविज्ञान के हिसाब से आपके राजनैतिक विचार, बाक़ी चीज़ों के बारे में आपकी राय पर गहरा असर डालते हैं. फिर चाहे आपको जितने सबूत दिए जाएं,

आप उन्हीं सबूतों को चुनते हैं जो आपकी राय को सही ठहराते हैं. उन बातों को, उन तर्कों और सबूतों को दरकिनार कर देते हैं जो आपकी राय को चुनौती देते हैं. अगर लोग ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं, तो वो चुन-चुनकर आंकड़े देते हैं, उनका इस्तेमाल करके ख़ुद को सही ठहराते हैं.

अगली बार आप किसी बहस में पड़ें तो इसकी कोशिश न करें कि आप आंकड़ों के बूते अपने विरोधी की राय को बदल देंगे.

असल में वो उन्हीं आंकड़ों और जानकारियों में से अपने मतलब की चीज़ निकालकर आपको ग़लत साबित करेगा.

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Image caption वामपंथियों को अमूमन ज़िद्दी माना जाता है, पर दक्षिणपंथी भी उनसे अलग नहीं होते.

अमरीका की येल यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डैन काहन ने इस बारे में एक तजुर्बा किया था. वो ये समझना चाहते थे कि अपने राजनैतिक झुकाव की वजह से लोग किस तरह जानकारी का इस्तेमाल करते हैं.

इसके लिए उन्होंने दो पैमानों का इस्तेमाल किया. पहला तो यह कि उन्होंने रिसर्च में शामिल लोगों की वैज्ञानिक समझ की पड़ताल की. उनसे विज्ञान के कुछ सवाल किए गए, जिससे पता चले कि विज्ञान के बारे में वो कितना जानते हैं.

दूसरे पैमाने के तहत लोगों से यह जानने की कोशिश की गई कि लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों और आंकड़ों के बारे में और जानकारी हासिल करने में कितनी दिलचस्पी है.

उनसे यह भी पूछा गया कि आख़िर वो क्या पढ़ना चाहेंगे?

इन तजुर्बे के नतीजे बेहद दिलचस्प आए. चाहे वामपंथी हो या फिर दक्षिणपंथी. हर खेमे के समर्थक की दिलचस्पी अपनी राय से मेलजोल वाली चीज़ों में ही थी.

जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग के फिक्रमंद डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक, इस ख़तरे को बढ़-चढ़कर बताने वाले लेख और जानकारी हासिल करना चाहते थे.

इसी तरह रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक, ग्लोबल वार्मिंग के ख़तरे को कम करके आंकने वाले लेखों को लेकर दिलचस्पी दिखा रहे थे.

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Image caption विज्ञान विषयों में भी वैज्ञानिक सोच को तरज़ीह नहीं दी जाती है.

साफ़ था कि जो लोग जानकार हैं, वो अपनी राय को और मज़बूत करने वाली जानकारी ही चाहते हैं.

पर इस तजुर्बे से सबसे अच्छी बात यह सामने आई कि लोग नई-नई जानकारियों में दिलचस्पी ले रहे थे.

इन बातों से एक चीज़ एकदम साफ़ है. अगर आप चाहते हैं कि किसी ख़ास मुद्दे पर आपकी राय एकदम निष्पक्ष हो, किसी ख़ास खेमे की तरफ़ आपका झुकाव न हो, तो आपको ख़ुद से सवाल करते रहना होगा. नई जानकारियां हासिल करते रहनी होंगी. तभी आप अपने ख़याल को ख़ुद से चुनौती दे सकेंगे. तभी आप सच के क़रीब पहुंच सकेंगे.

ज़रूरी है कि अपनी हो या दूसरे की, हर राय के समर्थन में या ख़िलाफ़, नए नए तथ्य तलाशे जाएं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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